मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे
मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे,
रुपयों की कलदार, मधुर फसलें खनकेंगी
और फूल-फल कर मैं मोटा सेठ बनूँगा।
पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा,
बन्ध्या मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला।
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये,
मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक
बाल-कल्पना के अपलक पाँवडे़ बिछाकर।
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,
ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था।
अर्द्धशती हहराती निकल गयी है तब से।
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने,
ग्रीष्म तपे, वर्षा झूली, शरदें मुसकाई;
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे, खिले वन।
औ' जब फिर से गाढ़ी, ऊदी लालसा लिये
गहरे, कजरारे बादल बरसे धरती पर,
मैंने कौतूहल-वश आँगन के कोने की
गीली तह यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिये मिट्टी के नीचे।
भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिये हों।
मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को,
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन।
किन्तु, एक दिन जब मैं सन्ध्या को आँगन में
टहल रहा था, तब सहसा मैंने जो देखा
उससे हर्ष-विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से।
देखा आँगन के कोने मे कई नवागत
छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए हैं।
छाता कहूँ, कि विजय पताकाएँ जीवन की;
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं, प्यारी -
जो भी हो, वे हरे-हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उड़ने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोड़कर निकले चिड़ियों के बच्चे से।
निर्निमेष, क्षण भर मैं उनको रहा देखता-
सहसा मुझे स्मरण हो आया, कुछ दिन पहले
बीज सेम के रोपे थे मैंने आँगन में,
और उन्हीं से बौने पौधौं की यह पलटन
मेरी आँखो के सम्मुख अब खड़ी गर्व से,
नन्हे नाटे पैर पटक, बढ़ती जाती है।
तबसे उनको रहा देखता, धीरे-धीरे
अनगिनत पत्तों से लद, भर गयी झाडियाँ,
हरे भरे टंग गये कई मखमली चन्दोवे।
बेलें फैल गईं बल खा, आँगन में लहरा,
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे-हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को।
मैं अवाक् रह गया, वंश कैसे बढ़ता है।
छोटे तारों-से छितरे, फूलों के छींटे
झागों-से लिपटे, लहरों श्यामल लतरों पर
सुन्दर लगते थे, मावस के हँसमुख नभ-से,
चोंटी के मोती-से, आँचल के बूटों-से।
ओह, समय पर उनमें कितनी फलियाँ फूटीं।
कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ,
पतली, चौड़ी फलियाँ, उफ उनकी क्या गिनती!
लम्बी-लम्बी अँगुलियों-सी, नन्हीं-नन्हीं
तलवारों-सी, पन्ने के प्यारे हारों-सी।
झूठ न समझें, चन्द्र कलाओं-सी नित बढ़तीं,
सच्चे मोती की लड़ियों-सी, ढेर-ढेर खिल,
झुण्ड-झुण्ड झिलमिलकर कचपचिया तारों-सी।
आह! इतनी फलियाँ फूटीं, जाड़ों भर खाई,
सुबह-शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस-पास के,
जाने-अनजाने सब लोगों में बँटवाई।
बंधु-बांधवों, मित्रों, अभ्यागत, मँगतों ने
जी भर-भर, दिन-रात, मुहल्ले भर ने खाईं।
कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ।
यह धरती कितना देती है, धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को।
नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्त्व को
बचपन में, छि:! स्वार्थ-लोभवश पैसे बोकर।
रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ।
इसमें सच्ची समता के दाने बोने हैं,
इसमें जन की क्षमता के दाने बोने हैं,
इसमें मानव-ममता के दाने बोने हैं।
जिससे उगल सके, फिर धूल सुनहली फसलें
मानवता की, जीवन श्रम से हँसे दिशाएँ।
हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे।
- सुमित्रानन्दन पंत
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे,
रुपयों की कलदार, मधुर फसलें खनकेंगी
और फूल-फल कर मैं मोटा सेठ बनूँगा।
पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा,
बन्ध्या मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला।
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये,
मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक
बाल-कल्पना के अपलक पाँवडे़ बिछाकर।
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,
ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था।
अर्द्धशती हहराती निकल गयी है तब से।
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने,
ग्रीष्म तपे, वर्षा झूली, शरदें मुसकाई;
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे, खिले वन।
औ' जब फिर से गाढ़ी, ऊदी लालसा लिये
गहरे, कजरारे बादल बरसे धरती पर,
मैंने कौतूहल-वश आँगन के कोने की
गीली तह यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिये मिट्टी के नीचे।
भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिये हों।
मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को,
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन।
किन्तु, एक दिन जब मैं सन्ध्या को आँगन में
टहल रहा था, तब सहसा मैंने जो देखा
उससे हर्ष-विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से।
देखा आँगन के कोने मे कई नवागत
छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए हैं।
छाता कहूँ, कि विजय पताकाएँ जीवन की;
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं, प्यारी -
जो भी हो, वे हरे-हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उड़ने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोड़कर निकले चिड़ियों के बच्चे से।
निर्निमेष, क्षण भर मैं उनको रहा देखता-
सहसा मुझे स्मरण हो आया, कुछ दिन पहले
बीज सेम के रोपे थे मैंने आँगन में,
और उन्हीं से बौने पौधौं की यह पलटन
मेरी आँखो के सम्मुख अब खड़ी गर्व से,
नन्हे नाटे पैर पटक, बढ़ती जाती है।
तबसे उनको रहा देखता, धीरे-धीरे
अनगिनत पत्तों से लद, भर गयी झाडियाँ,
हरे भरे टंग गये कई मखमली चन्दोवे।
बेलें फैल गईं बल खा, आँगन में लहरा,
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे-हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को।
मैं अवाक् रह गया, वंश कैसे बढ़ता है।
छोटे तारों-से छितरे, फूलों के छींटे
झागों-से लिपटे, लहरों श्यामल लतरों पर
सुन्दर लगते थे, मावस के हँसमुख नभ-से,
चोंटी के मोती-से, आँचल के बूटों-से।
ओह, समय पर उनमें कितनी फलियाँ फूटीं।
कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ,
पतली, चौड़ी फलियाँ, उफ उनकी क्या गिनती!
लम्बी-लम्बी अँगुलियों-सी, नन्हीं-नन्हीं
तलवारों-सी, पन्ने के प्यारे हारों-सी।
झूठ न समझें, चन्द्र कलाओं-सी नित बढ़तीं,
सच्चे मोती की लड़ियों-सी, ढेर-ढेर खिल,
झुण्ड-झुण्ड झिलमिलकर कचपचिया तारों-सी।
आह! इतनी फलियाँ फूटीं, जाड़ों भर खाई,
सुबह-शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस-पास के,
जाने-अनजाने सब लोगों में बँटवाई।
बंधु-बांधवों, मित्रों, अभ्यागत, मँगतों ने
जी भर-भर, दिन-रात, मुहल्ले भर ने खाईं।
कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ।
यह धरती कितना देती है, धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को।
नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्त्व को
बचपन में, छि:! स्वार्थ-लोभवश पैसे बोकर।
रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ।
इसमें सच्ची समता के दाने बोने हैं,
इसमें जन की क्षमता के दाने बोने हैं,
इसमें मानव-ममता के दाने बोने हैं।
जिससे उगल सके, फिर धूल सुनहली फसलें
मानवता की, जीवन श्रम से हँसे दिशाएँ।
हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे।
- सुमित्रानन्दन पंत
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