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ईश्वर कौन है ?

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कौन चलाता है यह दुनियां को ??? कहाँ है ईश्वर?? तुम माँ के पेट में थे नौ महीने तक, कोई दुकान तो चलाते नहीं थे, फिर भी जिए। हाथ—पैर भी न थे कि भोजन कर लो, फिर भी जिए। श्वास लेने का भी उपाय न था, फिर भी जिए। नौ महीने माँ के पेट में तुम थे, कैसे जिए? तुम्हारी मर्जी क्या थी? किसकी मर्जी से जिए? फिर माँ के गर्भ से जन्म हुआ, जन्मते ही, जन्म के पहले ही माँ के स्तनों में दूध भर आया, किसकी मर्जी से? अभी दूध को पीनेवाला आने ही वाला है कि दूध तैयार है, किसकी मर्जी से? गर्भ से बाहर होते ही तुमने कभी इसके पहले साँस नहीं ली थी माँ के पेट में तो माँ की साँस से ही काम चलता था— लेकिन जैसे ही तुम्हें माँ से बाहर होने का अवसर आया, तत्क्षण तुमने साँस ली, किसने सिखाया? पहले कभी साँस ली नहीं थी, किसी पाठशाला में गए नहीं थे, किसने सिखाया कैसे साँस लो? किसकी मर्जी से? फिर कौन पचाता है तुम्हारे दूध को जो तुम पीते हो, और तुम्हारे भोजन को? कौन उसे हड्डी—मांस—मज्जा में बदलता है? किसने तुम्हें जीवन की सारी प्रक्रियाएँ दी हैं? कौन जब तुम थक जाते हो तुम्हें सुला देता है? और कौन जब तुम्हारी नींद पूरी हो जाती है तुम्हे...

थाली में परोसा भविष्य 🍛

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प्रातःकाल का वह समय था—लगभग पाँच बजे। जब सारा नगर नींद में डूबा होता था, मैं तब अपने मकान की गैलरी में सैर कर रहा होता था। वही समय होता था जब अख़बार वाला अपनी साइकिल की घंटी के साथ मेरे मुख्य द्वार के सामने से गुजरता, झटपट अख़बार फेंकता और मुझसे कहते हुए निकल जाता—"नमस्ते डॉक्टर साहब!" वक्त बीतता गया और मेरी दिनचर्या में परिवर्तन आ गया। अब मैं सुबह सात बजे उठने लगा। कई दिनों तक वह मुझे न देखकर शायद हैरान हुआ होगा। फिर एक रविवार को वह प्रातः नौ बजे मेरे घर आया। चेहरे पर चिंता, लेकिन स्वर में आदर। “डॉक्टर साहब,” उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, “एक बात कहूँ?” मैंने मुस्कराते हुए कहा, “ज़रूर, कहो।” वह बोला, “आपने सुबह जल्दी उठने की आदत क्यों छोड़ दी? आप ही के लिए मैं रोज़ विधान सभा मार्ग से सबसे पहले अख़बार उठाता हूँ और सोचता हूँ कि डॉक्टर साहब मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। इसलिए सबसे पहले आपका घर आता हूँ।” मैं थोड़ा चकित हुआ, “तुम विधान सभा मार्ग से आते हो?” “हाँ, साहब। वहीं से वितरण की शुरुआत होती है।” “तो फिर... जगते कितने बजे हो?” “ढाई बजे। साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ। सात बजे त...

जरा_याद_इन्हें_भी_कर_लो

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  बात फ़रवरी 1963 की है. चीन से लड़ाई ख़त्म होने के तीन महीने बाद एक लद्दाख़ी गड़ेरिया भटकता हुआ चुशूल से रेज़ांग ला जा पहुंचा. एकदम से उसकी निगाह तबाह हुए बंकरों और इस्तेमाल की गई गोलियों के खोलों पर पड़ी. वो और पास गया तो उसने देखा कि वहाँ चारों तरफ़ लाशें ही लाशें पड़ी थीं.... वर्दी वाले सैनिकों की लाशें. जानीमानी सैनिक इतिहासकार और भारतीय सेना के परमवीर चक्र विजेताओं पर मशहूर किताब 'द ब्रेव' लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, 'वो गड़ेरिया भागता हुआ नीचे आया और उसने भारतीय सेना की एक चौकी पर इसकी सूचना दी. जब सैनिक वहाँ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि हर मृत भारतीय सैनिक के शरीर पर गोलियों के कई-कई ज़ख्म थे. कई अभी भी अपनी राइफ़लें थामे हुए थे. नर्सिंग असिस्टेंट के हाथ में सिरिंज और पट्टी का गोला था." उन्होंने कहा, "किसी की राइफ़ल टूट कर उड़ चुकी थी, लेकिन उसका बट उसके हाथों में ही था. हुआ ये था कि लड़ाई ख़त्म होने के बाद वहाँ भारी हिमपात हो गया और उस इलाके को 'नो मैन्स लैंड' घोषित कर दिया गया. इसलिए वहाँ कोई जा नहीं पाया." रचना बिष्ट अपनी किताब में ...

बहु बिना बुलाए मायके भी नहीं जाना चाहिए*

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 * " मम्मी जी इस बार मैं अपने मायके जा रही हूं इसलिए आप छोटी से कह देना कि वो मेरे आने के बाद मायके चले जाए। वैसे भी मुझे अपने मायके गए हुए दो साल हो गए हैं" बड़ी बहू सोना ने ऊषा जी से कहा। " अरे बहू तू मायके जाकर क्या करेगी, अब तो तेरी मां भी नहीं रही। जब तक माता-पिता होते हैं तब तक ही मायका होता है। भाई भाभी का क्या है? बुलाए तो बुलाए, नहीं तो नहीं बुलाए। और वैसे भी तेरे मायके में कोई प्रोग्राम तो है  नहीं। अभी छोटी को ही जाने दे" ऊषा जी ने कहा। " नहीं मम्मी जी, हर बार में यही सोच कर रह जाती हूं। लेकिन इस बार नहीं। इस बार तो मैं मायके जरूर जाऊंगी। जब छोटी मायके जाती है तो मेरा भी मन करता है मायके जाने का " सोना ने कहा। " देख बहू, मैं तुझे मायके जाने के लिए मना नहीं करती, लेकिन जब तक माता-पिता होते हैं तब तक एक बेटी पर  बेधड़क अपने मायके आ जा सकती है। लेकिन जब गृहस्थी भाई भाभी के जिम्मे आ जाए तो बिना न्यौते के मायके नहीं  जाना चाहिए। इससे अपनी ही इज्जत घटती है"  ऊषा जी ने समझना चाहा। " मम्मी जी भाई भाभी तो मेरे ही है ना। भाई तो मेरे साथ ही ...

4 पत्नियां

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 ‘हर व्यक्ति की 4 पत्नियां होनी चाहिए’  #बुद्ध के अनुसार किसी व्यक्ति की एक नहीं,  दो नहीं, बल्कि 4 पत्नियां होनी चाहिए।  एक समय की बात है,  एक व्यक्ति था जिसकी 4 पत्नियां थीं।  यह उस दौर की बात है जब भारत में एक पुरुष को  एक से अधिक पत्नियां रखने की इजाजत थी।  उसका जीवन काफी अच्छा चल रहा था,  लेकिन परेशानियां भी अधिक दूर नहीं थीं। वह काफी बीमार पड़ गया,  उसकी बीमारी ठीक ना होने की  कगार पर आ गई थी।  अब उसे समझ आ गया था कि  उसकी मृत्यु का समय बेहद नजदीक है।  इस बात का आभास होने पर वह काफी  अकेला और उदास रहने लगा। लेकिन तब उसने हिम्मत करके अपनी पहली  पत्नी से एक प्रश्न किया,  “प्रिय, मेरी मृत्यु काफी नजदीक है,  बहुत जल्द मैं अपना शरीर त्यागकर संसार से  मुक्त हो जाऊंगा।  लेकिन मैं अकेले ही यह सफर  तय नहीं करना चाहता।  मैंने हमेशा तुमसे प्यार किया और  अब भी करता हूं,  क्या तुम मृत्यु के बाद मेरे साथ  चलोगी, जहां भी मैं जाऊं?” इस बात को सुनकर कुछ क्षण के लिए  उस ...

लेखकों की दुनिया में से।

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 लेखकों के बारे में आज की पोस्ट डिस्टर्ब करने वाली है।  मनोरोगी या विक्षिप्त हो जाने वाले लेखक दुनिया में ऐसे लेखकों की बहुत बड़ी तादाद रही है जो लेखन के भीतरी या बाहरी दबाव या इतर सामाजिक और पारिवारिक दबाव झेल नहीं पाये और मानसिक रोग पाल बैठे। कुछ तो एकाधिक बार पागल करार दिये गये और उन्हें पागलखानों में भी भरती कराया गया।  ऐसे बहुत से लेखक रहे जो अपने मनोरोगों से जीते जी निजात न पा सके और अंततः आत्म हत्या तक कर बैठे।  कुछेक लेखक अगर मनोरोगी नहीं भी हुए तो भी बायपोलर डिस्आर्डर जैसे गंभीर रोग पाले रहे और इस कारण साहित्य को उतना न दे सके जितना वे दे सकते थे। आगे की पंक्तियों में ऐसे ही कुछ अभागे लेखकों के बारे में बात की गयी है। अर्नेस्ट हेमिंग्वे आत्महंता परिवार से नाता रखते थे। उनके परिवार में कई लोगों ने आत्महत्या की थी। ऊपर से शराब की लत ने रही सही कसर पूरी कर दी थी। वे मनोरोगी हो गये और बायपोलर डिस्आर्डर के शिकार हो गये तथा दूसरे कई रोग पाल बैठे। उन्हें कम से कम 15 बार बिजली के झटके दिये गये थे। अंततः गोली मार कर खुदकुशी कर ली थी। अन्ना भाऊ साठे को शराबखोरी की लत ...

हर कोई एक प्लस है!!

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 **"जो लोग राजाओं को ताज पहनाते हैं, वे खुद राजा नहीं दिखते; सावधान रहें!!"** एक गरीब आदमी ने 40 साल की उम्र में एक किताब लिखी और उसे अपने जन्मदिन पर लॉन्च करने का फैसला किया। उसके पास लॉन्चिंग के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उसने अपने समुदाय के एक करोड़पति से मदद मांगने का फैसला किया। वह करोड़पति के घर गया और बातचीत के बाद उसने अपनी समस्या बताई। करोड़पति ने उसे एक कागज और कलम निकालने को कहा और कहा, "मैं तुम्हें एक परीक्षा दूंगा। अगर तुम पास हो गए, तो मैं तुम्हें पैसे दूंगा और अगर फेल हो गए, तो भी मैं तुम्हें पैसे दूंगा।" फिर उसने उस आदमी से 10 लोगों के नाम लिखने को कहा जो उसकी किताब के लॉन्च पर 10 हज़ार रुपये दे सकते हैं। हैरानी की बात यह थी कि वह आदमी 3 नाम भी नहीं लिख पाया। अब, एक गिलास पानी पीजिए और मैं आपको कुछ बताता हूँ... **केवल प्रतिभा और कौशल होना ही काफी नहीं है। आपको मूल्यवान रिश्ते बनाने की शक्ति को समझना होगा।** एक बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा था, *"आपका नेटवर्क सीधे आपकी नेट वर्थ के समानुपाती होता है।"* **रिश्ते एक मुद्रा हैं।**   रिश्ते आय का एक स्रो...