क्या लिखूं माँ ,मैं तेरे लिए मैं तो खुद तेरी लिखावट हूँ |
llमाँ ||
माँ तुझे शब्दों में कैसे बुनु
मैं तो खुद तेरी बनावट हूँ ,
क्या लिखूं मैं तेरे लिए
मैं तो तेरी ही लिखावट हूँ |
तू अनंत अविरत प्रेम
तू ममता का सागर,
तुझसे ही जन्म जगत का
तुझ में ही बसता ईश्वर |
हर गलती की माफी और सज़ा
दोनों तेरे पास है ,
तेरे तो डाँट में भी
प्यार का एहसास है |
सांसों की तरह हर पल
तू मेरे संग रहती है,
छोटी सी चोट भी लग जाए
तो 'ओह् माँ' की आंह निकलती है |
मैंने जन्नत तो नहीं देखी
यकीन है तुझसे हसीन ना होगी ,
तेरे आँचल की छाँव मिली है मुझे
मुझसे ज़्यादा कोई खुशनसीब ना होगी |
खुद माँ बनकर जाना है
क्यों लगती तू इतनी प्यारी,
क्यों ना बनू मैं तेरे ही जैसी
आखिर हूँ तो मैं, तेरी ही परछाई |
तेरे दुलार तेरे प्यार का
मोल कभी ना लगा पाऊंगी,
तेरे दिए संस्कारों से
अपने बच्चों को भी सिचुंगी |
बन कर बच्ची एक बार फिर से
तेरे आँचल में छुपना चाहती हूँ ,
'बहुत प्यार है, तुझसे माँ'
आज तुझे कहना चाहती हूँ |
तेरी गोद में सर रखकर
चैन की नींद सो जाऊ,
तेरी लोरी सुनकर माँ
मैं सपनों में खो जाऊ |
तेरे जाने के बाद भी
हरपल मैं तुझे महसूस करती हूँ,
तू तो मुझ में समाई है
तुझे अपने अंदर ही ढूँढ लेती हूँ |
क्यों रोऊ तेरी याद में
मैं तो तेरी मुस्कुराहट हूँ,
क्या लिखूं माँ ,मैं तेरे लिए
मैं तो खुद तेरी लिखावट हूँ |
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