जीवन

 जीना भूल गए हैं हम..



कई हिस्सों में बंट गए हैं

खुद को क्या क्या सिखा रहे हैं।

ये रिश्तों की ज़िम्मेदारी साहब

हम किश्तों में निभा रहे हैं।।


आठों पहर है दौड़ भाग

झूले सा झूल गए हैं हम।

न जाने क्या पाने में

जीना भूल गए हैं हम।।


इक गुब्बारे की खातिर हम

जब दिन भर रोते थे।

ये बात है उस दौर की

जब हम बच्चे थे छोटे थे।।

अब सब कहते हैं हम बड़े हो गए।

अपने पैरों पर खड़े हो गए।।


लेकर बस्ता खुद से बड़ा

जब से स्कूल गए हैं हम।

न जाने क्या पाने में

जीना भूल गए हैं हम।।


इस भागते हुए जीवन में

रफ्तार की राहें ठानी है।

मंज़िल का कुछ भी पता नही

बस सफर से खींचातानी है।।

ये सेल्फी वाली मुस्कान भला

कब तक ठहरेगी चेहरों पर।

तूफ़ान उठा है मन के भीतर

हम तैर रहे हैं लहरों पर।।


खाली अंतर्मन की शाम लिए

थक कर फूल गए हैं हम।

न जाने क्या पाने में

जीना भूल गए हैं हम।।


वक्त की रफ्तार से हम मनुष्य कदम मिलाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। ऐसे में जीवन तो चल रहा है किंतु जीवन को जीने की जो अनुभूति है वह कोने में खड़ी बेबस झांक रही है।


 



अंकित

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