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क्रिकेट

 श्रीलंका का एक खिलाड़ी था, उसके दिमाग में बस एक ही चीज चलती थी…. क्रिकेट.क्रिकेट और बस क्रिकेट… अपनी कड़ी मेहनत और लगन के दम पर उसे श्री लंका की टेस्ट टीम में डेब्यू करने का मौका मिला…. पहली इन्निंग्स…… जीरो पे आउट दूसरी इन्निंग्स……. जीरो पे आउट . . . टीम से निकाल दिया गया…. . practice…practice….practice…. फर्स्ट क्लास मैचेज में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया और एक 21 महीने बाद फिर से मौका मिला। पहली इन्निंग्स…… जीरो पे आउट दूसरी इन्निंग्स……. 1 रन पे आउट … फिर टीम से बाहर। .. प्रैक्टिस….प्रैक्टिस….प्रैक्टिस…. फर्स्ट क्लास मैचेज में हजारों रन बना डाले और 17 महीने बाद एक बार फिर से मौका मिला…. पहली इन्निंग्स…… जीरो पे आउट दूसरी इन्निंग्स……. जीरो पे आउट . . . फिर टीम से निकाल दिया गया…. . प्रैक्टिस… प्रैक्टिस….प्रैक्टिस….प्रैक्टिस… प्रैक्टिस….प्रैक्टिस… और तीन साल बाद एक बार फिर उस खिलाड़ी को मौका दिया गया…..जिसका नाम था मर्वन अट्टापट्टू इस बार अट्टापट्टू नहीं चूका उसने जम कर खेला और ….श्रीलंका की और से 16 शतक और 6 दोहरे शतक जड़ डाले और श्रीलंका का one of the most successful कप्तान बना! सोचि...

गोलमोल भाषा और गोलमोल भाव ही आज की सफल कविता है।

 संभवतः यह 1930 के दशक के उत्तरार्द्ध की बात है। पटना-स्थित  बिहार समाजवादी दल  के कार्यालय में रामवृक्ष बेनीपुरी  राहुल सांकृत्यायन और युवा कवि कलक्टर सिंह केसरी जो पटना कालेज में दिनकर जी के सहपाठी थे, बैठे हुये थे।  "उस दिन जोश मलीहाबादी की अनेक रचनाओं को रामवृक्ष बेनीपुरीजी ने राहुलजी को सुनाया और तब यह शेर- 'कल तो कहते थे कि बिस्तर से उठा जाता नहीं आज दुनिया से चले जाने की ताकत आ गई!' "बोलो केसरी ! तुम हिंदी के कवि लोग इतनी गहरी बात इस सफाई और सरसता के साथ कह सकोगे ?  राहुलजी, आपका क्या खयाल है? हिंदी में इस तरह की आम- फहम भाषा का प्रयोग क्या संभव नहीं?" राहुलजी ने बड़ी देर तक सोचा और फिर कहना शुरू किया-" भाषा के विषय में मैं आपसे भी आगे हूँ, बेनीपुरीजी! मैं तो चाहूँगा कि क्षेत्रीय बोलियों में ज्यादा-से-ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित हों। जनता का साहित्य जनता के बौद्धिक स्तर को छूता हुआ नहीं बढ़ेगा, तो जनता पीछे छूट जाएगी और कवि-लेखक अपने आइवरी टावर में सुखपूर्वक निवास करेंगे।" "अच्छा केसरीजी, आप अपनी कितनी रचनाओं को जला चुके हैं ?" इस प्रश्न से ...

छलनी

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 “अगर हर आदमी अपनी ज़मीन के टुकड़े पर वह सब करे जो वह कर सकता है तो सारी पृथ्वी कितनी सुन्दर हो जाए...” ये बात अपनी ज़मीन के एक टुकड़े को दिखाते हुए बीसवीं सदी के सबसे महान कहानीकार अन्तोन चेखव एक दूसरे महान कलमकार मक्सिम गोर्की को कह रहे हैं,  “यदि मेरे पास बहुत सारे पैसे होते तो मैं इस ज़मीन पर बीमार ग्रामीण अध्यापकों के लिए एक सेहतगाह बनवा देता। एक बड़ी सुन्दर, बहुत ही उजली इमारत बनवाता, बड़ी बड़ी खिड़कियों और ऊँची-ऊँची छतों वाली। वहां बहुत बढ़िया पुस्तकालय होता, तरह-तरह के साज़, मधुमक्खियों के छत्ते, सब्जियों की क्यारियां, फलों के बाग़... वहां कृषिविज्ञान और मौसमविज्ञान पर व्याख्यान का प्रबंध किया जा सकता। एक अध्यापक को सब कुछ पता होना चाहिए मेरे भाई, सब कुछ।“ सबसे पहले तो इस सपने को देखिये, क्या खूबसूरत सपना है!!!  काश कि ऐसा सपना देखने वालों के पास उसे पूरा करने के पैसे भी होते।   -------------- “एक अध्यापक को सब कुछ पता होना चाहिए... सब कुछ” ये ‘सब कुछ’ क्या है? क्या ‘सब कुछ’ पता हो भी सकता है? अगर नहीं तो इतना महान लेख़क ऐसी ना हो सकने वाली बात क्यूँ कह रहा है? हमारे...

जब कभी नींद नहीं आती है तो ‘तुम’ आ जाती हों

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 जब कभी नींद नहीं आती है तो ‘तुम’ आ जाती हों, और जब ‘तुम’ आती हो तो फिर नींद नहीं आती। जब कभी अचानक यूँ आधी रात में नींद खुल जाती है और वापस देर तक आती नहीं तो मैं अक्सर तुम्हें सोचने लगता हूँ, पता नहीं लेकिन ऐसा प्रेम में पड़ने वाला हर लड़का शायद ऐसा करता हूँ।मनगढ़न्त ख़्वाब बुनने लगता है, ख़ुद की कहानी रचने लगता हैं..ख़यालों में ही एक फ़िल्म बनाने लगता हैं जिसमें हीरो भी वहीं है और डिरेक्टर भी वोहीं है और स्क्रिप्ट राइटर भी ख़ुद... और हीरोईन तुम..!! मेरी फ़िल्म थोड़ी अजीब है डिफ़्रेंट है अब तक रिलीज़ हुई  किसी भी रोमांटिक फ़िल्म से.. इस फ़िल्म में वो सारे रोमांटिक सीन है जो अभी तक राजेश खन्ना-मुमताज़, राज कपूर-नर्गिस, धर्मेंद्र-हेमा मालिनी, अमिताभ-रेखा और शाहरुख़-काजोल पर फ़िल्माए गए है... मुझे पुरानी फ़िल्मों वाला सादा-सिम्पल प्यार पसंद है ये अर्जुन-सिद्धार्थ-वरुण धवन वाला नहीं...  इसमें तुम साड़ी में हो  महाराष्ट्रियन साड़ी में.. बालों में गजरा लगाए और नाक में मराठी नथ डालें। मैंने तुम्हें वनपीस ब्लैक सूट या साड़ी पहनें नहीं देखा पर उससे तो कहीं ज़्यादा अच्छी और ख...

विधि_का_विधान_निश्चित_है

   ✍️ महाभारत युद्ध में अर्जुन पुत्र अभिमन्यु जिस समय वीरगति को प्राप्त हुए, उनकी पत्नी उत्तरा गर्भवती थी। उनके गर्भ से राजा परीक्षित का जन्म हुआ...जो महाभारत युद्ध के बाद हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे....जन्मेजय राजा परीक्षित के पुत्र थे।  एक दिन जन्मेजय ने वेदव्यास से कुतर्क किया। जहां आप थे ,भगवान श्रीकृष्ण थे, भीष्म, द्रोणाचार्य, धर्मराज युधिष्ठिर, जैसे महान लोग उपस्थित थे। फिर भी आप महाभारत के युद्ध को होने से नहीं रोक पाए और देखते-देखते अपार जन धन की हानि हो गई। यदि मैं उस समय रहा होता तो, अपने पुरुषार्थ से इस विनाश को होने से बचा लेता। अहंकार से भरे जन्मेजय के शब्द थे, फिर भी व्यास जी शांत रहे...उन्होंने कहा, पुत्र अपने पूर्वजों की क्षमता पर शंका न करो।  यह विधि द्वारा निश्चित था,जो बदला नहीं जा सकता था, यदि ऐसा हो सकता तो श्रीकृष्ण में ही इतना सामर्थ्य था कि वे युद्ध को रोक सकते थे। जन्मेजय अपनी बात पर अड़ा रहा। बोला मैं इस सिद्धांत को नहीं मानता.... आप मेरे जीवन की होने वाली किसी होनी को बताइए।....मैं उसे रोककर प्रमाणित कर दूंगा कि विधि का विधान निश्चित नहीं ह...

गुरू

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 एक धर्मसभा का कहीं आयोजन हुआ था. शहर से दूर के इलाके में. वहां विभिन्न धर्मों और धर्मों के विभिन्न पंथों और संप्रदायों के प्रचारक अपने शिष्यों के साथ आए थे. . व्याख्यान चल रहे थे. सभी अपने-अपने पंथ को श्रेष्ठ बताते और यह दावा करते कि केवल उनके संप्रदाय में दीक्षित होकर ही मानवमात्र का कल्याण हो सकता है. उनका मार्ग ही कल्याण का मार्ग है और सर्वश्रेष्ठ है. . सभास्थल के समीप ही एक दलदल थी. कोई व्यक्ति धोखे से उसमें गिर गया. दलदल में धंसने लगा तो उसने सहायता के लिए पुकारा. पुकार सनकर विभिन्न धर्मों और पंथों के प्रचारक आदि पहुंचे. . वह आदमी संकट में था लेकिन कोई सहायता को नहीं जा रहा था. कोई उपदेश देने लगता कि संसार भी ऐसा ही दलदल है अगर सही राह दिखाने वाले गुरू न हुआ तो इंसान ऐसे ही तड़पता रहता है. . कोई दर्शन बघारने लगा तो कोई लोक-परलोक पर भाषण करने लगा. कुछ लोग आयोजकों को भी कोसने लगे कि उन्हें दलदल के पास बाड़े लगवाने चाहिए थे. . एक आदमी के प्राण संकट में थे और चारों तरफ से ज्ञान की वर्षा हो रही थी. वहां से लकड़ियों का बड़ा सा गठ्ठर सिर पर लादे दो लकड़हारे गुजर रहे थे. शोर सुनकर वे...

Niketan and Yugantika

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 ऊँची शिक्षा, भाग्य और भगवद्भक्ति से कुछ हासिल नहीं होता। अपने व्यवसाय में सफल होने के लिए आपके अंदर कुटिलता पर्याप्त होनी चाहिए। चाहे आप किसी क्षेत्र में हों। बहुत लोग सोचते हैं कि मालिक की चापलूसी से हम हासिल कर लेंगे। नहीं, यह सफल होने सूत्र नहीं है। सफल होने के लिए आपको अपने नाखून पैने करने होंगे।पॉवर बैलेंस करने का सूत्र आपको आना चाहिए।अन्यथा ऊँचे परिवार में पैदा होने, कैम्ब्रिज में पढ़े होने से भी आप सफलता के शिखर पर नहीं पहुँच सकते। सफलता के गुर न कोई सिखा सकता है न कोई चौकड़ी आप को बता सकती है। बस भर्राई हुई आवाज़ में आप भड़ास निकाल सकते हो, रो सकते हो और बड़े आदमी हो तो महफ़िल छोड़ कर जा सकते हो। यह सब मानव सभ्यता की शुरुआत से ही कायरता की निशानी बताया गया है। इसीलिए आप कभी सफल नहीं हो पायेंगे। यह मैंने अपने ख़ुद के अनुभव से पाया और कभी भी शिखर पर नहीं पहुँच सका। मेरा मानना है, कि शिखर पर वही चढ़ते हैं, जो अपने संभावित शत्रुओं का नष्ट करते चलते हैं। सफल होना है तो जीवन पर्यंत अपने दुश्मनों को नष्ट करना सीखो भोलू!