- सखिन रचा पिय संग हिडोला , हरियर भूमि कुसुम्भी चोला हिय हिंडोल अस डोलय मोरा , ता पर विरह देई झकझोरा
आर्द्र से अद्रा बना है ,
आद्र का शाब्दिक अर्थ है गीला , नम , बूँदे - इन्ही प्रतीकों को समेटे हुए खगोल शास्त्र ने ब्रह्मांड को कुल सत्ताईस नक्षत्र में बाँट दिया आद्रा उसने से एक नक्षत्र है । भारतीय ज्ञान विज्ञान की एक खूबी रही है कि वह गूढ़ भले ही रही लेकिन आम जन के पास उसका सरलीकरण संस्करण विस्तार लेता रहा है और आज तक जब समूचा माहौल पश्चिमी तड़क-भड़क में उलझा है , खगोल शास्त्र की काल संरचना जीवित है और जीवन को प्रवाहित और प्रभावित कर रही है । आद्रा नक्षत्र सावन में लगता है । सावन एक ऋतु है लेकिन केवल ऋतु भर नहीं है , यह गाँव के लिए धरती छूने का उत्सव है , गर्मी के ताप से तायी बिरही धरती पर आषाढ़ की गिरी बूँदों से धन्य होने का उत्सव है । किसान भागता है खेतों की ओर , एक नये फसल चक्र के उपक्रम में । कल से अद्रा लग जाएगा । बूँदा बादी होगी , धरती नम होगी , दो दिन बाद खेतों में हल चलेगा । अद्रा की पहली बारिश में दो दिन हल नहीं चलता , इस मान्यता को पुरखा - पूरनिये तय कर गये हैं , हर किसान इसे जानता है , मानता है । इसकी व्याख्या कृषि वैज्ञानिक करते हैं - दो दिन में धरती की ऊपरी सतह का जल धरती अंदर तक सोख लेती है । सावन में चौकी आबाद रहती है , समय बिताने के लिए अनगिनत बातें होती है - खेती- बारी , चोरी- चकारी , राजनीति , हँसी - मजाक सब । उधर चौके का सुर बदल गया होता है - दालभरी पूरी , चावल की बखीर , पका आम , आम का अचार से थरिया सजने लगती । लगे हाथ नामौजूद औरतों के क़िस्से टहलते रहते , सच्ची रे की चासनी के साथ ।
बुझारत बो आँखें गोल कर बताती है - अपनी आँख से देखा हो दुलहिन ! लील के गोदामिया ( नील के गोदाम को बुझारत बो लील का गोदामिया ही बोलती है ) पे बुधनी आऊ मनीज़र हिस्स ! जमाना देख ल ! ई बेशर्मी ? सब मोबाइल से आयल हऊ दुलहिन !
पूरी बेलते बेलते , घूँघट की आड़ से कुद्दूपुरवाली पलटवार करती है - तुमहू कम ना खेले - खाऊ अह्यू , बुझारत बो ! छोटका बतावत रहीं कि अपने जमाने में
- नौज
अचानक चुहुलबाजी थम गई , सारे कान उस ओर हो गये । बाहर से कजरी सुनाई पड़ी - रिमझिम बरसे कारी बदरिया , पिया घर नहीं आए रे ।
- लागत बा पारस के नीम पे झूला पड़ा बा !
अद्रा झूल रहा है , धीमी पेंग । बदरी झर रही है ।
Comments
Post a Comment