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परथन का आटा

रोटियाँ बेल रही माँ के कंधे पर झूलती वो छोटी बच्ची ज़िद करती थी अक्सर माँ ! रहने दो ना एक आखिरी छोटी वाली लोई मैं भी बनाऊँगी एक रोटी जो तुम्हारी बनायी रोटी से होगी बहुत छोटी जैसे मैं तुम्हारी बेटी छोटी-सी वैसे ही तुम्हारी बड़ी रोटी की बेटी मेरी वाली छोटी रोटी। और तब माँ समझाती बड़े ही प्यार से रोटी छोटी हो या बड़ी एक रोटी दूसरी रोटी की माँ नहीं होती हाँ ! बहन हो सकती है। तब आश्चर्य से पूछती वो मासूम बच्ची अच्छा! तो फिर रोटियों की माँ कौन होती है? गोद में बिठा कर बेटी को माँ हँसकर कहती ये जो परथन का आटा है ना यही रोटियों की माँ होती हैं जो सहलाती हैं उसे दुलारती है, पुचकारती है लिपटकर अपनी बेटी से बचाती है उसे बेलन में चिपकने से ताकि वो नाचती रहे, थिरकती रहे और ले सकें मनचाही आकार। आज वो बच्ची बड़ी हो गई है और अहसास हो रहा है उसे सचमुच माएँ भी बिल्कुल परथन के आटा की तरह होती हैं जिनके दिए संस्कार, प्यार-दुलार, दुआएं लिपटी रहती हैं ताउम्र अपनी संतान से ताकि सही आकार लेने से पहले ही वक्त के बेलन तले चिपककर थम न जाये उसकी जिंदगी।

आँधी आ ही जाती है

आँधी आ ही जाती है हल्की-सी आँधी में भी डालियाँ गिर पड़ती हैं अक्सर उन्हीं के सिर पर जिनके हाथों ने संभाल कर रखा था बीज और सही समय आने पर मिट्टी में दिये जाने से हुआ था वह अंकुरित। फूटी थी उसकी कोंपलें तो उन्हीं हाथों ने किया देखभाल उन्हें सींचा उन्हें पाला उन्हें पोसा नन्हे बीज से फलदार और छायादार विशाल वृक्ष बनाया। पर वह सृजक जब-जब जाता है उस वृक्ष के नीचे थोड़े फल और थोड़ी छाया की चाह में तब-तब पता नहीं क्यों ? आँधी आ ही जाती है।

बाबा नागार्जुन---बापू को ही बना रहे हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के!

बापू को हीबना रहे हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के! बच्चे होंगे मालामाल ख़ूब गलेगी उनकी दाल औरों की टपकेगी राल इनकी मगर तनेगी पाल मत पूछो तुम इनका हाल सर्वोदय के नटवरलाल सेठों का हित साध रहे हैं तीनों बन्दर बापू के! युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बन्दर बापू के! सत्य अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बन्दर बापू के! पूँछों से छबि आँक रहे हैं तीनों बन्दर बापू के! दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बन्दर बापू के! मुस्काते हैं आँखें मीचे तीनों बन्दर बापू के! छील रहे गीता की खाल उपनिषदें हैं इनकी ढाल उधर सजे मोती के थाल इधर जमे सतजुगी दलाल मत पूछो तुम इनका हाल सर्वोदय के नटवरलाल मूंड रहे दुनिया-जहान को तीनों बन्दर बापू के! चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बन्दर बापू के! करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बन्दर बापू के! बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बन्दर बापू के! गाँधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बन्दर बापू के! असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बन्दर बापू के! दिल चटकीला, उजले बाल नाप चुके हैं गगन विशाल फूल गए हैं कैसे गाल मत पूछो तुम इनका हाल सर्वोदय के नटवरलाल हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनो...

सच न बोलना ----नागार्जुन(रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा, कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!)

मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को, डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को! जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा! सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा! जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है! बंद सेल, बेगूसराय में नौजवान दो भले मरे जगह नहीं है जेलों में, यमराज तुम्हारी मदद करे। ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का, फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका! बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे! भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे! ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है, अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है! सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर! छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे, देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे! जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा, काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा! माताओं पर, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं! बच्चे, बूढ़े-बाप तक न ...

अहंकारी पिता और आज्ञाकारी पुत्र !

गंगा बाई से मन भर गया. बुढ़ापे में भी जवानी हिचकोले मारने लगी. एक दिन नज़र सत्यवती पर पड़ी, बेटी के उम्र की थी आशीर्वाद देकर आगे बढ़ा जा सकता था ! लेकिन शांतनु की वासना जाग उठी, उसे दिन रात सिर्फ सत्यवती का शरीर नज़र आने लगा. प्रजा भुखी थी, राज्य का कामकाज कुछ ठीक नही चल रहा था. शांतनु अपनी वासना की दुनिया में खोया हुआ था ! सुबह होते ही उसने सत्यवती से निवेदन किया क्या तुम मुझसे विवाह करोगी. सत्यवती बड़ी बुद्धिमान महिला थी, उसने कहा.. हे राजन सीधे सीधे क्यों नही कहते तुम्हे मेरा शरीर का भोग लगाना है.. इतना घुमा फिराकर कहने की क्या जरुरत है... करुँगी विवाह लेकिन मेरी एक शर्त है, मेरी कोख से जन्मा बालक ही हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी होगा. शांतनु बीच मझधार में फंस गया ! भीष्म ने कहा हे पिता क्यों एक मामूली सत्यवती के लिए व्याकुल हो, आपके हरेम महल में एक से एक टन टन टका टक महिलाएं हैं. शांतनु ने कहा आंखें अटक गई हैं सत्यवती के शरीर के लिए काश तुम आज्ञाकारी पुत्र होते ? भीष्म ने आज्ञाकारी पुत्र का दायित्व निभाते हुए आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा ली. पुरे राज्य में आज्ञाकारी पुत्र की ...

ईश्वरचंद्र विद्यासागर

एक बालक नित्य विद्यालय पढ़ने जाता था। घर में उसकी माता थी। माँ अपने बेटे पर प्राण न्योछावर किए रहती थी,उसकी हर माँग पूरी करने में आनंद का अनुभव करती। पुत्र भी पढ़ने-लिखने में बड़ा तेज़ और परिश्रमी था। खेल के समय खेलता, लेकिन पढ़ने के समय का ध्यान रखता। एक दिन दरवाज़े पर किसी ने - 'माई! ओ माई!' पुकारते हुए आवाज़ लगाई तो बालक हाथ में पुस्तक पकड़े हुए द्वार पर गया, देखा कि एक फटेहाल बुढ़िया काँपते हाथ फैलाए खड़ी थी। उसने कहा, 'बेटा! कुछ भीख दे दे।' बुढ़िया के मुँह से बेटा सुनकर वह भावुक हो गया और माँ से आकर कहने लगा, 'माँ! एक बेचारी गरीब माँ मुझे बेटा कहकर कुछ माँग रही है।' उस समय घर में कुछ खाने की चीज़ थी नहीं, इसलिए माँ ने कहा, 'बेटा! रोटी-भात तो कुछ बचा नहीं है, चाहे तो चावल दे दो।' पर बालक ने हठ करते हुए कहा -'माँ! चावल से क्या होगा? तुम जो अपने हाथ में सोने का कंगन पहने हो, वही दे दो न उस बेचारी को। मैं जब बड़ा होकर कमाऊँगा तो तुम्हें दो कंगन बनवा दूँगा।' माँ ने बालक का मन रखने के लिए सच में ही सोने का अपना वह कंगन कलाई से उतारा और कहा,...

जकडन रीति रिवाजों की

                अत्यधिक पढ़ी ' विभा 'घर परिवार के बंधनों में कैद मन की अभिलाषा का कत्ल करती रही । परंतु फिर भी किसी पारिवारिक सदस्य को प्रसन्न नही कर पाई। लम्वा घूंघट लाले सुबह नहा धोकर सास ससुर के पैर छूकर दिन का शुभारंभ करती है । उस पर भी बातें सुनती , उसका मन नही समझ पाता कि कैसी कैद है ? जहां उसे अपने मन की रचना करने की स्वतंत्रा नही है। अपना कमरा भी अपने हाथ की बनी कलाकृति से नही सजा पाती । लगाई थी कमरे की दीवार पर कभी अपने हाथ से काढ़ा कर बनाई साटन के कपडे पर राधा कृष्ण की मूरत । सास यह कह कर उठा लेगई "अरे बहू भगवान की मूरत है मंदिर में होनी चाहिए, फिर यहा सब देखेंगे तो तेरे हाथो को नजर लग जायगी " ।विभाग समझ नही पाई कि उसके हाथ इतने गुणकारी है तो खाने की प्रशंसा क्यो नही करते है ।             इस प्रकार कुछ रीति रिवाजों की कैद कुछ सास के लगाये बंधन , जिंदगी आगे सरक रही थी , पर विभा का अंतः मन कभी कभी बहुत छटपटाता कि किस प्रकार वह इस सब से स्वतंत्र हो।कुछ लोग दुनिया को ताकत और लड़ाई से जितना चाहते है।कुछ ...