आम का आचार बना रही हूँ !
आम का आचार बना रही हूँ !
कही सुनी थी एक बार , कुछ फिर से दोहराती हूँ , कि मैने सुनी थी ऐसा । आज सहसी ही वो याद सी आ गई। फिर मैने क्या महसूस किया है, ये सुनिए। कि कितनी समानता है ना , इन आम की केरी और हम औरतों में। दोनो को ही काफी कुछ सहेज कर रखनी पड़ती हैं, तब जा कर आती हैं रिश्तों में स्वाद।
किस पेड़ की किस डाली पर लगती हैं, ये केरिया,, और कहाँ के लोग चखती हैं , इनका स्वाद। बागवान पुरे सिद्दत से इनकी देखभाल करता हैं, सिंचता हैं, और खरीददार को तनिक भी देर नही लगती, उस केरी की कमियां निकलने में।
टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं खुद के, बेटी, बहू, पत्नी, माँ.... और ना जाने किस किस रूप में , नमक रूपी संस्कार आह,,,,, कितनी आहत करती हैं। कुछ रिश्तों का हल्दी की तरह लाड भी फीका हीं रह जाती हैं उन घावों पर।
मर्यादाओ की तेज धूप, जब घाव लगे शरीर को छुती हैं, यूँ लगता हैं, अब जिन्दगी खत्म हो जाएगी।
पर धीरे धीरे हम पिघलने लगते हैं, इन्ही सारी रिवाजों के बीच कुछ लोग आते हैं, उनकी सिख,,,,, कभी मिर्च सी, कुछ हींग सी, कुछ अजवाइन सी हीं तो लगती हैं हमे। सरसों सा जीवन साथी, लिपटता रहता हैं, हर हाल में,,,, साथ निभाने के खयाल में।कच्ची घानी के तेल रूपी हमारी जिम्मेदारी में कैसे डुबी रहती हैं ना, हम औरतों। लाख कोशिशों के बावजूद निकल नही पाती कभी।
बरनी रूपी हमारा घर। सब की मानों तो यही रह सकते है हम सुरक्षित। जैसे तैसे हाथ नही पड़ेगे हम पर। वर्ना हम खराब हो जायेगी। केरी हो तो हैं,,,,,, मतलब औरते ही तो हैं,,,,,, बाहरी वातावरण से कहाँ लड़ पाएँगी।
बरसों बंद,,,,, एकदम बंद पडे़ हम,,,,,
जिसदिन अचानक से खुलती हैं,,,,, अहा!!
एकदम से ही बदली हुई सी दिखती हैं। रंग बदल चुकी होती हैं, इतनी की लोग पहचान ना पाए, ना रूप ना स्वाद।
क्योंकि अब स्वाद, बहुत तेज हैं,,,,, इतनी सी ही लगें जबान पर तो स्वाद बदल दे। पकवान रूपी सारे रिश्ते जब फीकी पड़ जाते हैं,,,, तब हम केरिया,,,, मैं,,,, मेरा मतलब हम औरते ही इस कमी को रूपी करती हैं। अपनी स्वाद से।
हाँ माना, अब खुद की कोई स्वाद नही हमारी। हम थोड़ी थोड़ी सब के स्वाद में रंग चुकी हैं। बरसों लगें हैं, सब सहेजने में। जिन्दगी तो बड़ा सताती थी रूलाती थी,,,,,, सोचा होगा थका देगी हमे, लेकिन हम तो यहाँ भी बाजी मार गई। बन कर अचार सब की चाहेती बन गई। अब तो हमारे बीना थाली रूपी संसार की कल्पना ही नही की जा सकती।
कुछ समझे,? टूटे, कटें, तपें, घुटें, सालो कोशिश करे, बस हारे नही।
हर चीज कट कर मर ही नही जाती,,,,, कुछ बन कर आती हैं अचार!!
कही सुनी थी एक बार , कुछ फिर से दोहराती हूँ , कि मैने सुनी थी ऐसा । आज सहसी ही वो याद सी आ गई। फिर मैने क्या महसूस किया है, ये सुनिए। कि कितनी समानता है ना , इन आम की केरी और हम औरतों में। दोनो को ही काफी कुछ सहेज कर रखनी पड़ती हैं, तब जा कर आती हैं रिश्तों में स्वाद।
किस पेड़ की किस डाली पर लगती हैं, ये केरिया,, और कहाँ के लोग चखती हैं , इनका स्वाद। बागवान पुरे सिद्दत से इनकी देखभाल करता हैं, सिंचता हैं, और खरीददार को तनिक भी देर नही लगती, उस केरी की कमियां निकलने में।
टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं खुद के, बेटी, बहू, पत्नी, माँ.... और ना जाने किस किस रूप में , नमक रूपी संस्कार आह,,,,, कितनी आहत करती हैं। कुछ रिश्तों का हल्दी की तरह लाड भी फीका हीं रह जाती हैं उन घावों पर।
मर्यादाओ की तेज धूप, जब घाव लगे शरीर को छुती हैं, यूँ लगता हैं, अब जिन्दगी खत्म हो जाएगी।
पर धीरे धीरे हम पिघलने लगते हैं, इन्ही सारी रिवाजों के बीच कुछ लोग आते हैं, उनकी सिख,,,,, कभी मिर्च सी, कुछ हींग सी, कुछ अजवाइन सी हीं तो लगती हैं हमे। सरसों सा जीवन साथी, लिपटता रहता हैं, हर हाल में,,,, साथ निभाने के खयाल में।कच्ची घानी के तेल रूपी हमारी जिम्मेदारी में कैसे डुबी रहती हैं ना, हम औरतों। लाख कोशिशों के बावजूद निकल नही पाती कभी।
बरनी रूपी हमारा घर। सब की मानों तो यही रह सकते है हम सुरक्षित। जैसे तैसे हाथ नही पड़ेगे हम पर। वर्ना हम खराब हो जायेगी। केरी हो तो हैं,,,,,, मतलब औरते ही तो हैं,,,,,, बाहरी वातावरण से कहाँ लड़ पाएँगी।
बरसों बंद,,,,, एकदम बंद पडे़ हम,,,,,
जिसदिन अचानक से खुलती हैं,,,,, अहा!!
एकदम से ही बदली हुई सी दिखती हैं। रंग बदल चुकी होती हैं, इतनी की लोग पहचान ना पाए, ना रूप ना स्वाद।
क्योंकि अब स्वाद, बहुत तेज हैं,,,,, इतनी सी ही लगें जबान पर तो स्वाद बदल दे। पकवान रूपी सारे रिश्ते जब फीकी पड़ जाते हैं,,,, तब हम केरिया,,,, मैं,,,, मेरा मतलब हम औरते ही इस कमी को रूपी करती हैं। अपनी स्वाद से।
हाँ माना, अब खुद की कोई स्वाद नही हमारी। हम थोड़ी थोड़ी सब के स्वाद में रंग चुकी हैं। बरसों लगें हैं, सब सहेजने में। जिन्दगी तो बड़ा सताती थी रूलाती थी,,,,,, सोचा होगा थका देगी हमे, लेकिन हम तो यहाँ भी बाजी मार गई। बन कर अचार सब की चाहेती बन गई। अब तो हमारे बीना थाली रूपी संसार की कल्पना ही नही की जा सकती।
कुछ समझे,? टूटे, कटें, तपें, घुटें, सालो कोशिश करे, बस हारे नही।
हर चीज कट कर मर ही नही जाती,,,,, कुछ बन कर आती हैं अचार!!
Comments
Post a Comment