उम्र


 एक उम्र के बाद हम स्थिर हो जाते हैं। नये लोगों से मिलने से बचते हैं। जिस रिश्ते में आप बंधे हैं उन्हें निभाने की हर कोशिश करते हैं। उसके ताने, उसकी दूरियाँ सबकुछ सहते हैं। किन्तु, आप चाहकर भी उससे दूर नहीं होना चाहते।


भावनाओं की कैफ़ियत अलग तरह की होती है। हर बार शुरु से सबकुछ बताते रहना संभव नहीं होता। हर बार खुद को फिर किसी के लिए समर्पित कर पाना बहुत ही कठिन है। हम आदत के शिकार हो जाते हैं। किसी ख़ास इंसान से ख़ास बातें करना हमारी उन आदतों का हिस्सा होता है। लाख जतन के बावजूद हम वो नहीं रह पाते जो हम पहले किसी और के लिए रहे होते हैं।


हम लोगों द्वारा बदले जाते हैं। और यह एक बहुत धीमी चलने वाली प्रक्रिया के तहत होता है; इतनी धीमी कि हमें उस चीज का आभास तक नहीं होता। हम वो हो जाते हैं जो पहले नहीं थे।


किन्तु, कई बार हमारी अपेक्षाओं के विपरीत उन परिस्थितियों से दो चार होना पड़ता है जहाँ हमारी सारी स्थिरता एक कंकड़ की चोट से अस्त व्यस्त हो जाती है। हम अंदर ही अंदर घुटने लगते हैं। हमें हमारा कुछ पता नहीं होता। हम ख़ुद को ढूँढने के लिए बेचैन हो उठते हैं; और जब ख़ुद को किसी और में पाते हैं तो लगता है अपनी लड़ाई ख़ुद के हाथों ही हार गए।


हम खुद को आज़ाद कहने वाले लोग अव्वल दर्जे के गुलाम हैं। जो सिर्फ़ ढोंग करते हैं सुखी होने का। हम सब गुलाम हैं; किसी की स्मृतियों के, किसी की आदतों के, किसी की बातों के।

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