बिजनेस हो या नौकरी

 


सफल वही हो सकता है,जो प्रोफेशनल हो, इमोशनल व्यक्ति अमूमन असफल हो जाता है अथवा उसे धोखा खाकर पछताना पड़ता है।


धंधे अथवा नौकरी में रिश्ते/दोस्ती और व्यवहार/लेन-देन का परस्पर घालमेल कदापि नहीं करना चाहिए अर्थात् रिश्ता/दोस्ती अपनी जगह है, और व्यवहार/लेन-देन अपनी जगह। 


मैं इस मामले में अपने एक वरिष्ठ मित्र को अपना आदर्श मानता हूॅं, जो हमेशा कहता है कि चाहे कोई कितना भी घनिष्ठ हो,उसके साथ काम शुरू करने से पहले वेतन तय करो और महीना पूरा होते ही अधिकतम पाॅंच दिन के अंदर मजदूरी ले लो,वरना छठे दिन यह कह दो कि रिचार्ज ख़त्म हो गया है और बिना रिचार्ज मशीन काम नहीं करती।


हालाॅंकि विश्वास पर दुनिया टिकी है और अपणायत में एक- दूसरे का विश्वास भी करना पड़ता है,मगर यह भी एक निश्चित सीमा तक ही उचित है, वरना कई बार वक्त के साथ हालात कुछ इस कदर बदलते हैं कि नीयत और रिश्तों के मायने दोनों ही बदल जाते हैं,तब अहसास होता है कि काश! इतना विश्वास न किया होता।


समझदारी तो इसी में है कि दोस्ती/ रिश्ते को बरकरार रखते हुए भी लेन-देन/व्यवहार के मामले में स्टैंड क्लीयर रखना चाहिए और यही दोनों पक्षों के हित में होता है, क्योंकि ऐसे मामलों में केवल आर्थिक नफ़ा- नुक़सान ही नहीं होता, बल्कि कई मर्तबा पारस्परिक रिश्तों में भी कहीं न कहीं दरार आने की आशंका रहती है।


वैसे व्यावहारिकता यह है कि जीवन में लेन-देन को लेकर कभी ऐसी स्थिति आ भी जाए ,तो इसके प्रभाव से रिश्तों को महफ़ूज़ रखना चाहिए, क्योंकि आर्थिक नफ़े-नुकसान से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं - हमारे रिश्ते,

और

हम बख़ूबी जानते हैं कि आर्थिक नफ़े-नुकसान की तो भरपाई भी हो सकती है, मगर रिश्तों में आई दरार को पाटना लगभग नामुमकिन-सा होता है

इसलिए 

अगर जीवन में कुछ छोटी-छोटी बातें ध्यान में रखी जाएं तो आर्थिक नफ़े- नुकसान से भी बचा जा सकेगा और हमारे रिश्तों की शुचिता भी कायम रहेगी 

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