समानता की सृष्टि



" मुझे शरीर बनना है।" 

भगवान चौक गए। 

"यह तुम क्या कह रही हो, आत्मा? तुम आत्मा हो। तुम्हारा प्रयोजन भिन्न है। शरीर का वह कार्य नहीं है। क्यों बनना चाहती हो तुम शरीर? 

"शरीर स्वतंत्र निर्णय ले सकता है, प्रभु।" आत्मा गंभीर थी, "आत्मा तो शरीर पर निर्भर है। शरीर ही कर्म करता है, फल पाता है। शरीर जो चाहे वह करता है। आत्मा तो शरीर की दासी है। मात्र उसके क्रियाकलापों का लेखा-जोखा करती रहती है। आत्मा का कोई स्वयं अस्तित्व नहीं है प्रभु। आत्मा का कोई कर्म ही नहीं है, फिर आत्मा पर कोई क्यों ध्यान दे? सभी तो शरीर और इसके सौंदर्य का वर्णन ही करते हैं।" 

भगवान ने समझाने की चेष्टा की। 

" तुम शरीर के उन कार्यकलापों से अपनी  तुलना कर रही हो जो स्थूल जगत और उसकी प्रतिक्रिया से संबंधित हैं? क्या वे प्रतिक्रियाएं ही किसी की क्षमता का परिचायक है?  तुम जगत से दूर रहकर शरीर को प्राण देती हो, ऊर्जा देती हो, कार्य करने के लिए शरीर को गति देती हो। तुम्हारे बगैर शरीर गति नहीं कर सकता। और वैसे भी तुम्हारा स्थूल जगत से क्या संबंध? तुम तो शरीर और मेरे बीच का सेतु हो। तुम आत्मा हो। परमात्मा का अंश हो। मेरा भाग हो। तुम अधिक महत्वपूर्ण हो। शरीर की बराबरी करने के लिए तुमको अपना स्तर नीचे करना पड़ेगा।" 

आत्मा कुछ पल चुप रही। वह प्रभु से असहमत होकर उनका अपमान नहीं करना चाहती थी। 

"मुझे स्वतंत्र अस्तित्व चाहिए, प्रभु। आपकी सृष्टि में स्वतंत्रता ही तो हर वस्तु का मानक है। मुझे शरीर सा ही स्वतंत्र अस्तित्व चाहिए।" 

ईश्वर तर्क और हठ बना कर पछता रहे थे। 

उनकी सृष्टि उन्हीं की कुछ कृतियों के कारण स्वयं को बदलने की राह पर चल रही थी। 

परंतु ईश्वर भेदभाव भी तो नहीं कर सकते थे। 

उन्होंने तथास्तु कहा। 

और फिर आत्मा और शरीर अब एक साथ तो रहते हैं, परंतु एक दूसरे के क्रियाकलापों में दखल नहीं देते। शरीर के लिए आत्मा आधी मर चुकी है और आत्मा के लिए शरीर। 

ईश्वर ना जाने कब इस प्रक्रिया को बदलने की सोचेंगे। 

या कदाचित नहीं सोचेंगे।" 


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