Posts

Showing posts from May, 2020

आम का आचार बना रही हूँ !

आम का आचार बना रही हूँ ! कही सुनी थी एक बार , कुछ फिर से दोहराती हूँ , कि मैने सुनी थी ऐसा । आज सहसी ही वो याद सी आ गई। फिर मैने क्या महसूस किया है, ये सुनिए। कि कितनी समानता है ना , इन आम की केरी और हम औरतों में। दोनो को ही काफी कुछ सहेज कर रखनी पड़ती हैं, तब जा कर आती हैं रिश्तों में स्वाद। किस पेड़ की किस डाली पर लगती हैं, ये केरिया,, और कहाँ के लोग चखती हैं , इनका स्वाद। बागवान पुरे सिद्दत से इनकी देखभाल करता हैं, सिंचता हैं, और खरीददार को तनिक भी देर नही लगती, उस केरी की कमियां निकलने में। टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं खुद के, बेटी, बहू, पत्नी, माँ.... और ना जाने किस किस रूप में , नमक रूपी संस्कार आह,,,,, कितनी आहत करती हैं। कुछ रिश्तों का हल्दी की तरह लाड भी फीका हीं रह जाती हैं उन घावों पर। मर्यादाओ की तेज धूप, जब घाव लगे शरीर को छुती हैं, यूँ लगता हैं, अब जिन्दगी खत्म हो जाएगी। पर धीरे धीरे हम पिघलने लगते हैं, इन्ही सारी रिवाजों के बीच कुछ लोग आते हैं, उनकी सिख,,,,, कभी मिर्च सी, कुछ हींग सी, कुछ अजवाइन सी हीं तो लगती हैं हमे। सरसों सा जीवन साथी, लिपटता रहता हैं, हर हाल में,...
मैं लेटा हुआ था, मेरी पत्नी मेरा सिर सहला रही थी। मैं धीरे-धीरे सो गया। जागा तो वो गले पर विक्स लगा रही थी। मेरी आंख खुली तो उसने पूछा, कुछ आराम मिल रहा है? मैंने हां में सिर हिलाया। तो उसने पूछा कि खाना खाओगे ? मुझे भूख लगी थी, मैंने कहा:- "हां" "उसने फटाफट रोटी, सब्जी, दाल, चटनी, सलाद मेरे सामने परोस दिए, और आधा लेटे- लेटे मेरे मुंह में कौर डालती रही । मैने चुपचाप खाना खाया, और लेट गया। पत्नी ने मुझे अपने हाथों से खिलाकर खुद को खुश महसूस किया और रसोई में चली गई। मैं चुपचाप लेटा रहा। सोचता रहा कि पुरुष भी कैसे होते हैं? कुछ दिन पहले मेरी पत्नी बीमार थी, मैंने कुछ नहीं किया था। और तो और एक फोन करके उसका हाल भी नहीं पूछा। उसने पूरे दिन कुछ नहीं खाया था, लेकिन मैंने उसे ब्रेड परोस कर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा था। मैंने ये देखने की कोशिश भी नहीं की कि उसे वाकई कितना बुखार था। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया कि उसे लगे कि बीमारी में वो अकेली नहीं। लेकिन मुझे सिर्फ जरा सी सर्दी हुई थी, और वो मेरी मां बन गई थी। मैं सोचता रहा कि क्या सचमुच महिलाओ...

सच में खतरनाक है

कुछ मिल जाने से खुश होना कुछ न मिलने पर दुखी होना किसी के लिए सोचते रहना किसी के आने का इंतजार करना लोगों के भीड में कही फसे रहना बहुत बातें करना बातों से नाराज होना या खुश होना कभी अकेले में न बैठना खुद से बातें न करना किसी फूल कि खूबसूरती न देखना बारिश में न भीगना कभी बादल की तरफ न देखना ठंडी हवाओं में खुद को न डूबाना ये सब तुम्हारी आदतें सच में खतरनाक है किसी से उम्मीदें बाध लेना हमेशा अधूरा महसूस करना कुछ खोने के डर से चुप रह जाना या डर से कुछ न करना हर काम को बस टालते जाना कभी रंगों को गौर से न देखना कभी बहती नदी के पास न जाना पेड़ों के पत्तों की सरसराहट न सुनना रात में हो रही बारिश की बूंदों की आवाज न सुनना बस एक व्यर्थ की दूनिया में फसे रहना कभी प्रकृति को अनुभव न करना ये सब आदतें सच में खतरनाक

पति-पत्नी के सम्बंधों पर आधारिth

शादी की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर पति-पत्नी साथ में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे। संसार की दृष्टि में वो एक आदर्श युगल था। प्रेम भी बहुत था दोनों में लेकिन कुछ समय से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि संबंधों पर समय की धूल जम रही है। शिकायतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं। बातें करते-करते अचानक पत्नी ने एक प्रस्ताव रखा कि मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना होता है लेकिन हमारे पास समय ही नहीं होता एक-दूसरे के लिए। इसलिए मैं दो डायरियाँ ले आती हूँ और हमारी जो भी शिकायत हो हम पूरा साल अपनी-अपनी डायरी में लिखेंगे। अगले साल इसी दिन हम एक-दूसरे की डायरी पढ़ेंगे ताकि हमें पता चल सके कि हममें कौन सी कमियां हैं जिससे कि उसका पुनरावर्तन ना हो सके। पति भी सहमत हो गया कि विचार तो अच्छा है। डायरियाँ आ गईं और देखते ही देखते साल बीत गया। अगले साल फिर विवाह की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर दोनों साथ बैठे। एक दूसरे की डायरियाँ लीं। पहले आप, पहले आप की मनुहार हुई। आखिर में ‘Ladies First’ के आधार पर पत्नी की लिखी डायरी पति ने पढ़नी शुरू की। पहला पन्ना...... दूसरा पन्ना....... तीसरा पन्ना...... ..........

यह समझदारियां किस काम की

यह समझदारियां किस काम की, जो जीनें न दें .. जब प्यास हो, और आस हो, पानी तक जो पीने न दें ।। किसी के होने पे भी, सवाल हों, न होने पे भी, बवाल हों, जो औरों का बुरा चाहते, घमंडी से ख्याल हों ।। यह जो रेत आंखों पे जमी, झटको या जिंझोड दो ।। खुद क्या हो सोचते, औरों की तुम छोड़ दो .. गर तुमको मैं जचता नहीं, बेशक अभी से तोड़ दो .. मैं हूँ क्या, मुझको पता, तुम्हारा खुद संभालो तुम, वक़्त के साँचे सब ढला, खुद को भी तोह ढालो तुम, अपने कहाँ कहाँ तक बिखरें, पहले उनको जरा बचालो तुम ।।

हाथी

एक राजा के पास कई हाथी थे, लेकिन एक हाथी बहुत शक्तिशाली था, बहुत आज्ञाकारी,  समझदार व युद्ध-कौशल में निपुण था। बहुत से युद्धों में वह भेजा गया था और वह राजा को विजय दिलाकर वापस लौटा था, इसलिए वह महाराज का सबसे प्रिय हाथी था। समय गुजरता गया  ... और एक समय ऐसा भी आया, जब वह वृद्ध दिखने लगा।                      अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर पाता था। इसलिए अब राजा उसे युद्ध क्षेत्र में भी नहीं भेजते थे।  एक दिन वह सरोवर में जल पीने के लिए गया, लेकिन वहीं कीचड़ में उसका पैर धँस गया और फिर धँसता ही चला गया। उस हाथी ने बहुत कोशिश की, लेकिन वह उस कीचड़ से स्वयं को नहीं निकाल पाया।  उसकी चिंघाड़ने की आवाज से लोगों को यह पता चल गया कि वह हाथी संकट में है। हाथी के फँसने का समाचार राजा तक भी पहुँचा।                        राजा समेत सभी लोग हाथी के आसपास इक्कठा हो गए और विभिन्न प्रकार के शारीरिक प्रयत्न उसे निकालने के लिए करने लगे। लेकिन...

अर्ध रात्रि का ज्ञान, आइये विचार करें किसी पूर्वाग्रह के बगैर।

पकने का समय कई दिनों से अब तक/लिखने का समय 8.00 पी.एम. से 1.35 ए.एम. दिनांक-14 मई 2020 एक परिवार एक सरकारी नौकरी जब हम किसी वर्ग की बुराई की बात करते हैं तो उसमें शामिल समस्त जन एक तरह के नहीं होते हैं बहुत से अच्छे लोग होते हैं परन्तु कुछ गंदे लोगों के कारण सभी के हिस्से में बदनामी आ जाती है। इसे व्यक्तिगत नहीं समझना चाहिए। वैसे भी समय समय पर किसी भी व्यवस्था का आंकलन करते रहना जरूरी है। उसमें सुधार और बदलाव होते रहना चाहिए। वरना रूका हुआ जल ही काला जल बनता है। इस देश में जाने कब और कैसे शिक्षा को सरकारी नौकरी से जोड़ दिया गया है। हर माता पिता अपने बच्चे को पढ़ाते वक्त अपनी मनसा यही बना कर रखते हैं कि मेरा बेटा पढ़ेगा लिखेगा तो इंजीनियर डॉक्टर बनेगा और उसके पास सरकारी नौकरी होगी। ये सपना हर भारतीय का है हर भारतीय परिवार का है। पर क्या यह सोच सही है ? ऐसा नहीं लगता है कि पूरा जीवन एक अदद नौकरी के लिए ही बिताया जाता है। इसके बाद यह और कहा जाता है कि करोगे नौकरी सरकारी तो मिलेगी घरवाली प्यारी। मतलब सरकारी नौकरी का मतलब होता है सबकुछ मिल जाना। इस एजेण्डे से बाकी अन्य कार्य शून्य घोषित...

अर्ध रात्रि का ज्ञान

पकने का समय कई दिनों से अब तक/लिखने का समय 8.00 पी.एम. से 2.15 ए.एम. दिनांक-15 मई 2020 कृषि की आय पर आयकर लगाया जाना चाहिए कृषि प्रधान देश है भारत। इस देश में आज से नहीं सदियों से कृषि ही मुख्य रूप से आया का स्रोत रही है। वैसे भी अन्न के बिना जीवन संभव कहां है। भारत की आबादी आज भी गांवों में ज्यादा रहती है। इसलिए कृषि ही वर्तमान में मुख्य व्यवसाय है। और यह देश की सेहत के लिए अच्छा भी है। अगर देश की आवश्यकता के लिए पेट्रोल आयात किया जाता है तो उतनी राशि देश के बाहर चली जाती है। देश के विकास में गिरावट आती है। अगर दूसरी चीजों का निर्यात हो तो बात अलग है। अगर हम अनाज या कृषि उपज भी विदेश से आयात करने लग जाये तो क्या होगा ? वर्तमान कोरोन ने तो समझा दिया है कि देश को सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है। यहां पर ये जानकर बहुत ही दुखी होंगे कि यही कृषि हमारे देश में भ्रष्टाचार की मुख्य जड़ है। एक तरह से हम यह भी कह सकते हैं कि देश में वास्तविक किसानों की दुर्दशा का मुख्य कारण कृषिजन्य भ्रष्टाचार ही है। यह कहें तो अतिश्योक्ति न होगी। कृषि कार्य के पग पग में भ्रष्टाचार के लदे ह...

मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे

मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे, सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, रुपयों की कलदार, मधुर फसलें खनकेंगी और फूल-फल कर मैं मोटा सेठ बनूँगा। पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा, बन्ध्या मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला। सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये, मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक बाल-कल्पना के अपलक पाँवडे़ बिछाकर। मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे, ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था। अर्द्धशती हहराती निकल गयी है तब से। कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने, ग्रीष्म तपे, वर्षा झूली, शरदें मुसकाई; सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे, खिले वन। औ' जब फिर से गाढ़ी, ऊदी लालसा लिये गहरे, कजरारे बादल बरसे धरती पर, मैंने कौतूहल-वश आँगन के कोने की गीली तह यों ही उँगली से सहलाकर बीज सेम के दबा दिये मिट्टी के नीचे। भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिये हों। मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को, और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन। किन्तु, एक दिन जब मैं सन्ध्या को आँगन में टहल रहा था, तब सहसा मैंने जो देखा उससे हर्ष-विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से। देखा आँगन के कोने मे कई नवागत ...

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! हाथ में ध्वजा रहे, बाल-दल सजा रहे, ध्वज कभी झुके नहीं, दल कभी रुके नहीं, वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो, तुम निडर डरो नहीं, तुम निडर डटो वहीं, वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! प्रात हो कि रात हो, संग हो न साथ हो, सूर्य से बढ़े चलो, चन्द्र से बढ़े चलो, वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! एक ध्वज लिये हुए, एक प्रण किये हुए, मातृ भूमि के लिये, पितृ भूमि के लिये, वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! अन्न भूमि में भरा, वारि भूमि में भरा, यत्न कर निकाल लो, रत्न भर निकाल लो, वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! - द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

माँ तो माँ होती है

माँ --- माँ ने किताबे नही पढ़ी थी , माँ कभी स्कूल नही गई थी, उसके बच्चे पढ़े ,इसकी फिक्र थी बैठ जाती थी मेरे साथ , कहकर कि " बैठ किताब खोल , पढ़कर सुना कुछ मुझे " मैं भी ,उसे झांसा देता था --, बातो में उलझाए रखता था पता नही क्या क्या बकता था , वो भोली खुश होती थी , मुझे बहुत प्यार करती थी माँ , मेये बात तो थी -- बैठक मेरे साथ सुबह शाम थी धीरे धीरे पढ़ाई में भी रुचि - होने लगी थी और एक दिन वो आया कि - समय से सुबह ,शाम, स्वयं ही पढ़ने लगा था माँ के कहने पर -- कोई भी कथा, उन्हें पढ़ पढ़ कर सुनाने लगा था रामायण ,महाभारत के अंश -, उन्हें बहुत भाते थे माँ , समय समय पर अब , उन कथाओं से ही हमें , समझाने लगी थी हमने तो पढ़कर केवल , माँ को कथा सुनाई थी वो तो हमें बात बात पर , कभी राम ,और उनके परिवार की रावण की बुराई की , हनुमान की कथा --- हमे ही सुनानी लगी थी माँ की कही कथा मुझे , बहुत भाती थी सच मे हमने तो माँ को , केवल पढ़कर सुनाई थी , माँ ने तो , हमें सही राह पर- चलने की राह दिखाई थी माँ पर बहुत कुछ है कहने को, आज बस इतना ही , माँ ही मेरी पहली अध्या...

हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ।

हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ।         सुनो बात मेरी -         अनोखी हवा हूँ।         बड़ी बावली हूँ,         बड़ी मस्तमौला।         नहीं कुछ फिकर है,         बड़ी ही निडर हूँ।         जिधर चाहती हूँ,         उधर घूमती हूँ,         मुसाफिर अजब हूँ। न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा, न इच्छा किसी की, न आशा किसी की, न प्रेमी न दुश्मन, जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ। हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!         जहाँ से चली मैं         जहाँ को गई मैं -         शहर, गाँव, बस्ती,         नदी, रेत, निर्जन,         हरे खेत, पोखर,         झुलाती चली मैं।         झुमाती चली मैं!         हवा हूँ, हवा मै         बसंती हवा हूँ...