अर्ध रात्रि का ज्ञान


पकने का समय कई दिनों से अब तक/लिखने का समय 8.00 पी.एम. से 2.15 ए.एम. दिनांक-15 मई 2020

कृषि की आय पर आयकर लगाया जाना चाहिए
कृषि प्रधान देश है भारत। इस देश में आज से नहीं सदियों से कृषि ही मुख्य रूप से आया का स्रोत रही है। वैसे भी अन्न के बिना जीवन संभव कहां है। भारत की आबादी आज भी गांवों में ज्यादा रहती है। इसलिए कृषि ही वर्तमान में मुख्य व्यवसाय है। और यह देश की सेहत के लिए अच्छा भी है। अगर देश की आवश्यकता के लिए पेट्रोल आयात किया जाता है तो उतनी राशि देश के बाहर चली जाती है। देश के विकास में गिरावट आती है। अगर दूसरी चीजों का निर्यात हो तो बात अलग है। अगर हम अनाज या कृषि उपज भी विदेश से आयात करने लग जाये तो क्या होगा ? वर्तमान कोरोन ने तो समझा दिया है कि देश को सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है। यहां पर ये जानकर बहुत ही दुखी होंगे कि यही कृषि हमारे देश में भ्रष्टाचार की मुख्य जड़ है। एक तरह से हम यह भी कह सकते हैं कि देश में वास्तविक किसानों की दुर्दशा का मुख्य कारण कृषिजन्य भ्रष्टाचार ही है। यह कहें तो अतिश्योक्ति न होगी। कृषि कार्य के पग पग में भ्रष्टाचार के लदे हुए वृक्ष हैं। ज्यादा विस्तार में न जायें तो भी हम देख सकते हैं कुछ बिन्दू।
सबसे पहले आता है हर साल का डिमार्केशन। यानी राजस्व विभाग किसी न किसी की जमीन इधर उधर करके कुछ न कुछ पा जाता है।
खेती के लिए बिजली कनेक्शन में सबसिडी है। उसकी दर सबसे कम है। इसलिए खेती के नाम पर बिजली कनेक्शन लेकर दूसरा उपयोग किया जाता है। जैसे मिट्टी, सीमेंट के ईट बनाना, चोरी छिपे फार्म हाउस चलाना, शादी घर, पानी पेकिंग की मशीन चलाना आदि। आटा मिल, वेल्डींग वर्क आदि। वास्तविक किसान तो बेचारा बिजली के कनेक्शन का आवेदन देकर बिजली विभाग के इंजीनियरों के चक्कर काटता रह जाता है। उसे मिलता है बाबा जी का ठुल्लू।
बिजली कनेक्शन में टेम्पोरेरी देकर बिजली विभाग के कर्मचारियों की मासिक कमाई। नकली मीटर लगाकर पैसे लेते रहना।
आसपास नाला हो तो पंचायत द्वारा टेक्स लेना। वो डरा धमका कर बगैर रसीद के।
आसपास नहर होने पर उसका चार्ज सबपे जुड़ता है परन्तु इसका फायदा भी रसूख वाले ही उठाते हैं। इसमें भी सरकारी विभाग अपनी दो नंबर की आय का रास्ता बनाता है।
इंश्योरेंस करना भी चोर रास्ता है आय का। जिसकी फसल खराब होती है उसे कभी पैसा नहीं मिलता है बलिक जिनकी फसल अच्छी हुई है उसे ही मुआवजा दे दिया जाता है। चाहे सूखा हो या बाढ़ हो। सरकारी कर्मचारियों की दीवाली होती है।
बीज और खाद पर सबसीडी देने पर सिर्फ काला बाजारी होती है। किसान को कम दाम वाला न तो खाद मिलता है न बीज। ठीक ऐसे ही कीटनाशक दवा का हाल है। सबसीडी वाला बीज खाद और कीटनाशक सिर्फ सबसीडी प्रदान करने वालों के लिए हर साल नई मोटर साइकल गाड़ी खरीदने का साधन है।
इसके बाद कृषि उपज को लेम्पस में बेचना किसान के लिए बड़ा मंहगा होता है। कम तोल कर लेना। गीला बताकर कम माल लिखना, बोरी कर पैसा ले लेना, दूसरे के खेत का माल किसी दूसरे के खेत में बुक कर देना। दो राज्य की सीमा होने पर रेट का अंतर होता ही है। दूसरे राज्य के माल की स्मगलिंग का गोरखधंधा।
सहकारी बैंक द्वारा खेती के लिए दिये जाने वाले लोन को ज्यादा दर पर दूसरों को देकर ब्याज कमाना। धान उगाना और उसे महंगी फसल बता कर ज्यादा लोन लेने देने का दो नंबरी खेल। बगैर धान खरीदे खरीदी दिखाकर, उसकी ढुलाई दिखाना और राइस मिलर्स द्वारा उसकी मिलींग करना बताना और फिर उसे भारतीय खाद्य निगम द्वारा अपने गोदाम में रखना। अंत में उसे बरसात में सड़ना, चूहों द्वारा बरबाद कर देना बता कर एडजस्ट कर देना। और कुछ चावल कम तोल कर ग्राहकों की जेब से पैसे निकाल लेना।
अंत में इस कृषि की आय से अपनी आय दिखाकर आयकर में छूट पाना। देश को धोखा देना।
आप अपने आसपास देखेंगे तो पायेंगे कि दो नंबर की कमाई करने वाले साहबों को कृषि फार्म हाउस का शौक होता है। उनके खेत जरूर होते हैं। साहबों के पास गांव के खेत पर कोई बबूल का पौधा भी न हो परन्तु उनके कागज में कृषि कार्य बकायदा दिखाकर आयकर की छूट ली जाती है।
देश का दो नगर का पैसा कृषि के द्वारा कमाई गई आय दिखा कर एक नंबर कर लिया जाता है इसलिए अफसरों, इंजीनियर, कलेक्टरों, रेलवे के बड़े अफसरों, नेताओं के पास, बड़े ठेकेदारों और सप्लायरों नर्सिंग होम के मालिकों के पास खेत जरूर होता है। देश के सबसे बड़े किसान यही लोग हैं। यही लोग दो नंबर का पैसा कृषि की आय बताकर एक नंबर कर लेते हैं। 
अगर एक ऐसा साफ्टवेयर बनाया जाय जिसमें ऐसी आय का डाटा एक साथ जुड़कर आ जाये तो आप पायेंगें कि इतनी खेती की जमीन तो भारत क्या पूरी धरती में भी नहीं होगी।
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत ये कृषि की आय है। आजकल कृषि में मछली पालन सूअरपालन मुर्गीपालन, बदख पालन आदि भी शामिल कर लिया गया  है जिससे बेचारे भ्रष्टाचारियों को दो नंबर का पैसा एक नबर बनाने में कोई तकलीफ न हो।
आखिर इस बड़े से गढ्ढे को पाटने का उपाय क्या है ?
हम सोचते हैं बेचारा किसान नंगा का नंगा क्यों है ? उसकी लंगोट खींचने वाले यही वाइट कॉलर वाले लोग हैं।
इसका सबसे बढ़िया उपाय है कृषि की आय पर दी जा रही आयकर की छूट बंद की जाय।
दूसरा उपाय है सभी प्रकार की सबसीड़ी बंद कर दी जाये।
खेतों तक बिजली कनेक्शन पहुंचाना सरकार का काम होना चाहिए। बिजली दर में कोई छूट नहीं देनी चाहिए।
जब फसल की खरीदी हो तब उसका खरीद मूल्य बहुत ज्यादा करके सरकार खरीदे। भौतिक मूल्यांकन करके ही उस वक्त ज्यादा राशि दी जाये।
यानी मात्र कृषि उपज खरीदने पर ही उसपर सबसिडी दी जाये। इससे ही कृषि के नाम पर जारी लूट बंद होगी। किसानों की लंगोट ख्खींचने का खेल बंद होगा।

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