जकडन रीति रिवाजों की
अत्यधिक पढ़ी ' विभा 'घर परिवार के बंधनों में कैद मन की अभिलाषा का कत्ल करती रही । परंतु फिर भी किसी पारिवारिक सदस्य को प्रसन्न नही कर पाई। लम्वा घूंघट लाले सुबह नहा धोकर सास ससुर के पैर छूकर दिन का शुभारंभ करती है । उस पर भी बातें सुनती , उसका मन नही समझ पाता कि कैसी कैद है ? जहां उसे अपने मन की रचना करने की स्वतंत्रा नही है।
अपना कमरा भी अपने हाथ की बनी कलाकृति से नही सजा पाती । लगाई थी कमरे की दीवार पर कभी अपने हाथ से काढ़ा कर बनाई साटन के कपडे पर राधा कृष्ण की मूरत । सास यह कह कर उठा लेगई "अरे बहू भगवान की मूरत है मंदिर में होनी चाहिए, फिर यहा सब देखेंगे तो तेरे हाथो को नजर लग जायगी " ।विभाग समझ नही पाई कि उसके हाथ इतने गुणकारी है तो खाने की प्रशंसा क्यो नही करते है ।
इस प्रकार कुछ रीति रिवाजों की कैद कुछ सास के लगाये बंधन , जिंदगी आगे सरक रही थी , पर विभा का अंतः मन कभी कभी बहुत छटपटाता कि किस प्रकार वह इस सब से स्वतंत्र हो।कुछ लोग दुनिया को ताकत और लड़ाई से जितना चाहते है।कुछ लोग कद और पद से।पर कुछ विशिष्ट और बिरले होते है जो दुनिया को हस्ते और हंसाते जीत लेते है । एक अवशर की प्रतीक्षा कर रही थी विभा की जिंदगी । कुछ एसे भी विरले होते है जिनकी खुद की हुकूमत दूसरों के दिलो पर होती है। पर विभा के साथ येसा न था । फिर एक दिन कुछ ऐसी स्थिति विभा के सामने आ पडी ,हालात ऐसे रहे कि सभी बंधन टूट गये और उसे मान और सम्मान भी मिला ।
बात उस दिन की है जब घर के सभी पुरुष एक रिश्तेदार के लड़के की शादी में गये हुये थे ।सुबह के स्नान के बाद विभा की सास अपने हाथ से धोये हुये कपडे ऊपर छत पर बधे तार पर फैलाने के लिए जीना चढ़ रही थी कि साडी पैर के नीचे आ गई जीना आधे से अधिक चढ़ चुकी सास जी खुद को सभाल नही सकी और लुढ़कते हुई नीचे फर्ष पर आ गिरी । चालीस पैंतालीस की उम्र और बाल्टी का बजन नही सभाला गया उन से । बाल्टी भी लुढ़कते हुये उनके माथे से टकरा कर घाव बना गई । वह चेतना हीन हो गई । विभा उस समय रसोई मे थी उसने आवाज सुनी और दौडती हुई आई उस समय घूंघट एक ओर फेक कर सास को उठाने का प्रयास किया पर नहीं सभाल सकी , तब जिस हाल में थी उस हाल में ही पडोस में रह रहे पाडे जी के घर जा कर सारा हाल बताते हुये सहायता मांगी। इस समय उसे होश नही था कि उसका घूंघट खुला है और पाडे जी उसके ससुर के मित्र होने के नाते स्वसुर ही है। फिर क्या था बंधन खुल गये थे ,रीति रिवाज भी खंडित हुआ था पर विभा को तो जेल से जैसे छुटकारा मिला । हुआ कुछ इस भांति
कि पड़ोस के पांडे अंकल जी की सहायता से विभा अपनी सास को उनकी ही कार से अस्पताल तक ले जा सकी ।जहा उनका इलाज हुआ सर पर चोट लगने से बेहोश सास जी अब होश में आ गई थी ,सर की चोट की मरहम पट्टी हुई । घर आने के बाद ही सास को उनके कमरे में लिटाने के बाद विभा बराबर बोल रही थी " माँ कितनी बार कहा है यह सब काम न करें पर आप मानती नही पूजा करने का यह मतलब तो नहीं कि यदि आप के कपडे कोई और सूखने डालेगा तो कपडे गदले हो जायेगे । अब आप गिर गई तो बेहोशी के समय किसने आप को नही छुआ है। अब आप तो गंदी हो गई है न ? अब आप नहा लीजिए पर बता दूं डा ० नें सर पर पानी डालने से मना किया है , अब आप पूजा कैसे करेगी भगवान तो मन के अंदर बैठे है मां जी ।" वह बडबडाती जा रही थी और उसकी सास प्यार से उसे देख रही थी। आज उनको समझ आ गया था कि यह घूंघट का बंधन यह नजर का लगना सब बेकार की बातें है । बारात से जब घर के पुरुष लौट कर घर आये तब सब को पता चला कि किस प्रकार विभा ने सब सभाला था , तो विभा के ससुर ने अपनी पत्नी से कहा कि " देखा आज जब उसने स्वयं की जकडन को तोड घर से बाहर कदम रखा तो तुमारी सेवा कर सकी । अब उस पर कोई बंधन नही लगाना । व्यक्ती जब स्वतंत्र होता है तभी आगे बढ़ सकता है । "
आज विभा एक रेडीमेड कपडे की दुकान की मालकिन है जहां कभी कभी उसके ससुर जी भी बैठते है।
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