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Showing posts from August, 2020

फंदे उल्टे सीधे...This is for my Pari

माँ ने कुछ फंदे सलाई में डाले और बिठा लिया बेटी को पास। ध्यान से देखो क्योंकि तुमको भी बुनना है एक स्वेटर अपनी सास का अपने श्वसुर का बुनना होगा पति के लिए और एक देवर का ननद नंदोई के लिए पहले बुनना है ताकि आए न तुम पर कोई भी बात। यह बातें मेरी माँ ने कही थी। ऊन ध्यान से तुम  सुलाझना पड़ न जाए उसमें गांठ एक डिजाइन उल्टे फंदो का एक सिखाऊं सीधे का आज।  रख लूंगी सहेज कर इनको तुम्हारे दहेज के मैं साथ खुश हो जायेंगे घरवाले पाकर बहू के हाथों की गरमाहट। यह बातें मुझसे मेरी माँ ने कही थी वही समझा रही हूं तुमको आज कम न रहे मेरी भी गुड़िया सारे आएं उसको काज। रंग बिरंगे फंदो को तुम आपस में कुछ ऐसे मिलाना बुन जाए नया डिजाइन सबसे सुंदर नजर वो आए बच्चों के टोपे के साथ मोजे बुनना मैं सिखाऊं दस्ताने और मफलर गुड़िया सबकी ठंडक जल्द भगाएं। ऐसा मेरी माँ ने कहा था तुमको भी मैं समझा रही कुछ बुनाई सीखा रही हूं। कुछ ऊन अपनी पसंद की अपने लिए भी तुम ले लेना बुन लेना अपने भी सपने यह कहना माँ को याद नहीं क्योंकि ऐसा माँ ने कभी नहीं सुना था क्योंकि माँ की माँ ने नहीं कहा था।

बेटे

  कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं ! संबल , आस, उम्मीद जहां भर की, हर सवाल के हाजिर जवाब में रखते हैं, घर की रौनक बन चहकते बेटे, परिवार को रौशन कर चिराग से दिखते हैं ! कभी झगड़े, कभी मस्ती , कभी धूम-धड़क्का  जिन्हें लड़ाकू कहकर दोस्त शिकायत करते हैं ! सबसे  से आँख बचाकर आज भी अम्मा के तकिये के नीचे बटुआ छिपा कर रखते हैं ! रिश्ते की बात चले अगर कभी तो, शर्माकर कनखियों से माहौल को तकते हैं ! फोटो देख अपने भावी जीवन साथी का, पैर के अंगूठे से फर्श की दरार को कुरेदते हैं ! बेटा, भाई, पति और पिता का किरदार निभाकर, अपने वजूद को तलाश हरबार तरसते हैं ! घर की नींव की ईंट में लगे सिमेंट जैसे, रिश्तों में आई हर दरार को भरते हैं ! कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं !

गोपाल

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द्वापर युग में भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में जन्म लिया| भगवान श्रीकृष्ण का बचपन गायों की सेवा करते ही बीता. शायद इसी कारण से उन्हें गोपाल भी कहकर पुकारा जाता है. वैसे तो वृंदावन के हर घर में ही गाय पाली जाती थी. लेकिन बाल्यकाल से ही  कृष्ण और गायों के बीच एक अलग ही प्रकार का अलौकिक और भावपूर्ण रिश्ता रहा. कृष्ण ने जब पूतना का वध किया तो श्रीकृष्ण के पूरे शरीर को शुद्ध करने के लिए उनकी मां यशोदा और गोपियों ने कृष्ण के शरीर पर गोरज, गोमूत्र लगाया था. यानि कि तीन लोकों के स्वामी को बुरी नज़र से बचाने का कार्य गाय किया करती थी.  कृष्ण के पिता नंदबाबा के घर कई सेवादार थे लेकिन कृष्ण हमेशा खुद गाय दुहने की ज़िद किया करते थे. 'तनक कनक की दोहनी दे री मैया। तात दुहन सिखवन कह्यौ मोहि धौरी गैया।' यहां सूरदासजी ने देखिए किस खूबसूरती से कृष्ण और मैया यशोदा के बीच हुई बातचीत का वर्णन किया है- आजु मैं गाइ चरावन जैहौं। बृंदाबन के भांति-भांति फल अपने कर मैं खेहौं।। ऐसी बात कहौ जनि बारे, देखो अपनी भांति। तनक-तनक पग चलिहौ कैसैं, आवत ह्वैह्वै राति।। प्रात जात गैया लै चारन, घर आवत हैं सांझ। तुम...

इस तरह करता हूं मैं प्रेम

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मैं इस तरह  करता हूं तुमसे प्रेम जैसे चिड़िया करती है  तिनका-तिनका जोड़ कर अपने घोंसले से या फिर बालों को संवारती हुई मां अपनी बेटी से और जैसे माली करता है अपने उगाए पौधों पर खिलते हुए फूलों से। तुम्हारे तपते चेहरे पर सुनहरी हो गई मुस्कान से करता हूं मैं प्रेम क्योंकि यह  पृथ्वी के प्रथम युगल में संवाद की कूट भाषा है। मैं इस तरह  करता हूं तुमसे प्रेम जैसे चूमते हैं युगल  एक दूसरे में डूब कर, उस चुंबन का अहसास करोगी तो जान जाओगी कि  मैंने चूमा है हर बार  सिर्फ तुुम्हारी रूह को फिर समझ लोगी कि  मैंने क्या कहा है  आसमान में इंद्रधनुष बनाती तुम्हारी सपनीली आंखों से जहां निरंतर  जलती है एक लौ जो गरीबों के चूल्हे को सुलगाती है सुबह-शाम जिसकी आंच पर  रोटियां ही नहीं धीरे धीरे पकता है प्रेम भी उन श्रमिक युगलों के लिए जो बनाते हैं - हमारे लिए धरती पर आशियाना और खुद रह जाते हैं बेघर।   ज्वालामुखी की आग समेटे तुम्हारी इन आंखों से करता हूं प्रेम जो रूढ़ियों और मरती परंपराओं   की लौह शृंखलाओं को गला देना चाहती हैं और खोल देना चा...

सफर

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  अपनी सत्तर बरस की मां को देखकर, क्या सोचा है तुमने कभी, कि वो भी कभी कालेज में टाईट कुर्ती  और स्लैक्स पहन कर जाया करती थी ! तुम हरगिज़ नहीं सोच सकते कि तुम्हारी माँ जब अपने घर के आँगन में छमछम कर चहकती हुई ऊधम मचाती दौड़ा करती तो घर का कोना-कोना  उस आवाज़ से गुलज़ार हो उठता था ! तुम नहीं जानते कि 'ट्विस्ट' डांस वाली प्रतियोगिता में, जीते थे उन्होंने अनेकों बार प्रथम पुरुस्कार ! किशोरावस्था में वो जब भी कभी अपने गीले बालों को तौलिए में लपेटे  छत पर फैली गुनगुनी धूप में सुखाने जाया करती, तो न जाने कितनी ही पतंगें  आसमान में कटने लगा करती थी ! क्या सोचा है तुमने कभी कि अट्ठारह बरस की मां ने तुम्हारे बीस बरस के पिता को  जब वरमाला पहनाई तो मारे लाज से  दुहरी होकर गठरी बन, उन्होंने अपने वर को  नज़र उठाकर भी नहीं देखा था! तुमने तो ये भी नहीं सोचा होगा कि  तुम्हारे आने की दस्तक देती उस प्रसव पीड़ा के उठने पर अस्पताल जाने से पहले  उन्होंने माँग कर बेसन की खट्टी सब्जी खाई थी ! तुम सोच सकते हो क्या कि कभी, अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि तुम्हें...

बेटे

  कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं ! संबल , आस, उम्मीद जहां भर की, हर सवाल के हाजिर जवाब में रखते हैं, घर की रौनक बन चहकते बेटे, परिवार को रौशन कर चिराग से दिखते हैं ! कभी झगड़े, कभी मस्ती , कभी धूम-धड़क्का  जिन्हें लड़ाकू कहकर दोस्त शिकायत करते हैं ! सबसे  से आँख बचाकर आज भी अम्मा के तकिये के नीचे बटुआ छिपा कर रखते हैं ! रिश्ते की बात चले अगर कभी तो, शर्माकर कनखियों से माहौल को तकते हैं ! फोटो देख अपने भावी जीवन साथी का, पैर के अंगूठे से फर्श की दरार को कुरेदते हैं ! बेटा, भाई, पति और पिता का किरदार निभाकर, अपने वजूद को तलाश हरबार तरसते हैं ! घर की नींव की ईंट में लगे सिमेंट जैसे, रिश्तों में आई हर दरार को भरते हैं ! कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं !

पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो।

  बेईमानी का पैसा  पेट की एक-एक आंत  फाड़कर निकलता है।         रमेश चंद्र शर्मा, जो पंजाब के 'खन्ना' नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे,  उन्होंने अपने जीवन का एक पृष्ठ खोल कर सुनाया  जो पाठकों की आँखें भी खोल सकता है  और शायद उस पाप से, जिस में वह भागीदार बना, उस से भी बचा सकता है।       मेडिकल स्टोर अपने स्थान के कारण, काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था।  लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि *धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है*  और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई। रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी।  अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली।  लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा। मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था, क्योंकि मेडिकल फील्ड में दोगुनी नहीं, बल्कि कई गुना कमाई होती है। शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे, कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में...

रामायण

रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के इंतजार में बेंच पर बैठे एक बुजुर्ग हाथों में रामायण गुटका (छोटी पुस्तक ) ले कर तल्लीनता से पढ़ रहे थे । समीप ही बेंच पर एक नवयुवक अपनी श्रीमती के साथ बैठे थे । नवयुवक बुजुर्ग से सम्बोधित होकर बोला ..आप ये सुनी सुनाई कथाओं को पढ़ने में अपना समय क्यों नष्ट कर रहे हैं ...इनसे आपको क्या सीखने को मिलेगा ? अरे पढ़ना ही है तो , अखबार पढ़ो , इंडिया टुडे पढ़ो , और भी अन्य सैकड़ो पुस्तकें उपलब्ध है जो आपको दुनियादारी सिखाती है , व्यवहारिक ज्ञान देती है , उन्हें पढ़ो । तभी ट्रेन आ गई । बुजुर्ग पिछले और युवक अगले दरवाजे से ट्रेन में चढ़ गए , ट्रेन चलते ही कुछ देर बाद बुजुर्ग को उसी नवयुवक के चीखने चिल्लाने ट्रेन रोकने की आवाज सुनाई दी । पता लगा युवक खुद तो चढ़ गया था किंतु उसकी पत्नी नीचे ही रह गई थी । तब बुजुर्ग ने उस युवक से कहा - बेटा यदि तुमने अखबारों , इंडिया टुडे और अन्य सैकडों पुस्तकों के बजाय रामायण पढ़ी होती तो तुम्हे ज्ञात होता कि वनवास हेतु अयोध्य्या से प्रस्थान करते समय रामजी ने पहले सीताजी को रथ पर चढ़ाया था खुद पीछे चढ़े थे । चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई।  चले हृदयँ अ...

फैसला

बृजमोहन जी छत पर जमीन पे बिछाये गददे पर लेटे ... आसमान मे चांद और तारो को देख रहे थे उम्र दराज हो गए थे और वैसे भी ऐसी अवस्था मे कुछ घंटो की नींद, मुश्किल से आती थी .... पास मे उनकी धर्मपत्नी सुधाजी का भी रोज यही हाल रहता था... खुद का बनाया मकान था रिटायरमेंट के सभी पैसे लगाकर एक अपना घर बनाया  था....ताकि बुढापे मे पत्नी और बच्चों सहित चैन से बचा जीवन व्यतीत करेंगे मगर..... दोनों बेटे कुछ ज्यादा ही समझदार निकले .... जैसे ही दोनो बेटों की शादी हुई ...दोनों का व्यवहार बदलने लगा...दोनों के दो-दो बच्चे हो गये .... और हालत घर के कमरे ही नही हर जगह जैसे बंट गयी हो....तभी पत्नी सुधा का हाथ गाल पर महसूस हुआ... सोने की कोशिश कीजिए..... आज फिर बच्चो ने कुछ अपमानजनक कह दिया क्या... बृजमोहन जी बोले  -नही.... पर आंसुओं ने सुधा के हाथ को गीला कर दिया ... एक ने छुपाया तो दूसरे ने समझ लिया... सुधा बोली -सुनो .....कई दिन से चारों बेटे बहूऐ...  पता नही देर तक  चुपचाप क्या बातें करते रहते है...  कुछ पता है आपको.... बृजमोहन जी -हूं..... सो जाओ ..... सुधा जबतक मे हूं तुम मत घबराओ .....

क्या लिखूं माँ ,मैं तेरे लिए मैं तो खुद तेरी लिखावट हूँ |

 llमाँ  ||     माँ तुझे शब्दों में कैसे  बुनु       मैं तो खुद तेरी बनावट हूँ ,   क्या लिखूं मैं तेरे लिए     मैं तो तेरी ही लिखावट हूँ |                                                             तू अनंत  अविरत प्रेम                              तू ममता का सागर,                             तुझसे ही जन्म जगत का                             तुझ में ही बसता ईश्वर | हर गलती की माफी और सज़ा      दोनों तेरे पास है ,   तेरे तो डाँट में भी    प्यार का एहसास है |                     ...

तुम्हें लिखना

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 तुम्हें लिखना हमेशा तुमसे प्यार करने से⁣ ज़्यादा आसान रहा मेरे लिए।⁣ ⁣ इसकी सबसे बड़ी और सरल वजह ये रही कि -⁣ तुमसे प्यार करने में मुझे तुमपर निर्भर रहकर⁣ तुम्हारी अपेक्षा करनी पड़ती है!⁣ ⁣ मैं उम्मीदों में उलझा रहता हूँ कि -⁣ जब तुमने अपने हाथों में⁣ मेहंदी लगाई तो उसमें⁣ मेरे नाम का पहला अक्षर पिरोया या नहीं⁣ या⁣ जब कभी मैंने⁣ मर जाने की बात कही⁣ तो तुमने मेरे होंठ पर⁣ उँगली रखी या नहीं!⁣ ⁣ मुझे लगता है प्यार के नशे में धुत्त रहना वाला इंसान⁣ मृत्यु पर सिर्फ़ पढ़ सकता है - लिख नहीं सकता,⁣ क्यूँकि जब जब वो ख़ुद के मरने पर लिखेगा⁣ तो एक उँगली हमेशा आकर शांत करा देगी! ⁣ ⁣ मैं अब सब कुछ लिख सकता हूँ क्यूँकि⁣ ना अब मुझे किसी से प्रेम है⁣ ना ही कोई उँगली मेरे होंठों तक पहुँच पाती है!⁣ 🥀

याद करोगे मुझे

 || उस दिन ||     आज नहीं--- याद करोगे मुझे उस दिन--- जिस दिन सुख-समुद्र में निर्द्वन्द्व विचर रहे इन जहाजों के फास्ट-फूड-टिन खत्म हो जाएंगे और बस्ती का कहीं पता न होगा! ढूंढोगे तुम किनारा--- जमीन का छोटा-सा हरा टुकड़ा जहां आज भी चने उगते हों गौवें हरी-हरी घास चर रही हों दूर से ही उनकी आंखों में तुम्हें तरल प्यार झलकेगा ! छप्पर से छनता धुआं देख                                                       निश्चय ही इष्ट को साष्टांग करोगे! आज के अछोर विश्व-व्यापार-साम्राज्य के स्वयंभू सम्राट तुम अपनी गरबीले आर्थिक-भाषा की श्रेष्ठता के परम दावेदार तुम उस दिन---उस दिन तुम सब कुछ भूलकर जिंदगी के झूले में झूलकर सामने वाले से सिक्कों की भाषा में नहीं मनुष्यता की आदिम-भाषा में दोस्ती के संवाद करोगे याद करोगे मुझे निश्चित ही उस दिन--जिस दिन परसा के ठोंगे में भरे हुए भींगे चने से जमीन के उस हरे टुकड़े पर तुम्हारा जीवन-दायी स्वागत होगा बालाएं नह...

वह

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 इतने दिनों के बाद वह इस समय ठीक मेरे सामने है न कुछ कहना न सुनना न पाना न खोना सिर्फ़ आँखों के आगे एक परिचित चेहरे का होना होना- इतना ही काफ़ी है बस इतने से हल हो जाते हैं बहुत-से सवाल बहुत-से शब्दों में बस इसी से भर आया है लबालब अर्थ कि वह है वह है है और चकित हूँ मैं कि इतने बरस बाद और इस कठिन समय में भी वह बिल्कुल उसी तरह  हँस रही है और बस इतना ही काफ़ी है। वह 

लड़के

कुछ लड़के बड़े अच्छे लगते हैं जब मां से पूछते हैं , "आम का अचार है क्या ?" कुछ लड़के जब कभी किसी लड़की को  कनखियों से देखने पर पकड़े जाते हैं, तो शर्माकर, सकपकाकर , पकड़ने वाले से ही  पलटकर पूछते हैं "क्या हुआ ? कुछ भी तो नहीं !" कसम से , अच्छे लगते हैं ! अच्छे लगते हैं वे सारे लड़के, जो मंगलवार और शनिवार को, मंदिर में  प्रसाद चढ़ाकर, मन ही मन सबके लिए राजी-खुशी  मांगा करते हैं , और मीठी बूंदी और पेड़े घर -मुहल्ले में बिना नागा बाँटा करते हैं ! अच्छे लगते हैं वे सारे लड़के  जो चाकलेट, चिप्स के पैकेट खोलकर कर देते हैं सबसे पहले  अपनी माँ और बहन के आगे, और कहते हैं , "लो, आपका फेवरेट है न ये वाला !" कुछ लड़के सचमुच अच्छे लगते हैं जब, ऐमी.वाई.बंटाई के गानों से बेखबर , सुनते हैं किशोर कुमार और मोहम्मद रफी को, और गुनगुनाते हैं, कहीं दूर जब दिन ढल जाए ! वे सारे लड़के सच में बहुत अच्छे लगते हैं, जो अक्सर  गोलगप्पे वाले से कहते हैं , "भैया मुझे मीठे पानी वाला देना !" अच्छे लगते हैं ऐसे सारे लड़के , क्योंकि इनके व्यक्तित्व में कुछ तो  जरूर होता है , जो इन...

भैंस : एक दार्शनिक पशु।

पशु समाजिक हो सकता है जैसे मनुष्य, या धार्मिक जैसे गाय-बकरा आदि। पर दार्शनिक पशु बस भैंस है। शायद ही किसी ने किसी भैंस को उपद्रव मचाते देखा हो। इसे देख कर किसी पीर-सन्यासी की याद आती है, जो जीवन के सुख और दुख से ऊपर उठ चुका है। तमाम दार्शनिक किताबें भैंस के अनमनी दार्शनिकता के आगे फिके पड़ जाती हैं।  भैंस से मेरी पहली मुलाकात बचपन में हुई। बिहार में एक छोटा सा गाँव है,पटना से 30 किलोमीटर दूर है 'रसलपुर'। यही है मेरा गाँव। मेरे पापा ने अपना बचपन यहीं काटा था, और नौकरी लगने के बाद भी वो चाहते थे कि बच्चे गाँव से मानसिक रूप से ज्यादा दूर न चले जाएं।  इसलिए हर छुट्टी में वहाँ जाते ही हमें गाँव के काम पकड़ा दिए जाते थे, जैसे घास काट के लाना, खेत में बाकी काम,भैंस को चराने ले जाना आदि। इसमें मेरा सबसे प्रिय काम रहा है भैंस चराना।  गाँव में भैंसों और गायों को दोपहर में नदी के तरफ घास खिलाने ले जाया जाता है। इसे ही भैंस चराने ले जाना कहते हैं। उनके घास खाते वक़्त वहाँ एक व्यक्ति को खड़ा रहना पड़ता है कि जानवर किसी और के खेत में न घुस जाये। और अगर ऐसा हुआ तो उस रोज गांव में लड़ाई पक्की।...