गोपाल

द्वापर युग में भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में जन्म लिया|

भगवान श्रीकृष्ण का बचपन गायों की सेवा करते ही बीता. शायद इसी कारण से उन्हें गोपाल भी कहकर पुकारा जाता है.

वैसे तो वृंदावन के हर घर में ही गाय पाली जाती थी. लेकिन बाल्यकाल से ही  कृष्ण और गायों के बीच एक अलग ही प्रकार का अलौकिक और भावपूर्ण रिश्ता रहा.

कृष्ण ने जब पूतना का वध किया तो श्रीकृष्ण के पूरे शरीर को शुद्ध करने के लिए उनकी मां यशोदा और गोपियों ने कृष्ण के शरीर पर गोरज, गोमूत्र लगाया था.

यानि कि तीन लोकों के स्वामी को बुरी नज़र से बचाने का कार्य गाय किया करती थी. 

कृष्ण के पिता नंदबाबा के घर कई सेवादार थे लेकिन कृष्ण हमेशा खुद गाय दुहने की ज़िद किया करते थे.


'तनक कनक की दोहनी दे री मैया।

तात दुहन सिखवन कह्यौ मोहि धौरी गैया।'


यहां सूरदासजी ने देखिए किस खूबसूरती से कृष्ण और मैया यशोदा के बीच हुई बातचीत का वर्णन किया है-


आजु मैं गाइ चरावन जैहौं।

बृंदाबन के भांति-भांति फल अपने कर मैं खेहौं।।

ऐसी बात कहौ जनि बारे, देखो अपनी भांति।

तनक-तनक पग चलिहौ कैसैं, आवत ह्वैह्वै राति।।

प्रात जात गैया लै चारन, घर आवत हैं सांझ।

तुम्हरौ कमल-बदन कुम्हिलैहैं, रेंगत घामहिं मांझ।।

तेरी सौं मोहिं घाम न लागत, भूख नहीं कछु नेक।

सूरदास प्रभु कह्यौ न मानत, परयौ आपनी टेक।।


कृष्णजी ने आज माता से गैया  चराने के लिए जाने की जिद की और कहने लगे कि भूख लगने पर वे वन में तरह-तरह के फलों के वृक्षों से फल तोड़कर खा लेंगें। पर यशोदा मैया का दिल इतने छोटे बालक के सुबह से शाम तक जंगल में रहने की बात से डर गया और वे कृष्ण से बोली कि तुम अपने इतने नन्हे-नन्हे पैरों से सुबह से शाम तक वन में कैसे चल पाओगे और वापसी में काफी रात भी तो हो जाएगी। तुम्हारा कमल के समान मुलायम शरीर कड़ी धूप में कुम्हला जाएगा लेकिन कृष्ण तुरंत जवाब देने लगते हैं कि , मैया मैं आपकी कसम खाकर कहता हूं कि मुझे गर्मी बिल्कुल नहीं लगती और न ही भूख लगती है . और गाय चराने के अपने हठ पर टस से मस नहीं होते.

कृष्ण गायों की देखभाल बिल्कुल ऐसे किया करते थे जैसे वे मां हो और गाय उनके बच्चे ! वे सभी गायों को यमुनाजी में ले जाकर अपने हाथों से मल-मल कर नहलाया करते, अपने पीताम्बर से हर गाय का शरीर पौंछते,उन्हें प्यार से सहलाते और उनके बछड़ों को गोदी में लेकर उन्हें भी पुचकारते और रोली , फूल, पत्तियों की माला पहनाकर उनका भी श्रृंगार किया करते थे.

कृष्ण और गायों के बीच इस प्रेम की एक खास बात और भी थी कि वे गायों को चराने जाते वक्त कभी भी हाथ में कोई लाठी या बेंत वहैरह नहीं रखा करते थे . गाय तो बस उनकी बांसुरी की धुन सुन कर अपनी सुध-बुध खोकर उनके पीछे-पीछे चलती रहती.

कृष्ण अपनी बांसुरी की ध्वनि से हर गाय को उसका नाम लेकर पुकारते थे और बस गाय चाहे फिर कितनी ही दूर क्यों न पहुंच गई हो बांसुरी की धुन में अपने नाम की धुन सुनकर दौड़ी चली आती थी. 

कृष्ण भी नंगे पांव उनके पीछे कभी दौड़ते और खेल करते रहते थे.

कृष्ण को केवल गायों से ही प्रेम नहीं था . वे गाय के दूध से बने दूध, दही, मक्खन और घी के भी दीवाने थे.

माखन चुराकर खाना उनको हमेशा से ही पसंद रहा.

कृष्ण ने गायों की रक्षा के लिए हमेशा हर संभव प्रयास किया कभी उन्हें राक्षसों  से बचाया कभी ब्रह्माजी से छुड़ाकर लाए, गायों के लिए ही कालियह्रद को शुद्ध किया। कालियह्रद का जल पीने से जिन गायों की मृत्यु  हुईं, उन्हें श्रीकृष्ण ने जीवनदान दिया। 

इन्द्र के प्रकोप से गायों और समस्त  व्रजवासियों की रक्षा के लिए गिरिराज गोवर्धन को कनिष्ठिका अंगुली पर उठाया। तब देवराज इन्द्र ने ऐरावत हाथी की सूंड़ के द्वारा लाए गए आकाशगंगा के जल से तथा कामधेनु ने अपने दूध से उनका अभिषेक किया और कहा कि ‘जिस प्रकार देवों के राजा देवेन्द्र हैं, उसी प्रकार आप हमारे राजा ‘गोविन्द’ हैं।


और तो और कृष्ण ने ही ‘गोधन की सौं’ शपथ प्रचलित कराई। 

जब श्रीकृष्ण सांदीपनिमुनि के आश्रम में विद्या ग्रहण के लिए गए तो वहां भी उन्होंने जी जान लगाकर गो-सेवा की। उनकी द्वारकालीला में तो यहां तक लिखा है कि 13,084 ऐसी गायों का दान प्रतिदिन द्वारकाधीश श्रीकृष्ण करते थे जो पहले-पहल ब्यायी हुई, दुधार, बछड़ों वाली, सीधी, शान्त होती थीं और जिनके सींग स्वर्णमण्डित, खुर रजतमण्डित, पूंछ में मोती की माला और जवाहरात से पिरोई हुयी रेशमी झूल होती थी। इतना गोदान नित्य करते थे तो सोचिए कि कृष्ण के पास कितनी गाएं  होंगी? 

देखा जाए तो कृष्ण के इस अवतार में गाय बहुत महत्वपूर्ण रही .

भक्त बिल्वमंगल ने श्रीकृष्णकर्णामृत ग्रन्थ में कहा है–

हे प्रभु ! आप सहर्ष ही ब्रज  की कीचड़  में तो विहार करते रहते  हो, लेकिन  ब्राह्मणों के यज्ञ में पहुंचने में आपको लज्जा आती है। गायों और उनके बछड़ों के ज़रा सी हुंकार भरते ही उनकी भाषा को आप तुरंत समझ लेते हो, और दौड़े-दौड़े आप उनके पास चले जाते हो और उनको गले से लगा लेते हो। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जब बड़े-बड़े ज्ञानीजन  स्तुति करते हैं तब आप चुप खड़े रह जाते हो। हे कृष्ण! मैं जान गया, आप और किसी तत्त्व का आदर नहीं करते, आप तो केवल निश्छल प्रेम का आदर करते हो। जिसके भी हृदय में आपके प्रति निश्छल प्रेम है, उसी से आप  रीझ जाते हो।

तो ये थीं कृष्ण और गाय के बीच निश्छल प्रेम की कुछ झलकियां !

आज हमारे इसी गोपालक देश में न जाने कितनी ही बीमार गायें सड़कों पर भूूखी-प्यासी घूम रही हैं कि कोई आकर उन्हें आश्रय देकर उनका जीवन बचा सके .

काश कि आज भी कृष्ण की इस पावन धरती पर उनकी प्रिय गायों को  फिर से वही प्रेम और सम्मान मिल सके !

वैसे प्रेम और सम्मान का अधिकार तो धरती पर जन्में हर जीव जंतु और प्राणी को है 

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