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काशी विश्वनाथ-| प्रेम गली

| मैं कई गलियों से होकर गुजरा  तुम्हें खोजते ---- ---तृष्णा गली  --सूरत गली ---समाज गली ---तिरस्कार गली  ---कुण्ठा गली    ---धोखा गली  ---दुःख गली  ---झगड़ा गली  ---तंज गली  ---दंश गली  ---खीज गली   पर तुम कहीं न मिली --- ---मैं तुम्हें ढूँढते-ढूँढते      तुम्हारी कूक का इन्तजार करते                 थक गया  आखिर मैं उस गली में जा घुसा---- ---जिससे मेरा दूर-दूर का     खासकर प्रेम का कोई रिश्ता       नहीं था और आश्चर्य---------- ! तुम वहीँ मेरा इन्तजार करतीं --- ---मुस्कुरातीं---स्वागत में आगत खड़ी मिलीं न जाने तुम  कब से यहीं रहतीं थीं   यह तुम्हारा स्थाई पता था ---जो मुझे नहीं पता था  इसलिए मेरा हर सन्देश ---हर चिट्ठी  भटककर लौट आती थी  हाय ! मैं इस प्रेम गली में पहले क्यों नहीं घुसा ! प्रिये ! तुम्हारी यह प्रेम गली तो  बहुत खूबसूरत  अपनत्व भरी   ख़ुशी-ख़ुशी रहने लायक  गली है !...

मदारी-जब तक ये संसार नचाए, झूम झूम के नाचे जा ।

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मदारी की भी तो कुछ मजबूरियां रही होंगी ... वर्ना कौन अपना वक्त जाया कर के मुझे इस कदर नचाता ... ~ अब जब मदारी जिस रोज घर से बाहर नहीं निकलता है , उस रोज मै भयभीत हो जाता हूं । आज ना वो मुझे नचाएगा और ना ही मेरे नाचने पर चंद सिक्के आएंगे ...फिर भोजन कहां से आएगा ?  देर सुबह मै उसके पैर झकझोरता हूं - उठो , जागो अब देर हो रही । तुम्हे कमाने जाना है और मुझे नाचने । अब यही बंधन अच्छा लगता है । बंधन तो है लेकिन दो वक़्त की रोटी भी तो मिलती है । हां , मदारी जब अपने बड़े एल्युमिनियम के कटोरे से कुछ कुछ निकाल खाता है । मै भी वहीं बैठा रहता हूं - अब मुझे भी कुछ मिल जाएगा । देह हाथ कि थकान खत्म हो जाती है जब अंत में वो अपने झोले से केला निकालता है ।  कभी कभी मन करता है - भाग जाऊं , वापस लौट जाऊं अपने झुंड में । फिर अपने झुंड में अपनों को किस्से सुनाऊं - शहर के मदारी का खेल और उस खेल से निकले दो वक़्त की रोटी का ।  कौन सुनेगा उस झुंड में मेरे किस्से ... वो तो अपनी दुनिया में मस्त होंगे ...एक टहनी से दूसरी टहनी ...अपनी प्रकृति के संग ...अपनी दुनिया में मस्त ... या फिर मै ही फंस गया या...

आसान नहीं होता प्रतिभाशाली स्त्री से प्रेम करना

आसान नहीं होता प्रतिभाशाली स्त्री से प्रेम करना, क्योंकि उसे पसंद नहीं होती जी हुजूरी, झुकती नहीं वो कभी जबतक न हो रिश्तों में प्रेम की भावना।  तुम्हारी हर हाँ में हाँ और न में न कहना वो नहीं जानती, क्योंकि उसने सीखा ही नहीं झूठ की डोर में रिश्तों को बाँधना। वो नहीं जानती स्वांग की चाशनी में डुबोकर अपनी बात मनवाना, वो तो जानती है बेबाक़ी से सच बोल जाना।  फ़िज़ूल की बहस में पड़ना उसकी आदतों में शुमार नहीं,  लेकिन वो जानती है तर्क के साथ अपनी बात रखना। वो क्षण-क्षण गहने- कपड़ों की माँग नहीं किया करती, वो तो सँवारती है स्वयं को अपने आत्मविश्वास से, निखारती है अपना व्यक्तित्व मासूमियत भरी मुस्कान से। तुम्हारी गलतियों पर तुम्हें टोकती है, तो तकलीफ़ में तुम्हें सँभालती भी है। उसे घर सँभालना बख़ूबी आता है, तो अपने सपनों को पूरा करना भी।  अगर नहीं आता तो किसी की अनर्गल बातों को मान लेना।  पौरुष के आगे वो नतमस्तक नहीं होती, झुकती है तो तुम्हारे निःस्वार्थ प्रेम के आगे। और इस प्रेम की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है। हौसला हो निभाने का तभी ऐसी स्त्र...

गमले के पौधे और जमीन के पौधे में बहुत फ़र्क होता है,

#बाज़🦅🦅 आज ये तस्वीर देखते ही साझा करने की इच्छा कर गई। बाज पक्षी जिसे हम ईगल या शाहीन भी कहते है। जिस उम्र में बाकी परिंदों के बच्चे चिचियाना सीखते है उस उम्र में एक मादा बाज अपने चूजे को पंजे में दबोच कर सबसे ऊंचा उड़ जाती है। पक्षियों की दुनिया में ऐसी Tough and tight training किसी और की नही होती। मादा बाज अपने चूजे को लेकर लगभग 12 Km ऊपर ले जाती है। जितने ऊपर अमूमन हवाई जहाज उड़ा करते हैं और वह दूरी तय करने में मादा बाज 7 से 9 मिनट का समय लेती है। यहां से शुरू होती है उस नन्हें चूजे की कठिन परीक्षा। उसे अब यहां बताया जाएगा कि तू किस लिए पैदा हुआ है ? तेरी दुनिया क्या है ? तेरी ऊंचाई क्या है ? तेरा धर्म बहुत ऊंचा है और फिर मादा बाज उसे अपने पंजों से छोड़ देती है। धरती की ओर ऊपर से नीचे आते वक्त लगभग 2 Km उस चूजे को आभास ही नहीं होता कि उसके साथ क्या हो रहा है। 7 Kmt. के अंतराल के आने के बाद उस चूजे के पंख जो कंजाइन से जकड़े होते है, वह खुलने लगते हैं। लगभग 9 Kmt. आने के बाद उनके पंख पूरे खुल जाते है। यह जीवन का पहला दौर होता है जब बाज का बच्चा पंख फड़फड़ाता है। अब धरती से ...

*ये तेरा घर, ये मेरा घर*

 "उफ़! पापा जी आपने पूरा घर ही गन्दा कर दिया| अभी अभी राधा ने पोछा मारा था और आपने चप्पलों के निशान छोड़ दिए| थोड़ी तो समझ होनी चाहिए आपको? आप बच्चे तो हैं नहीं"|  बहू रिया के मुँह से ये शब्द सुनकर अनिल जी हतप्रभ से खड़े रह गए| कैसे पुलिस की नौकरी में सिर्फ उनकी एक आवाज बड़े से बड़े मुजरिमों को हिला कर रख देती थी और आज उनकी बहू उन्ही के घर में इतना सुना रही है| तभी पत्नी  ने उन्हे सोफे पर बैठाते हुए कहा "कोई बात नहीं जी, बहू की बातों का क्या बुरा मानना? बस जुबान की तेज है, बाकी उसके मन में ऐसा कुछ नहीं है|"  अनिल जी ने पत्नी की आँखों में देखा जैसे पूछ रहे हों "सच में?" और फीकी सी हंसी उनके होठों पर तैर गई, लेकिन आँखों के कोर थोड़े से नम हो गये।  सोफ़े पर बैठे बैठे ही सोचने लगे कितने जतन से इस घर को खड़ा किया था| एक एक तिनका अपने हिसाब से रखवाया था इस घरौंदे का ताकि सेवा अवकाश के बाद पति पत्नी सुविधाओं के साथ आराम से रहेंगे| लेकिन आज सारी दुनिया उनके कमरे तक सिमट गई है| कमरे से बाहर निकलो तो कितना कुछ सुनना पड़ता था उन्हे, हॉल के अंदर फ़ायर पिट बनवाया ...

" मुझे अच्छा नही लगता "

पूरी उम्र ससुराल में गुजारी मैंने  फिर भी मायके से कफ़न मंगाना मुझे अच्छा नहीं लगता रूपाली टंडन जी की  लिखी है कविता मुझे बहुत पसंद आई इसीलिए आप सबसे शेयर कर रह हू शादीशुदा महिलाओ को कुछ बाते अचछी नहीं लगती,  पर वे किसी से कहती नहीं|उन्ही एहसासों को इकट्ठा करके एक कविता लिखी है|   "  मुझे अच्छा नही लगता " मैं रोज़ खाना पकाती हू,  तुम्हे बहुत पयार से खिलाती हूं,  पर तुम्हारे जूठे बर्तन उठाना  मुझे अच्छा नही लगता|  कई वर्षो से हम तुम साथ रहते है,  लाज़िम है कि कुछ मतभेद तो होगे,  पर तुम्हारा बच्चों के सामने चिल्लाना मुझे अच्छा नही लगता|  हम दोनों को ही जब किसी फंक्शन मे जाना हो,  तुम्हारा पहले कार मे बैठ कर यू हार्न बजाना  मुझे अच्छा नही लगता|  जब मै शाम को काम से थक कर घर वापिस आती हू,  तुम्हारा गीला तौलिया बिस्तर से उठाना  मुझे अच्छा नही लगता|  माना कि तुम्हारी महबूबा थी वह कई बरसों पहले,  पर अब उससे तुम्हारा घंटों बतियाना  मुझे अच्छा नही लगता|  माना कि अब ...

आसान नहीं है पुरुष होना भी....

आसान नहीं है पुरुष होना भी.... जो कभी पत्नी की ख्वाहिश, और! कभी बच्चों की जिद में, हर रोज खुद को खर्च करता है। कभी माँ के ताने? कभी पिता के डांट से, खामोश हो जाता है। पर दिमाग से हर रोज, जब वो खुद से लड़ता है। उसका कोई हिसाब नहीं होता! आसान नहीं है पुरूष होना भी.... कभी बेहिसाब सी ख्वाहिशें, कभी एहसासों का कत्ल करना। आने वाले कल की चिंता करना। पर मुस्कुराते हुये घर मे घुसना। मै हू ना! ये कहते हुए? पसीने की हर बूंद में बिकना। सब के हिसाब का जवाब देना। पर खुद सवालों में उलझा रहना! हाँ! आसान नहीं है पुरुष होना भी...