Posts

Showing posts from July, 2024

यादें_बचपन_की

Image
 स्कूल के इंटरवेल में टिफिन खुलते ही आम के अचार की महक से क्लास भर जाती थी, जो बच्चा टिफिन में सब्जी लाया होता था वह भी अचार के लिए मचल उठता था…☺️ हमारे समय में स्कूल के टिफिन का मेन्यू आम या मिर्च के अचार के साथ परांठे हुआ करते थे, आम के अचार को तृप्ति के अंतिम छोर तक चूस-चूस कर खाने वाले बच्चे हमारे जमाने में ही मिलते थे। एक ही मेन्यू लगभग रोज रिपीट होता… लेकिन जो संतुष्टि और आनंद उन परांठों और अचार में मिलता, यकीन मानिए दस पकवानों में भी वह आनंद नहीं था, इस अचार और परांठे को खाकर भी हम स्वस्थ और तंदुरुस्त रहते, डॉक्टर्स के यहाँ तो कभी साल दो साल में गए हो तो गए हो वरना हम सब मस्त कलंदर और थोड़े बंदर… अब तो स्कूल के टिफिन में अचार ले जाना ही मना हैं, स्कूल की तरफ से डाइट चार्ट जैसे सेट है और मम्मियों की हर रात यही सोचने में सेट है कि सुबह टिफिन के लिए क्या स्पेशल बनाएं…🥹

Raise girls rich, Raise boys poor"

Image
 मर्द केवल negativity के माध्यम से ही अच्छे इंसान बनते हैं, महिलाएं वास्तव में इसके विपरीत हैं। जो पुरुष बहुत अधिक दर्द से गुज़रे हैं वो बहुत दयालु होते हैं। सबसे बड़े गुंडे, हत्यारे और दुष्ट लोग कभी-कभी सबसे दयालु हो सकते हैं। जब महिलाएं बहुत अधिक दर्द से गुजरती हैं तो वो कड़वी, बुरी और मतलबी हो जाती हैं और दयालु नहीं बनतीं, मर्द बहुत अधिक दर्द दुःख तकलीफ़ से दयालु बन जाते हैं। एक पुरानी chinese कहावत है "Raise girls rich, Raise boys poor" अपनी बेटी को अपनी क्षमतानुसार बिगाड़ो उसे princess की तरह रखो हमेशा,फिर जब वो एक साथी की तलाश में होती है तो वो उसे चुन सकती है जो उसकी तुम्हारी तरह देखभाल कर सके। दूसरी ओर अपने बेटों को कुछ मत दो, उन्हें जीवन में हर चीज़ के लिए काम करने दो, That's how they can become a r eal man.
Image
 सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है  अपने जीवन में जो सपना देखा था  वो सिर्फ सपना ही बनकर रह गई है  ऐसा दर्द मिली जिसे मैं साझा न कर सका  सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है। छोटे से बड़े और फिर बूढ़े होने के सफर में  कितने ही रिश्ते नाते तोड़ जाते है हम मन में उठी तर्क वितर्क ने मुझे घायल कर दिया  सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है । कभी हुआ करती थी वास्तविक मुस्कुराना वो दिन न जाने अब कहां खो गया  जीतने की अंधी दौड़ में हार रही है इंसानियत सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है। ये जिंदगी तू मुझे बस इतना ही बता दें  और कितने रंग दिखायेगी जीवन में  वर्तमान का दौड़ बड़ा विचित्र है  सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है। मत करना ऐसी कोई भी आस सज्जनों जिसे तुम कभी पा न सकों  मेहनत छोड़ लोग चापलूसी में लगे हुए है  सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है। स्वयंभू भगवान बनने की कोशिश में  आज कितना बदल रहा है इंसान सभी के दिल में पल रहें है नफरत के बीज सावन आने से पहले ही मेर...

उम्र

Image
 एक उम्र के बाद हम स्थिर हो जाते हैं। नये लोगों से मिलने से बचते हैं। जिस रिश्ते में आप बंधे हैं उन्हें निभाने की हर कोशिश करते हैं। उसके ताने, उसकी दूरियाँ सबकुछ सहते हैं। किन्तु, आप चाहकर भी उससे दूर नहीं होना चाहते। भावनाओं की कैफ़ियत अलग तरह की होती है। हर बार शुरु से सबकुछ बताते रहना संभव नहीं होता। हर बार खुद को फिर किसी के लिए समर्पित कर पाना बहुत ही कठिन है। हम आदत के शिकार हो जाते हैं। किसी ख़ास इंसान से ख़ास बातें करना हमारी उन आदतों का हिस्सा होता है। लाख जतन के बावजूद हम वो नहीं रह पाते जो हम पहले किसी और के लिए रहे होते हैं। हम लोगों द्वारा बदले जाते हैं। और यह एक बहुत धीमी चलने वाली प्रक्रिया के तहत होता है; इतनी धीमी कि हमें उस चीज का आभास तक नहीं होता। हम वो हो जाते हैं जो पहले नहीं थे। किन्तु, कई बार हमारी अपेक्षाओं के विपरीत उन परिस्थितियों से दो चार होना पड़ता है जहाँ हमारी सारी स्थिरता एक कंकड़ की चोट से अस्त व्यस्त हो जाती है। हम अंदर ही अंदर घुटने लगते हैं। हमें हमारा कुछ पता नहीं होता। हम ख़ुद को ढूँढने के लिए बेचैन हो उठते हैं; और जब ख़ुद को किसी और में पाते...

अम्मा

Image
  अम्मा इसलिए अम्मा नहीं है,कि उसे दुनियाभर की खटास व कड़वाहटों के चटकारे याद हैं, बल्कि अम्मा इसलिए अम्मा है, क्योंकि किसी फंक्शन में जब हमें अपनी महंगी ड्रेस की फ़िक्र रहती है,तब अम्मा को एकटक पल्लू का ध्यान रहता है, ताकि पल्लू गिरते ही संस्कार धम्म से ज़मीन पर ना बिखर जाएं। बहुत से फंक्शनों में अम्मा किसी कोने में बैठकर संस्कारों की सांसे सहेजती दिख जाती है।

खुशी

Image
 ज़िन्दगी ऐसी ही है, कोई एक फूल से बेइंतहा खुश है । कोई बेइंतहा फूलों के बीच मायूस है । यह तो हम रोज़ देखते हैं । कोई अपनी मामूली सी तनख्वाह में सादी सी ज़िन्दगी में दिल खोलकर खुश रह लेता है । कोई बहुत बड़े पैकेज,आलीशान घर और क्लास की ज़िन्दगी के बाद भी बुझा बुझा रहता है । किसी को कोई पलट कर पलक उठाकर भी देख ले,तो वह पूरा दिन खुश रहता है । कोई है कि दिन रात साथ रहने पर भी खुश नही । तो यह खुशी है क्या,किस बाज़ार की चीज़ है । इसकी क़ीमत क्या है । कौन है जो खुशी को बनाता है । इसके कारीगर किस देस में रहते हैं । इसका पता मालूम करते करते जिंदगियां ख़त्म हो गईं । मैं भी सोचता हूँ कि यह खुशी है क्या चीज़ । जो भयंकर तपिश में मुस्कुरा देती है । अक्सर बहते हुए आंसुओ के साथ होंठों पर छपाक से कभी बिखर जाती है । कभी तो होंठ,आंख और चेहरे की जिल्द भी पता नही देती मगर लोग अंदर ही अंदर खुश होते हैं । मेरे लिए खुशी की परिभाषा बता पाना उतना ही मुश्किल है, जितना खुशी की एक वजह को समझ पाना । कोई दहकते अंगारे पर भुट्टा सेकते हुए खुश है तो कोई एसी में नरम बिस्तर पर चाय और तमाम दिलचस्पी के सामान चीज़ों के सामने भी बु...

90 के दशक के बच्चों के शो

Image
1990 का दशक भारतीय टेलीविजन के लिए एक सुनहरा दौर था, खासकर बच्चों के कार्यक्रमों के लिए। इन शो ने बच्चों को न केवल मनोरंजन किया बल्कि महत्वपूर्ण शिक्षाएं और नैतिक मूल्य भी सिखाए। चलिए, इस सुनहरे युग के कुछ सबसे प्रिय बच्चों के शो की यादें ताजा करते हैं। #### 1. **मालगुडी डेज़** - **विवरण**: आर.के. नारायण की कहानियों पर आधारित, इस शो में मालगुडी नामक काल्पनिक शहर का जीवन दिखाया गया है। प्रत्येक एपिसोड में एक नई कहानी और अलग-अलग पात्र होते थे। - **मुख्य पात्र**: स्वामी और उसके दोस्त। - **मुख्य आकर्षण**: सरल और दिल को छू लेने वाली कहानियाँ जो भारतीय गांव के जीवन को दर्शाती थीं। #### 2. **विक्रम बेताल** - **विवरण**: राजा विक्रमादित्य और बेताल की पौराणिक कहानियों पर आधारित, प्रत्येक एपिसोड में एक नई कहानी और नैतिक प्रश्न होते थे। - **मुख्य पात्र**: राजा विक्रमादित्य और बेताल। - **मुख्य आकर्षण**: रोचक कहानियाँ और नैतिक शिक्षा। #### 3. **शक्तिमान** - **विवरण**: भारत का पहला सुपरहीरो शो जिसमें शक्तिमान बुराई से लड़ता है और अच्छे मूल्यों की शिक्षा देता है। - **मुख्य पात्र**: शक्तिमान/गंगाधर (मु...

जून चला गया, रौनक भी चली गयी

Image
 जून चला गया, रौनक भी चली गयी कोई शहर चले गये कोई भाबर चले गये| साथ मे चले गये प्याजों के कट्टे और लासण के झुण्टे और बेडू तिमला काफल की तस्वीरें चले गये बोलकर कि असूज मे भेज देना ककडी़ मुंगरी के फन्चे वो आये कुछ दिन और बढा़ गये गाँवों पन्देरों की चहल पहल कच्ची सड़कों पर ट्रैफिक और बाजारों की खरीददारी कुछ हमसे सीख कर कुछ हमे सिखा कर गये सीख कर गये आलू की थिचोंणी,  और आलण बनाना  सिखा कर गये जन्मदिन सालगिरह मनाना रील्स और ब्लाग बनाना किटी पार्टी करना सिखा गये कारों मे, धारों मे और बाजारों मे, ऊपर ढय्यों के बन्द मन्दिरों मे बजा गये घण्टियाँ और बता गये इनकी धार्मिक महत्ता| अपनी तो मजबूरी बताकर समझा गये हमें क्यारी खेती बाडी़ करने  गाय भैंस पालने के फायदे, और स्वरोजगार के कायदे | बस कुछ दिन ही खडी़ रही गाँवो के ऊपर नीचे सारियों मे लाल सफेद काली चमचमाती कारें  जो सरपट दौड़कर छोड़ गये हमे फिर अकेला मगर हमारे अकेलेपन को देखकर  साथ देने आ गयी  रिमझिम बरखा की बूँदे, निकल आई घास की कोंपलें डाण्डों से उड़ता कोहरा अभी तो छुय्ये भी फूटेंगे नीचे गदेरा भी जोर से पुकारे...

- सखिन रचा पिय संग हिडोला , हरियर भूमि कुसुम्भी चोला हिय हिंडोल अस डोलय मोरा , ता पर विरह देई झकझोरा

 आर्द्र से अद्रा बना है ,         आद्र का शाब्दिक अर्थ है गीला , नम , बूँदे - इन्ही प्रतीकों को समेटे हुए खगोल शास्त्र ने ब्रह्मांड को कुल सत्ताईस नक्षत्र में बाँट दिया आद्रा उसने से एक नक्षत्र है । भारतीय ज्ञान विज्ञान की एक खूबी रही है कि वह गूढ़ भले ही रही लेकिन आम जन के पास उसका सरलीकरण संस्करण विस्तार लेता रहा है और आज तक जब समूचा माहौल पश्चिमी तड़क-भड़क में उलझा है , खगोल शास्त्र की काल संरचना जीवित है और जीवन को प्रवाहित और प्रभावित कर रही है । आद्रा नक्षत्र सावन में लगता है । सावन एक ऋतु है लेकिन केवल ऋतु भर नहीं है , यह गाँव के लिए धरती छूने का उत्सव है , गर्मी के ताप से तायी बिरही धरती पर आषाढ़ की गिरी बूँदों से धन्य होने का उत्सव है । किसान भागता है खेतों की ओर , एक नये फसल चक्र के उपक्रम में । कल से अद्रा लग जाएगा । बूँदा बादी होगी , धरती नम होगी , दो दिन बाद खेतों में हल चलेगा । अद्रा की पहली बारिश में दो दिन हल नहीं चलता , इस मान्यता को पुरखा - पूरनिये तय कर गये हैं , हर किसान इसे जानता है , मानता है । इसकी व्याख्या कृषि वैज्ञानिक करते हैं - ...