Posts

35 वर्ष पहले मेरे बचपन की दिवाली

Image
आज का भ्रम और बचपन की हकीकत 35 वर्ष पहले गाँव का जीवन उतना ही सरल था जितना ग्रामीण संस्कृति की विशेषता बताने वाले समाजशास्त्री अपनी किताबों में लिखते हैं। इस सरल ग्रामीण जीवन में बच्चों का बचपन और भी ज्यादा मासूम था। दिवाली की जैसी उत्सुकता आज के बच्चों में है, वैसी हम में नहीं थी, क्योंकि मिट्टी के बने हमारे कच्चे घर में इस दिन न नये वस्त्र पहने का रिवाज था, न पकवान बनाने का और न ही पटाके फोड़ने का। इस दिन सुबह दादाजी अपने प्रतिदिन की दिनचर्या से हटकर सबसे पहले स्नान कर लेते थे और दादीजी गेंहू के दलिये की खीर (क्योंकि पैसों के अभाव में चावल खरीदना मुश्किल होता था) बनाने का उपक्रम शुरू कर देती थी। हम बच्चे उस घड़ी का इंतजार करते थे जब दादाजी उस खीर का भोग हमारे पितृ देवों को चढ़ाते थे, ताकि प्रसादस्वरूप हमें खीर खाने को मिल सके। पेट भर जाने के बाद भी बालमन को तृप्ति नहीं होती थी तो गाँव के और लोगों के पितृ देवों के चबूतरों पर दौड़कर पहुँच जाते थे, जहॉ पीपल के पत्तों पर और खीर खाने का मौका मिल जाता था। हमारे लिए दिवाली का दिन पितृ देवों के लिए बनी अमावस्य की खीर के स्वाद का आनंद लेत...

लंका-विजय के बाद

तब भारद्वाज बोले, "हे ऋषिवर, आपने मुझे परम पुनीत राम-कथा सुनाई, जिसे सुनकर मैं कृतार्थ हुआ। परन्तु लंका-विजय के बाद बानरो के चरित्र के विषय में आपने कुछ नहीं कहा. अयोध्या लौटकर बानरों ने कैसे कार्य किए, सो अब समझाकर कहिये." याज्ञवल्क्य बोले, "हे भारद्वाज, वह प्रसंग श्रद्धालु भक्तों के श्रवण योग्य नहीं है। उससे श्रद्धा स्खलित होती है. उस प्रसंग के वक्ता और श्रोता दोनों ही पाप के भागी होते हैं." तब भारद्वाज हाथ जोड़कर कहने लगे, "भगवन, आप तो परम ज्ञानी हैं। आपको विदित ही है कि श्रद्धा के आवरण में सत्य को नहीं छिपाना चाहिए. मैं एक सामान्य सत्यांवेशी हूँ. कृपा कर मुझे बानरों का सत्य चरित्र ही सुनाईए." याज्ञवल्क्य प्रसन्न होकर बोले, "हे मुनि, मैं तुम्हारी सत्य-निष्ठा देखकर परम प्रसन्न हुआ. तुममें पात्रता देखकर अब मैं तुम्हें वह दुर्लभ प्रसंग सुनाता हू, सो ध्यान से सुनो." इतना कहकर याज्ञवल्क्य ने नेत्र बंद कर लिए और ध्यान-मग्न हो गए। भारद्वाज उनके उस ज्ञानोद्दीप्त मुख को देखते रहे. उस सहज, शांत और सौम्य मुख पर आवेग और क्षोभ के चिन्ह प्रकट होन...

जाया करो गरीबों की बस्ती में भी कभी-कभी...!!! *कुछ भी नहीं तो शुक्र-ए-खुदा सीख जाओगे....!!!

जिनके पास अपने हैं, वो अपनो से झगड़ते हैं, जिनका कोई नहीं अपना, वो अपनो को तरसते हैं कल न हम होगे न गिला होगा, सिर्फ सिनटी हुई यादो का सिलसिला होगा, जो लम्हें हैं चलो हंसकर बिता ले, जाने कल जिंदगी का क्या फैसला होगा!! शरीर की सुंदरता महत्वपूर्ण नहीं हैं, कर्म सुन्दर होने चाहिए, हमारे विचार हमारी वाणी, व्यवहार, संस्कार और हमारा चरित्र सुंदर होना चाहिये, जो जीवन में कर्म सुन्दर करता हैं, वही इंसान दुनिया का सबसे सुंदर शख्स हैं और जमाना भी उनका ही दीवाना हैं....!! विचार बहता हुआ पानी हैं, यदि इसमें आप, गंदगी मिलाएंगे तो वो, गंदा नाला बन जायेगा! और सुगंध मिलाएंगे तो फिर, वही गंगाजल कहलायेगा!! किसी ने पूछा कि उम्र और जिंदगी, में क्या फर्क हैं? बहुत सुंदर जवाब... जो अपनो के बिना बीती वो उम्र, और जो अपनो के साथ बीती वो जिंदगी हैं!! बदलता वक्त..... और बदलते लोग..... किसी के भी नहीं हुआ करते.....! सच्चा व्यक्ति ना तो नास्तिक होता हैं.... ना ही आस्तिक होता हैं..... सच्चा व्यक्ति हर समय वास्तविक होता हैं....!! आँसू न होते जो आँखे इतनी खुबसूरत न होती, दर्द न ...

मैया, माई, "माँ" ।

लेती नहीं दवाई "माँ", जोड़े पाई-पाई "माँ"। दुःख थे पर्वत, राई "माँ", हारी नहीं लड़ाई "माँ"। इस दुनियां में सब मैले हैं, किस दुनियां से आई "माँ"। दुनिया के सब रिश्ते ठंडे, गरमागर्म रजाई "माँ" । जब भी कोई रिश्ता उधड़े, करती है तुरपाई "माँ" । बाबू जी तनख़ा लाये बस, लेकिन बरक़त लाई "माँ"। बाबूजी थे सख्त मगर , माखन और मलाई "माँ"। बाबूजी के पाँव दबा कर सब तीरथ हो आई "माँ"। नाम सभी हैं गुड़ से मीठे, मां जी, मैया, माई, "माँ" । सभी साड़ियाँ छीज गई थीं, मगर नहीं कह पाई  "माँ" । घर में चूल्हे मत बाँटो रे, देती रही दुहाई "माँ"। बाबूजी बीमार पड़े जब, साथ-साथ मुरझाई "माँ" । रोती है लेकिन छुप-छुप कर, बड़े सब्र की जाई "माँ"। लड़ते-लड़ते, सहते-सहते, रह गई एक तिहाई "माँ" । बेटी रहे ससुराल में खुश, सब ज़ेवर दे आई "माँ"। "माँ" से घर, घर लगता है, घर में घुली, समाई "माँ" ।...

Life_in_a_metro

अक्टूबर के महीने में शहर बदल सा जाता है.. रात के वक़्त दूधिया रोशनी से नहायी खाली सड़कें.. किसी ऑफिस के बाहर सड़क के किनारे देर रात तक खुलने वाली चाय की टपरी पर गले मे i-कार्ड लटकाये अपनी ही दुनिया में खोये हुए चार दोस्त.. भीनी भीनी सी किसी खास फूल/पौधे से आती सुगंध.. हल्का सा ठंड का अहसास.. और चारों तरफ फैले सन्नाटे के बीच कभी कभी किसी गाड़ी के गुजरने की आवाज़.. मन करता है कुछ गुनगुनाते हुए ड्राइव करें.. फिर लगता है कि FM पर ही किसी जॉकी को क्रिएटिव होने का काम आउटसोर्स करके उसकी ही बातें सुनें.. समान्यतः इस महीने में दुनियादारी की दिक्कतें कम होती है.. और मिजाज फेस्टिव होता है.. न अप्रेजल का युद्ध.. न फीडबैक का चकल्लस.. शायद सबसे कम रेसिग्नेशन इसी महीने पड़ते होंगे.. हल्की सी ठंडी हवा जब हाफ स्लीव टी शर्ट से टकराती है.. तब अवचेतन मन में अपने आप दीवाली का अहसास होने लगता है.. और जब दीवाली की बात होती है.. तो कभी ये शहर याद नहीं आता जहां रोजी रोटी की तलाश में बसे हैं.. याद आता है वो घर..जहाँ होश संभालते ही दीवाली मनायी थी.. दीवाली के नाम पे अब बस पटाखे चलाने या न ...

अत्यंत लघु कथा

✍ एक वृद्धाश्रम में *दो समधन* मिली .. कौन किसको दोष दे ? 🙏

बिना दहेज़ के

अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए, उसके चहरे पर पहले तो बिल्कुल मासूम सी मुस्कराहट फैल जाती है, फिर वह मुस्कराहट उदासी में बदलते हुए पलकों पर अश्रु के बूँदों के रूप में नज़र आने लगती है। फिर थोड़ा नाख़ुश सा होकर कहती है, मैँ कहती थी ना पुरानी बातें तकलीफ़ देती है, ना जाने क्यों तुम हमेशा गुजरे ज़माने की बातें करते हो? उसने बताया कि वह बचपन में बहुत शरारती थी, घर में सबसे छोटी थी तो सबकी लाडली भी थी। निश्चय ही वह बचपन में बहुत खूबसूरत और चंचल रही होगी। उसके दो बड़े भाई और दो बड़ी बहनें है।बहुत कहने पर उसने अपनी संक्षिप्त आपबीती सुनाई, उसने बताया कि जब वह बारहवीं कक्षा में थी तो उसके घर पर उसके छोटे भैया का दोस्त आया करता था, परिवार में सब लोग उसके व्यक्तित्व और व्यवहार से प्रभावित थे। वह अक्सर छोटे भैया के साथ ही आता और हल्का - फुल्का चाय नाश्ता करके फिर भैया के साथ ही चला जाता था। पहली बार जब मैं उनदोनों को चाय देने गई तो वह लड़का मुझे बहुत ही उदास नजरों से देर तक देखता रहा था। धीरे - धीरे उसका घर पर आना - जाना बढ़ गया था, मुझे भी वह अच्छा लगता था मगर हमारे बीच एक - दूसरे को देखने के अलावा ...