याद करोगे मुझे

 || उस दिन ||    


आज नहीं---

याद करोगे मुझे

उस दिन---


जिस दिन

सुख-समुद्र में

निर्द्वन्द्व विचर रहे


इन जहाजों के


फास्ट-फूड-टिन

खत्म हो जाएंगे


और

बस्ती का

कहीं

पता न होगा!


ढूंढोगे

तुम किनारा---


जमीन का

छोटा-सा

हरा टुकड़ा


जहां

आज भी

चने उगते हों


गौवें

हरी-हरी

घास

चर रही हों


दूर से ही

उनकी

आंखों में


तुम्हें

तरल प्यार झलकेगा !


छप्पर से

छनता

धुआं देख                                                      


निश्चय ही

इष्ट को

साष्टांग करोगे!


आज के

अछोर विश्व-व्यापार-साम्राज्य के


स्वयंभू

सम्राट तुम


अपनी गरबीले

आर्थिक-भाषा की


श्रेष्ठता के


परम दावेदार तुम


उस दिन---उस दिन तुम


सब कुछ भूलकर

जिंदगी के झूले में झूलकर


सामने वाले से

सिक्कों की भाषा में नहीं


मनुष्यता की

आदिम-भाषा में


दोस्ती के

संवाद करोगे


याद करोगे मुझे

निश्चित ही

उस दिन--जिस दिन


परसा के ठोंगे में

भरे हुए

भींगे चने से


जमीन के

उस हरे टुकड़े पर


तुम्हारा

जीवन-दायी

स्वागत होगा


बालाएं

नहीं नाचेंगी

उस रात तुम्हारे सम्मुख आज की तरह


जीवन को पुनः

पा लेने की खुशी में मूर्ख!


तुम नाचोगे!

पागलों की तरह नाचोगे!                                     


धरती को चूमोगे


आसमान का शुक्रिया करोगे


और

और

फिर

फिर

नाचोगे !



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