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फंदे उल्टे सीधे...This is for my Pari

माँ ने कुछ फंदे सलाई में डाले और बिठा लिया बेटी को पास। ध्यान से देखो क्योंकि तुमको भी बुनना है एक स्वेटर अपनी सास का अपने श्वसुर का बुनना होगा पति के लिए और एक देवर का ननद नंदोई के लिए पहले बुनना है ताकि आए न तुम पर कोई भी बात। यह बातें मेरी माँ ने कही थी। ऊन ध्यान से तुम  सुलाझना पड़ न जाए उसमें गांठ एक डिजाइन उल्टे फंदो का एक सिखाऊं सीधे का आज।  रख लूंगी सहेज कर इनको तुम्हारे दहेज के मैं साथ खुश हो जायेंगे घरवाले पाकर बहू के हाथों की गरमाहट। यह बातें मुझसे मेरी माँ ने कही थी वही समझा रही हूं तुमको आज कम न रहे मेरी भी गुड़िया सारे आएं उसको काज। रंग बिरंगे फंदो को तुम आपस में कुछ ऐसे मिलाना बुन जाए नया डिजाइन सबसे सुंदर नजर वो आए बच्चों के टोपे के साथ मोजे बुनना मैं सिखाऊं दस्ताने और मफलर गुड़िया सबकी ठंडक जल्द भगाएं। ऐसा मेरी माँ ने कहा था तुमको भी मैं समझा रही कुछ बुनाई सीखा रही हूं। कुछ ऊन अपनी पसंद की अपने लिए भी तुम ले लेना बुन लेना अपने भी सपने यह कहना माँ को याद नहीं क्योंकि ऐसा माँ ने कभी नहीं सुना था क्योंकि माँ की माँ ने नहीं कहा था।

बेटे

  कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं ! संबल , आस, उम्मीद जहां भर की, हर सवाल के हाजिर जवाब में रखते हैं, घर की रौनक बन चहकते बेटे, परिवार को रौशन कर चिराग से दिखते हैं ! कभी झगड़े, कभी मस्ती , कभी धूम-धड़क्का  जिन्हें लड़ाकू कहकर दोस्त शिकायत करते हैं ! सबसे  से आँख बचाकर आज भी अम्मा के तकिये के नीचे बटुआ छिपा कर रखते हैं ! रिश्ते की बात चले अगर कभी तो, शर्माकर कनखियों से माहौल को तकते हैं ! फोटो देख अपने भावी जीवन साथी का, पैर के अंगूठे से फर्श की दरार को कुरेदते हैं ! बेटा, भाई, पति और पिता का किरदार निभाकर, अपने वजूद को तलाश हरबार तरसते हैं ! घर की नींव की ईंट में लगे सिमेंट जैसे, रिश्तों में आई हर दरार को भरते हैं ! कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं !

गोपाल

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द्वापर युग में भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में जन्म लिया| भगवान श्रीकृष्ण का बचपन गायों की सेवा करते ही बीता. शायद इसी कारण से उन्हें गोपाल भी कहकर पुकारा जाता है. वैसे तो वृंदावन के हर घर में ही गाय पाली जाती थी. लेकिन बाल्यकाल से ही  कृष्ण और गायों के बीच एक अलग ही प्रकार का अलौकिक और भावपूर्ण रिश्ता रहा. कृष्ण ने जब पूतना का वध किया तो श्रीकृष्ण के पूरे शरीर को शुद्ध करने के लिए उनकी मां यशोदा और गोपियों ने कृष्ण के शरीर पर गोरज, गोमूत्र लगाया था. यानि कि तीन लोकों के स्वामी को बुरी नज़र से बचाने का कार्य गाय किया करती थी.  कृष्ण के पिता नंदबाबा के घर कई सेवादार थे लेकिन कृष्ण हमेशा खुद गाय दुहने की ज़िद किया करते थे. 'तनक कनक की दोहनी दे री मैया। तात दुहन सिखवन कह्यौ मोहि धौरी गैया।' यहां सूरदासजी ने देखिए किस खूबसूरती से कृष्ण और मैया यशोदा के बीच हुई बातचीत का वर्णन किया है- आजु मैं गाइ चरावन जैहौं। बृंदाबन के भांति-भांति फल अपने कर मैं खेहौं।। ऐसी बात कहौ जनि बारे, देखो अपनी भांति। तनक-तनक पग चलिहौ कैसैं, आवत ह्वैह्वै राति।। प्रात जात गैया लै चारन, घर आवत हैं सांझ। तुम...

इस तरह करता हूं मैं प्रेम

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मैं इस तरह  करता हूं तुमसे प्रेम जैसे चिड़िया करती है  तिनका-तिनका जोड़ कर अपने घोंसले से या फिर बालों को संवारती हुई मां अपनी बेटी से और जैसे माली करता है अपने उगाए पौधों पर खिलते हुए फूलों से। तुम्हारे तपते चेहरे पर सुनहरी हो गई मुस्कान से करता हूं मैं प्रेम क्योंकि यह  पृथ्वी के प्रथम युगल में संवाद की कूट भाषा है। मैं इस तरह  करता हूं तुमसे प्रेम जैसे चूमते हैं युगल  एक दूसरे में डूब कर, उस चुंबन का अहसास करोगी तो जान जाओगी कि  मैंने चूमा है हर बार  सिर्फ तुुम्हारी रूह को फिर समझ लोगी कि  मैंने क्या कहा है  आसमान में इंद्रधनुष बनाती तुम्हारी सपनीली आंखों से जहां निरंतर  जलती है एक लौ जो गरीबों के चूल्हे को सुलगाती है सुबह-शाम जिसकी आंच पर  रोटियां ही नहीं धीरे धीरे पकता है प्रेम भी उन श्रमिक युगलों के लिए जो बनाते हैं - हमारे लिए धरती पर आशियाना और खुद रह जाते हैं बेघर।   ज्वालामुखी की आग समेटे तुम्हारी इन आंखों से करता हूं प्रेम जो रूढ़ियों और मरती परंपराओं   की लौह शृंखलाओं को गला देना चाहती हैं और खोल देना चा...

सफर

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  अपनी सत्तर बरस की मां को देखकर, क्या सोचा है तुमने कभी, कि वो भी कभी कालेज में टाईट कुर्ती  और स्लैक्स पहन कर जाया करती थी ! तुम हरगिज़ नहीं सोच सकते कि तुम्हारी माँ जब अपने घर के आँगन में छमछम कर चहकती हुई ऊधम मचाती दौड़ा करती तो घर का कोना-कोना  उस आवाज़ से गुलज़ार हो उठता था ! तुम नहीं जानते कि 'ट्विस्ट' डांस वाली प्रतियोगिता में, जीते थे उन्होंने अनेकों बार प्रथम पुरुस्कार ! किशोरावस्था में वो जब भी कभी अपने गीले बालों को तौलिए में लपेटे  छत पर फैली गुनगुनी धूप में सुखाने जाया करती, तो न जाने कितनी ही पतंगें  आसमान में कटने लगा करती थी ! क्या सोचा है तुमने कभी कि अट्ठारह बरस की मां ने तुम्हारे बीस बरस के पिता को  जब वरमाला पहनाई तो मारे लाज से  दुहरी होकर गठरी बन, उन्होंने अपने वर को  नज़र उठाकर भी नहीं देखा था! तुमने तो ये भी नहीं सोचा होगा कि  तुम्हारे आने की दस्तक देती उस प्रसव पीड़ा के उठने पर अस्पताल जाने से पहले  उन्होंने माँग कर बेसन की खट्टी सब्जी खाई थी ! तुम सोच सकते हो क्या कि कभी, अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि तुम्हें...

बेटे

  कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं ! संबल , आस, उम्मीद जहां भर की, हर सवाल के हाजिर जवाब में रखते हैं, घर की रौनक बन चहकते बेटे, परिवार को रौशन कर चिराग से दिखते हैं ! कभी झगड़े, कभी मस्ती , कभी धूम-धड़क्का  जिन्हें लड़ाकू कहकर दोस्त शिकायत करते हैं ! सबसे  से आँख बचाकर आज भी अम्मा के तकिये के नीचे बटुआ छिपा कर रखते हैं ! रिश्ते की बात चले अगर कभी तो, शर्माकर कनखियों से माहौल को तकते हैं ! फोटो देख अपने भावी जीवन साथी का, पैर के अंगूठे से फर्श की दरार को कुरेदते हैं ! बेटा, भाई, पति और पिता का किरदार निभाकर, अपने वजूद को तलाश हरबार तरसते हैं ! घर की नींव की ईंट में लगे सिमेंट जैसे, रिश्तों में आई हर दरार को भरते हैं ! कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं !

पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो।

  बेईमानी का पैसा  पेट की एक-एक आंत  फाड़कर निकलता है।         रमेश चंद्र शर्मा, जो पंजाब के 'खन्ना' नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे,  उन्होंने अपने जीवन का एक पृष्ठ खोल कर सुनाया  जो पाठकों की आँखें भी खोल सकता है  और शायद उस पाप से, जिस में वह भागीदार बना, उस से भी बचा सकता है।       मेडिकल स्टोर अपने स्थान के कारण, काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था।  लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि *धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है*  और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई। रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी।  अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली।  लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा। मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था, क्योंकि मेडिकल फील्ड में दोगुनी नहीं, बल्कि कई गुना कमाई होती है। शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे, कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में...