अर्ध रात्रि का ज्ञान, आइये विचार करें किसी पूर्वाग्रह के बगैर।


पकने का समय कई दिनों से अब तक/लिखने का समय 8.00 पी.एम. से 1.35 ए.एम. दिनांक-14 मई 2020

एक परिवार एक सरकारी नौकरी
जब हम किसी वर्ग की बुराई की बात करते हैं तो उसमें शामिल समस्त जन एक तरह के नहीं होते हैं बहुत से अच्छे लोग होते हैं परन्तु कुछ गंदे लोगों के कारण सभी के हिस्से में बदनामी आ जाती है। इसे व्यक्तिगत नहीं समझना चाहिए। वैसे भी समय समय पर किसी भी व्यवस्था का आंकलन करते रहना जरूरी है। उसमें सुधार और बदलाव होते रहना चाहिए। वरना रूका हुआ जल ही काला जल बनता है।
इस देश में जाने कब और कैसे शिक्षा को सरकारी नौकरी से जोड़ दिया गया है। हर माता पिता अपने बच्चे को पढ़ाते वक्त अपनी मनसा यही बना कर रखते हैं कि मेरा बेटा पढ़ेगा लिखेगा तो इंजीनियर डॉक्टर बनेगा और उसके पास सरकारी नौकरी होगी। ये सपना हर भारतीय का है हर भारतीय परिवार का है। पर क्या यह सोच सही है ? ऐसा नहीं लगता है कि पूरा जीवन एक अदद नौकरी के लिए ही बिताया जाता है। इसके बाद यह और कहा जाता है कि करोगे नौकरी सरकारी तो मिलेगी घरवाली प्यारी।
मतलब सरकारी नौकरी का मतलब होता है सबकुछ मिल जाना। इस एजेण्डे से बाकी अन्य कार्य शून्य घोषित हो जाते हैं। सरकारी नौकरी न मिली बल्कि भारत रत्न के समकक्ष तो मिल ही गया।
हमारे समाज में फैली इस सोच का कारण क्या है ? क्यों इस एजेण्डे को प्रसारित किया गया है ? किसका फैलाया एजेण्डा है ? कब फैलाया गया है ? इन तमाम प्रश्नों का उत्तर जानना हमारे लिए जरूरी है। क्योंकि इस सरकारी नौकरी ने हमारी जीवन शैली को पूरी तरह से बदल दिया है हमारे भारतीय संस्कारों को बदल दिया है। सामान्यतः सरकारी नौकरी से हमारे दिमाग में ये बातें आराम से जाने कब बैठती जाती हैं और तलछट चट्टान के रूप में बदल जाती हैं। सरकारी ऑफीस में प्रवेश करते ही हम एक पढ़ेलिखे व्यक्ति का सम्मान करते हैं, यह पहले माना जाता था। आजकल शायद ही इस तरह के भाव मन में आते हों। क्योंकि हर किसी का पाला सरकारी ऑफीस से पड़ता है और जिसका भी पड़ता है वो भगवान का नाम लेता है। लगभग हर विभाग भ्रस्टाचार में लिप्त नजर आता है। भ्रस्टाचार की पहली पाठशाला यदि हम सरकारी विभाग को कहें तो कोई अतिश्योक्ति न होगी।
रिश्वतखोरी की स्वीकृति की पराकाष्ठा देखिए कि उसी ऑफीस का बाबू जब रिटायर हो जाता है तब उसे ही वहां अपने पेंशन के प्रकरण के लिए रिश्वत देनी होती है। उसे तब भी ग्लानि नहीं होती है। क्योंकि रिश्वतखोरी को उन्होंने ही संस्कार की मान्यता दी है।
सरकारी नौकरी में आर्थिक आधार पर किसी को छोटा और किसी को बड़ा बताने की सीख खुलेआम दी जाती है। चपरासी पानी लिये खड़ा होता है और साहब सिगरेट पीते रहते हैं। या फिर घर का गैस सिलेंडर चपरासी लाता है। चाय समोसे के जूठे बर्तन चपरासी उठाता है। अगर चपरासी न आये तो बाबू ये काम करता है। और बाबू न आये तो बड़ा बाबू ये सब करता है। फाइल लेकर अपने अधीनस्थ को खड़े रखना खुलेआम देखा जा सकता है। ये वर्गभेद तो सरकारी ऑफीस में खुलेआम होता है। जिसे हम सामाजिक बुराई कहकर भारतीय संस्कृति को दिनरात कोसते हैं।
काम को लटकाने की संस्कृति भी सरकारी ऑफीस की देन है। कभी भी कोई छोटा सा काम भी वहां टाइम से नहीं होता है। वहां टालमटोल की संस्कृति का मुख्य कारण है सामूहिक जिम्मेदारी। सिस्टम में किसी भी एक व्यक्ति को जवाबदार नहीं माना गया है। जबकि एक कार्यालय में जितने लोग कार्यरत हैं उन सभी को अलग अलग पूर्ण रूप से जवाबदारी दी जा सकती है। जैसे कि जन्म प्रमाण पत्र एक टाइपिस्ट टाइप करेगा और बाबू चिड़िया बैठायेगा और फिर साहब उसमें साइन करेगा। इसके बाद डिस्पेच करने वाला डिस्पेच करके देगा। अगर ये चारों काम एक ही व्यक्ति करे तो क्या नुकसान है। अलग अलग प्रकार के काम के लिए अलग अलग आदमी नियुक्त किये जायें तो कार्यकुशलता भी बढ़ेगी और जवाबदारी भी आयेगी। आप उनकी गलती और देरी के लिए प्रश्न कर सकते हैं। अभी तो ऑफीस जाने पर कह दिया जाता है फलाना तो छुट्टी में था। और जनता इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेती है। इस तरह तो इंसान का समय बरबाद होता है। भले इस लटकाने पर रिश्वत ज्यादा मिल जाती है।
इंजीनियरींग विभाग में एक इंजीनियर को ही बीस लाख तक के काम की जिम्मेदारी दे दी जाये। वही स्टीमेट बनाये वही टेंडर लगाये वही मूल्यांकन करे। वही फाइलों को सम्भाले। पानी पीने के लिए खुद लेकर आये। एकाउंटेट, बाबू, टेक्नीशियन, चपरासी और भृत्य की जगह इंजीनियर की भर्ती की जाये। सबको एक एक कमरा दिया जाये। क्या इससे जवाबदारी स्थापित नहीं होगी ? कौन उसकी बेइमानी में साथ खड़ा होगा। अभी चूंकि ऑफीस में सभी एक दूसरे पर आश्रित होते हैं इसलिए आपस में मिलकर बेइमानी के चक्रव्यूह रचते हैं। सब अलग अलग काम करेंगे तो ईमानदार अपनी ईमानदारी के साथ काम कर पायेगा। वो सिस्टम की बेइमानी में जबरदस्ती शामिल होने से बच जायेगा। मैंने प्रायवेट काम करने का यही तरीका देखा है।
खैर! हम कहना चाहते थे कि जब सरकारी नौकरी राजयोग है तो क्यों न इसे समाज के सभी वर्ग को बराबरी से मिलने का मौका देना चाहिए। वर्तमान में किसी एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी मिलना यानी एक परिवार का जीवन सुरक्षित हो जाना होता है। सरकार मात्र एक नियम बना दे तो इस नौकरी का उद्देश्य व्यापक रूप से पूरा होगा। इसके लिए सरकार को नियम बनाना होगा कि एक परिवार में सिर्फ एक व्यक्ति ही नौकरी कर सकता है। यानी पति या पत्नी। और बच्चे भी नौकरी में लगें तो उनके परिवार में सरकारी नौकरी करने वाले को रिटायर किया जाये।
भले ही यह अजीबो गरीब सलाह है पर इसका फायदा यह होगा कि समाज में नौकरी के प्रति मारामारी कम होगी। समाज में सभी को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा। एक ही परिवार में कई लोग नौकरी करते हैं और देश में न जाने कितने ही लोग बेरोजगारी के कारण परेशान हैं।
इस योजना से कम बच्चे पैदा करने के लिए लोग प्रेरित होंगे। क्योंकि नौकरी तो एक को ही मिलनी है।
इससे पति पत्नी दोनों के नौकरी न करने से बच्चों को प्यार और पारिवारिक वातावरण मिलेगा। बच्चों की उचित देखभाल होगी।
स्त्री पुरूष में बराबरी का वास्तविक जमीनी काम होगा। जो स्त्री नौकरी करेगी उसका पति घर की जिम्मेदारी लेने वाला होगा। स्त्री पुरूष की बराबरी की अवधारण को सपोर्ट मिलेगा।
जब प्राकृतिक संपदा में सबका बराबरी का हक है तो फिर सरकारी नौकरी को भी समाज में बराबरी से वितरित किया जाना चाहिए। देश का एक बड़ा वर्ग नौकरी के अभाव में दूसरे काम करने पर मजबूर है उसे भी मौका मिलना चाहिए। पति पत्नी में से एक के नौकरी करने के नियम से नौकरीपेशा बगैर नौकरी वाले से विवाह करेंगे और समाज एक नये दृष्टिकोण से नौकरी को देखेगा।
वर्तमान नियम कोई आसमानी किताब का संदेश नहीं है कि जो उसमे बदलाव नहीं किया जा सकता है। जब समय समय पर सामाजिक सुधार के लिए क्रांति का झंडा बुलंद किया जाता है तो फिर इस पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता है।


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