झकझक

 कल रात यूँ ही प्राइम स्क्रॉल करते हुए एक फ़िल्म सामने आ गयी - 3000 Years of Longing - निर्देशक के नाम पर नजर पड़ी तो देखा - जार्ज मिलर साहब हैं, जिन्होंने Mad Max - Fury Road जैसी धाकड़ फ़िल्म बनाई थी। बिना सोचे-समझे फ़िल्म को मैंने चला दिया। फ़िल्म एक बार देखने लायक है और बच्चों के लिए नहीं है। 

.

कहानी में एक स्टोरीटेलर अधेड़ स्त्री "अलिथिया" है, जो किसी कार्यक्रम हेतु इस्तांबुल जाती है। वहाँ से सुवेनियर के तौर पर एक प्राचीन आर्टिफैक्ट खरीदती है, जो वास्तव में जिन्न वाला चिराग होता है। होटल रूम में उस चिराग के टूट जाने पर जिन्न (इदरीस अल्बा) प्रकट होता है, जो अलिथिया की तीन ख्वाहिशें पूरी करना चाहता है। 

.

अलिथिया उसके हिसाब से बेहद सन्तोषी जीव है। उसे कुछ चाहिए ही नहीं। जिन्न जिद पर है कि इच्छा बताओ क्योंकि पूर्व में चिराग के मालिकों की इच्छा न बता पाने के कारण उसे बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। अलिथिया और जिन्न आपस में सहमत तो नहीं हैं, पर एक चीज दोनों को बेहद पसंद है - किस्से कहानियां सुनना और सुनाना। तो अलिथिया सोच-विचार करने को समय मांगती है। इस बीच जिन्न उसे अपनी कहानियां सुनाता है।

.

जिन्न की कहानियां हमें माइथोलॉजी में वर्णित "शबा की रानी' से लेकर ओटोमन एम्पायर के राजाओं तक की दुनिया के तमाम किस्सों में ले जाती हैं। चूंकि निर्देशक जार्ज मिलर हैं, इसलिए हर कहानी का उन्होंने क्या खूब भव्य फिल्मांकन किया है। कहानियां खत्म होते-होते अलिथिया को जिन्न अपने जैसा ही जीव प्रतीत होने लगता है और वो अपनी ख्वाहिश में जिन्न का ताउम्र का साथ ही मांग लेती है। 

.

फ़िल्म के दौरान अथवा फ़िल्म खत्म होने के बाद भी हम यह अंदाजा नहीं लगा पाते कि अलिथिया का जिन्न असली है या उसकी कल्पना। बचपन से ही हैलुसिनेशन्स से जूझ रही अलिथिया को प्रेम कभी हासिल हुआ ही नहीं। एक पति मिला, उससे भी बेवफाई मिली। प्यार से वंचित अलिथिया ने खुद की कंडीशनिंग ही ऐसी कर ली कि उसे प्यार चाहिए ही नहीं। लेकिन भीतर कहीं प्रेम की तलाश तो थी, जिसे महसूस करने के लिए उसे जिन्न जैसे किसी अपने प्रतीत होने वाले किरदार की तलाश थी। 

.

हममें से न जाने कितनों के भीतर छुपी ख्वाहिशें हैं, जुबां तक जो कभी आती ही नहीं। सबके भीतर चाहनाओं के तमाम किस्से दफन हैं, जिन्हें जी लेने की दरकार तो है पर अक्सर इन किस्सों के किरदार लापता होते हैं। 

.

जिस दिन सही किरदार मिल जावे, उस दिन वह किस्सा जिंदगी की कहानी बन जाता है। 

.



Comments

Popular posts from this blog

ओशो

My Favorite book list (Nonu)

इंसान का वज़न हर बार तौलने से नहीं..कई बार बोलने से भी पता चल जाता हैं..!!