बेटे

 

कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे

आँख की नमी में माँ से लगते है,

खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर

जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं !


संबल , आस, उम्मीद जहां भर की,

हर सवाल के हाजिर जवाब में रखते हैं,

घर की रौनक बन चहकते बेटे,

परिवार को रौशन कर चिराग से दिखते हैं !


कभी झगड़े, कभी मस्ती , कभी धूम-धड़क्का 

जिन्हें लड़ाकू कहकर दोस्त शिकायत करते हैं !

सबसे  से आँख बचाकर आज भी

अम्मा के तकिये के नीचे बटुआ छिपा कर रखते हैं !


रिश्ते की बात चले अगर कभी तो,

शर्माकर कनखियों से माहौल को तकते हैं !

फोटो देख अपने भावी जीवन साथी का,

पैर के अंगूठे से फर्श की दरार को कुरेदते हैं !


बेटा, भाई, पति और पिता का किरदार निभाकर,

अपने वजूद को तलाश हरबार तरसते हैं !

घर की नींव की ईंट में लगे सिमेंट जैसे,

रिश्तों में आई हर दरार को भरते हैं !


कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे

आँख की नमी में माँ से लगते है,

खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर

जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं !


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