जून चला गया, रौनक भी चली गयी
जून चला गया, रौनक भी चली गयी
कोई शहर चले गये कोई भाबर चले गये|
साथ मे चले गये प्याजों के कट्टे और लासण के झुण्टे
और बेडू तिमला काफल की तस्वीरें
चले गये बोलकर कि असूज मे भेज देना ककडी़ मुंगरी के फन्चे
वो आये कुछ दिन और बढा़ गये
गाँवों पन्देरों की चहल पहल
कच्ची सड़कों पर ट्रैफिक
और बाजारों की खरीददारी
कुछ हमसे सीख कर कुछ हमे सिखा कर गये
सीख कर गये आलू की थिचोंणी,
और आलण बनाना
सिखा कर गये जन्मदिन सालगिरह मनाना
रील्स और ब्लाग बनाना
किटी पार्टी करना सिखा गये कारों मे, धारों मे और बाजारों मे,
ऊपर ढय्यों के बन्द मन्दिरों मे बजा गये घण्टियाँ
और बता गये इनकी धार्मिक महत्ता|
अपनी तो मजबूरी बताकर
समझा गये हमें क्यारी खेती बाडी़ करने
गाय भैंस पालने के फायदे,
और स्वरोजगार के कायदे |
बस कुछ दिन ही खडी़ रही
गाँवो के ऊपर नीचे सारियों मे लाल
सफेद काली चमचमाती कारें
जो सरपट दौड़कर छोड़ गये हमे फिर अकेला
मगर हमारे अकेलेपन को देखकर
साथ देने आ गयी
रिमझिम बरखा की बूँदे,
निकल आई घास की कोंपलें
डाण्डों से उड़ता कोहरा
अभी तो छुय्ये भी फूटेंगे
नीचे गदेरा भी जोर से पुकारेगा
उन्हे तरसायेगा हर्षायेगा और फिर यहीं बुलायेगा।
जय हो मेरी देवभूमि उत्तराखंड 👏😘😘

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