समर्पण
"बचपन और युवा काल की स्मृतियां हमेशा मधुर ही लगती हैं, चाहे उस समय वह कष्टप्रद लगी हों। इंग्लिश में इसके लिए 'नॉस्टैल्जिया' शब्द का प्रयोग करते हैं। और अब तो यह शब्द हमारे शब्दकोष में ही जुड़ गया है।
अब तो नाॅस्टाल्जिया एक बहुत बड़ा मार्केट भी बन गया है। अब छोटे-छोटे शहरों के बैकग्राउंड पर फिल्में बनती हैं, टीवी सीरियल बनते हैं, कहानी लिखी जाती हैं और यह पाठकों को, दर्शकों को पसंद भी आती हैं। क्योंकि मधुर स्मृतियां सभी को पसंद हैं। अपने बचपन में,अपने युवावस्था में जाकर, चाहे वह मानसिक ही हो, लोगों को बड़ा सुकून मिलता है। जीवन का यह जो हिस्सा है, जो अर्जन के पहले तक का होता है, बड़ा सुखद होता है। सभी कहते हैं कि वह समय मस्ती भरा था। वह समय किसी भी दबाव से रहित था, दुश्मनी और झगड़े जैसी भावना से रिक्त था, इसीलिए यह समय दिल और दिमाग को बहुत सुकून देता है और इस को बार बार याद करने को दिल चाहता है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस समय-काल में बताया गया जीवन इतना तनाव रहित और इतना सुखद क्यों था? और अब वह सुख कहां चला गया?
वह सुख अभी भी हमारे अंदर है। उस सुख का रसास्वादन हम अभी भी कर सकते हैं। परंतु हमारे दिमाग पर, अर्जन करते ही, एक महत्वपूर्ण और आत्म निर्भर व्यक्तित्व होने का पर्दा पड़ जाता है। जीवन तार्किक बुद्धिमत्ता से भर जाता है और हर विश्वास, अंधविश्वास लगने लगता है। अपने उत्तरदायित्वों को हमने अपने अहंकार का पैमाना मानना शुरू कर दिया है कि देखो हम कितना कर सकते हैं। और इस पैमाने से ही हम आंकते हैं कि हम कितने सक्षम हैं।
बचपन में क्या था? कैसा था बचपन? वह किशोरावस्था कैसी थी? आप हर तनाव से मुक्त क्यों थे ? क्योंकि तब आपने स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर रखा था; साधनों के लिए पिता पर और भावनाओं के लिए माता पर। तब कोई अहंकार नहीं था कि साधन मैं पैदा करता हूं। उस भावना से मैं लड़ लूंगा। चोट लगी, रोए। मां के पास चले गए। किसी वस्तु की जरूरत हुई, पिता के पास चले गए। क्योंकि तब हम में समर्पण था, अहंकार नहीं था कि यह हमको स्वयं करना है या हम स्वयं कर रहे हैं। जो पिताजी देंगे उसी में हम लेंगे और मां के प्यार का तो कहना ही क्या! कम भी अधिक ही होता था। शरीर की चोट हो या दिल की चोट, कुछ ही पलों में ठीक हो जाती थी। और पिता का दिया हुआ हर संसाधन अपनी मूल्य में कई गुना बढ़ा हुआ लगता था।
परंतु अब हम क्या करते हैं? अपने हर कार्यकलाप के लिए अपने आप को ही दोष और शाबाशी देते हैं। समर्पण का भाव हमारे अंदर से चला गया है। अगर माता-पिता, ईश्वर की कृपा से, अभी भी हमारे साथ हैं, तो भी हम उनको अपने पर निर्भर समझते हैं। अपने को उन पर निर्भर नहीं करते। यही दुख का मूल कारण है। अर्जन के साथ भावनाएं व्यक्तिगत हो गई हैं, इसीलिए हम अपने ऊपर अहम एक बहुत बड़ा बोझ उठाए घूमते हैं। और किसी भी सुख और दुख का, उस बोझ के तले दबे होने के कारण अनुभव ही नहीं कर पाते। जो इस बोझ को कम कर दे वह सुख लगता है, और जो बढ़ा दे, वह दुख लगता है। इसीलिए हम उस समय को ढूंढते रहते हैं जब हमारे ऊपर यह बोझ नहीं था। जब हमारे लिए सुख न सुख था, न दुख, दुख था। बस हम थे और हमारी यादें थी, न सुखद, न दुखद।
आज के दिन भी अगर हम समर्पण की भावना से कार्य करें, अगर दुर्दैव से माता-पिता हमारे साथ नहीं है , तो ईश्वर को अपना माता-पिता समझ कर स्वयं को समर्पित कर दें। वह जो साधन दे उसमें हम प्रसन्न रहें। वह जो दे उसको अपने प्रयास का प्रतिदान समझें, तो हमारे ऊपर से यह अहम् का बोझ समाप्त हो जाएगा। और अहम् का बोध समाप्त होते ही हमारा पूरा जीवन एक लंबा बचपन और एक लंबी युवावस्था बन जाएगा। प्रयास करें, प्रतिफल को खुशी से स्वीकार करें, अहंकार को त्याग दें और किसी भी परिस्थिति का ना अपने आप को कारक समझे ना ही निवारक। तब आपके लिए हर परिस्थिति मात्र परिस्थिति होगी। हर रूप में सुखद होगी। पूरा जीवन एक लंबी निश्चिंत किशोरावस्था और युवावस्था बन जाएगा।"
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