आसान नहीं है पुरुष होना भी....

आसान नहीं है पुरुष होना भी....
जो कभी पत्नी की ख्वाहिश,
और! कभी बच्चों की जिद में,
हर रोज खुद को खर्च करता है।
कभी माँ के ताने?
कभी पिता के डांट से,
खामोश हो जाता है।
पर दिमाग से हर रोज,
जब वो खुद से लड़ता है।
उसका कोई हिसाब नहीं होता!

आसान नहीं है पुरूष होना भी....
कभी बेहिसाब सी ख्वाहिशें,
कभी एहसासों का कत्ल करना।
आने वाले कल की चिंता करना।
पर मुस्कुराते हुये घर मे घुसना।
मै हू ना! ये कहते हुए?
पसीने की हर बूंद में बिकना।
सब के हिसाब का जवाब देना।
पर खुद सवालों में उलझा रहना!
हाँ! आसान नहीं है पुरुष होना भी...


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