काशी विश्वनाथ-| प्रेम गली

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मैं कई गलियों से होकर गुजरा 
तुम्हें खोजते ----

---तृष्णा गली 
--सूरत गली
---समाज गली

---तिरस्कार गली 
---कुण्ठा गली   
---धोखा गली 

---दुःख गली 
---झगड़ा गली 

---तंज गली 
---दंश गली 
---खीज गली  

पर तुम कहीं न मिली ---
---मैं तुम्हें ढूँढते-ढूँढते 
    तुम्हारी कूक का इन्तजार करते            
    थक गया 

आखिर मैं उस गली में जा घुसा----
---जिससे मेरा दूर-दूर का 
   खासकर प्रेम का कोई रिश्ता   
   नहीं था

और आश्चर्य---------- !
तुम वहीँ मेरा इन्तजार करतीं ---
---मुस्कुरातीं---स्वागत में आगत खड़ी मिलीं

न जाने तुम 
कब से यहीं रहतीं थीं  

यह तुम्हारा स्थाई पता था
---जो मुझे नहीं पता था 

इसलिए मेरा हर सन्देश
---हर चिट्ठी 
भटककर लौट आती थी 

हाय ! मैं इस प्रेम गली में पहले क्यों नहीं घुसा !

प्रिये ! तुम्हारी यह प्रेम गली तो 
बहुत खूबसूरत 
अपनत्व भरी  
ख़ुशी-ख़ुशी रहने लायक 
गली है !  

मैं जिंदगी के 
बेशकीमती साल 
व्यर्थ ही
संसार की चकाचौंध का 
अलमस्त राही बन  

अनजान गलियों में 
प्रेत-सा यूँ ही 
इधर-उधर भटकता रहा !

पर यह गली तो 
काशी की विश्वनाथ-गली सी 
शांत-प्रशांत-विश्रांत 
मोक्षप्रद गली है !

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