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लड़के

 कुछ लड़के बड़े अच्छे लगते हैं जब मां से पूछते हैं , "आम का अचार है क्या ?" कुछ लड़के जब कभी किसी लड़की को  कनखियों से देखने पर पकड़े जाते हैं, तो शर्माकर, सकपकाकर , पकड़ने वाले से ही  पलटकर पूछते हैं "क्या हुआ ? कुछ भी तो नहीं !" कसम से , अच्छे लगते हैं ! अच्छे लगते हैं वे सारे लड़के, जो मंगलवार और शनिवार  मंदिर में प्रसाद चढ़ा, मन ही मन सबकी राजी-खुशी  मांगा करते हैं , और मीठी बूंदी और पेड़े घर -मुहल्ले में बिना नागा बाँटा करते हैं ! अच्छे लगते हैं वे सारे लड़के  जो चाकलेट, चिप्स के पैकेट खोलकर कर देते हैं सबसे पहले  अपनी माँ और बहन के आगे, और कहते हैं , "लो, आपका फेवरेट है न ये वाला !" कुछ लड़के सचमुच अच्छे लगते हैं जब, ऐमी.वाई.बंटाई के गानों से बेखबर , सुनते हैं किशोर कुमार और मोहम्मद रफी को, और गुनगुनाते हैं, कहीं दूर जब दिन ढल जाए ! वे सारे लड़के सच में बहुत अच्छे लगते हैं, जो अक्सर  गोलगप्पे वाले से कहते हैं , "भैया मुझे अबकी मीठा पानी वाला देना !" अच्छे लगते हैं ऐसे सारे लड़के , क्योंकि इनके व्यक्तित्व में कुछ न कुछ तो  ऐसा जरूर होता ...

मेरे बेटे

  कभी इतने ऊँचे मत होना कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ . न कभी इतने बुद्धिजीवी कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग . इतने इज़्ज़तदार भी न होना कि मुँह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो . न इतने तमीज़दार ही कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी . इतने सभ्य भी मत होना कि छत पर प्रेम करते कबूतरों का जोड़ा तुम्हें अश्लील लगने लगे और कंकड़ मारकर उड़ा दो उन्हें बच्चों के सामने से . न इतने सुथरे ही होना कि मेहनत से कमाए गए कॉलर का मैल छुपाते फिरो महफ़िल में . इतने धार्मिक मत होना कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ . न कभी इतने देशभक्त कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको . कभी इतने स्थायी मत होना कि कोई लड़खड़ाए तो अनजाने ही फूट पड़े हँसी . और न कभी इतने भरे-पूरे कि किसी का प्रेम में बिलखना और भूख से मर जाना लगने लगे गल्प। .

बेटियां

   घुंघराले बालों वाली सीधे, और सीधे बालों वाली  उन्हें घुंघराला करवाती हैं, लंबे बालों वाली ब्वायकट और ब्वायकट वाली  नकली चोटी लगाती है! ये लड़कियां भी न जाने  क्या ऊधम मचाती हैं ? साड़ी बाँधती हैं मम्मी की ,  ऊपर भाई की टीशर्ट  पहन इठलाती हैं, कभी हाई हील की सैंडिल  तो कभी स्पोर्टशूज़ पहन कदम बढ़ाती हैं, ये लड़कियां भी न जाने  क्या ऊधम मचाती हैं! लिपस्टिक लगाती हैं छिप छिप कर, कभी चश्मा पहन, हाथ नचाती हैं! कलाई पर घड़ी बांध, कभी हाथ में छड़ी ले टीचर बन जाती हैं ! ये लड़कियां भी न जाने क्या क्या ऊधम मचाती हैं! घर-घर में कभी पापा बन, अखबार के पन्ने उलटाती हैं! और कभी अम्मा बन  सब पर हुकुम चलाती हैं! गुड्डे-गुड़िया की शादी कर मुहल्ले में बताशे  बंटवाती है! ये लड़कियां भी न जाने  क्या क्या ऊधम मचाती हैं! चाकलेट, टाफी हुए पुराने अब खुद ही ओरियो शेक बनाती हैं! घर में तितली बन कर उड़ती, एक दिन चिड़िया बन उड़ जाती हैं ! याद आती है बस तब इनकी बेटियां घर क्यों छोड़ जाती हैं ?

एक प्रेरक भावपूर्ण संस्मरण

  मन तो कानपुर में बसने का बनाया था किन्तु नियति लखनऊ खींच लायी। सन् 1980 में सपरिवार जाकर बस गया। उस क्षेत्र में मेरे आवास बनाने के पूर्व मात्र चार आवास ही बने थे। अत: अपने आवास से जब कभी बाहर निकलता तो सर्वत्र सन्नाटा ही सन्नाटा। किन्तु हाँ! चूँकि मेरे आवासीय क्षेत्र से सटा हुआ गाँव फतेहपुर था अत: लगता था कि पड़ोस में कुछ घर बसे हैं। ख़ैर! ये सब विवरण तो संस्मरण की मुख्य सामग्री से हटकर है। मेरे संस्मरण का मुख्य केन्द्र तो एक अख़बार वाला है जो इस विरल बस्ती में भी मात्र मुझको अख़बार देने के लिए प्रात: 4:30 बजे के लगभग आ जाता था। प्रात:काल जिस समय वह अख़बार देने आता था उस समय मैं उसको अपने मकान की 'गैलरी' में टहलता हुआ मिल जाता था। अत: वह मेरे आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए मेरे आवास में अख़बार फेंकता और मुझको *'नमस्ते बाबू जी'* वाक्य से अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था।  क्रमश: समय बीतने के साथ मेरे सोकर उठने का समय बदल कर प्रात: 5:0 बजे हो गया। जब कई दिनों तक मैं उसको प्रात: टहलते नहीं दिखा तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:0 बजे वह मेर...

सबसे अनमोल

  अशोक जी अपनी पत्नी के  साथ अपनी रिटायर्ड जिंदगी बहुत हँसी खुशी गुजा़र रहे थे...उनके तीनों बेटे अलग अलग शहरों में अपने अपने परिवारों के साथ थे...उन्होनें नियम बना रखा था....दीपावली पर तीनों बेटे सपरिवार उनके पास आते थे...वो एक सप्ताह कैसे मस्ती में बीत जाता था...कुछ पता ही नही चलता था। कैसे क्या हुआ...उनकी खुशियों को जैसे नज़र ही लग गई... अचानक शीला जी को दिल का दौरा पड़ा ...एक झटके में उनकी सारी खुशियाँ बिखर गईं। तीनों बेटे दुखद समाचार पाकर दौड़े आए...उनके सब क्रिया कर्म के बाद सब शाम को एकत्रित हो गए...बड़ी बहू ने बात उठाई,"बाबूजी, अब आप यहाँ अकेले कैसे रह पाऐंगे... आप हमारे साथ चलिऐ।" "नही बहू, अभी यही रहने दो...यहाँ अपनापन लगता है... बच्चों की गृहस्थी में...।" कहते कहते वो चुप से हो गए... बड़ा पोता कुछ बोलने को हुआ...उन्होंने हाथ के इशारे से उसे चुप कर दिया... "बच्चों, अब तुम लोगों की माँ हम सबको छोड़ कर जा चुकी हैं... उनकी कुछ चीजें हैं... वो तुम लोग आपस  में बांट लो...हमसे अब उनकी साजसम्हाल नही हो पाऐगी।" कहते हुए अल्मारी से कुछ निकाल कर लाए....मखमल के थै...

ज़िन्दगी की शाम ढलने को है

किसी बात पर पत्नी से चिकचिक हो गई, वह बड़बड़ाते घर से बाहर निकला, सोचा कभी इस लड़ाकू औरत से बात नहीं करूँगा, पता नहीं समझती क्या है खुद को? जब देखो झगड़ा, सुकून से रहने नहीं देती। नजदीक के चाय के स्टॉल पर पहुँच कर चाय ऑर्डर की और सामने रखे स्टूल पर बैठ गया.  आवाज सुनाई दी - *"इतनी सर्दी में बाहर चाय पी रहे हो?"* उसने गर्दन घुमा कर देखा तो साथ के स्टूल पर बैठे बुजुर्ग उससे मुख़ातिब थे.  *"आप भी तो इतनी सर्दी और इस उम्र में बाहर हैं."* बुजुर्ग ने मुस्कुरा कर कहा *"मैं निपट अकेला, न कोई गृहस्थी, न साथी, तुम तो शादीशुदा लगते हो."*  *"पत्नी घर में जीने नहीं देती, हर समय चिकचिक,बाहर न भटकूँ तो क्या करूँ?"* गर्म चाय के घूँट अंदर जाते ही दिल की कड़वाहट निकल पड़ी. बुजुर्ग-: *"पत्नी जीने नहीं देती?"* *"बरखुरदार ज़िन्दगी ही पत्नी से होती है. आठ बरस हो गए हमारी पत्नी को गए हुए, जब ज़िंदा थी, कभी कद्र नहीं की, आज कम्बख़्त चली गयी तो भूलाई नहीं जाती, घर काटने को होता है, बच्चे अपने अपने काम में मस्त, आलीशान घर, धन दौलत सब है पर उसके बिना कुछ मज़ा नहीं, य...

बूढ़े माँ-बाप के पास,

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 बूढ़े माँ-बाप के पास, आखिरी बचा सहारा , बस यही एक मकान है, जिसमें सजा बरसों बरस से, पुराना सा कुछ सामान है! कुछ फर्नीचर है दीमक खाया, हिलती मेज के बीच रखा  प्लास्टिक का एक गुलदान है! दालान में खड़ी शीशम की  अलमारी में माँ के हाथों डाला  आंवले के मुरब्बे भरा  पुराना रंगीन काँच का  एक मर्तबान है! पिछवाड़े में खड़ा बरसों से हरा सा था जो एक लैंब्रैटा, अब सफेद होकर लगता जैसे घर से बेघर होकर  सहारा तलाशता मेहमान है ! पड़े हैं संदूकों में कई छोटे मोजे, चार फ्राक, एक निक्कर , तीन टोपे छुटकी की छटी का पीला झबला एक पुड़िया में घर के शुभ को रखी  बड़के की आँवनाल है! एक काजल की डिबिया है  सूखी बादाम वाली महक जिसमें से आती है  आज भी मंझली वाली ! दीवारों की किरचों से झाँकते, कई परतों के झड़ते रंग, अलग-अलग जीवन के दौरों की  कहानी सुनाते जैसे कोई निगहबान है ! सहारे सारे साथ छोड़ गए  अब इनके लाठी में बसते प्राण हैं ! बस यही सब बचा-खुचा सा जीने को जरूरी ये सामान है ! बूढ़े माता-पिता के पास, आखिरी बचा सहारा , बस यही एक मकान है, जिसमें सजा बरसों ब...