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जब तुम साथ..

  जब तुम साथ चलती हो मेरे बाजुओं में बादलों के पंख उग आते हैं पहाड़ों में जाने कहां से झरते हुए सोते निकल आते हैं जंगल में वनदेवी हमारा साथ देने पग-पग पर मचलती है हरे-भरे खेतों से गुजरते समय बाएं नीलकंठ और  दाएं हारिल उड़ते चलते हैं जब तुम साथ चलती हो  तो समय ऋषिकेश के गंगा की तरह निर्मल-कलकल-मचलता चलता है जब तुम साथ चलती हो तो एक पाल वाली नाव हम दोनों को लेकर समुंदर में अपने में मगन चलती है जब तुम साथ चलती हो तो हम ही चलते हैं और दुनिया बस अचरज से  भौंचक देखती है !

यादें

साठ सत्तर-90 के दशक की, यादें ये हैं पुरानी। गांव कस्बों के बचपन की, यारों ये है कहानी।। जर्जर सी शाला थी अपनी, फर्श था कच्चा, दीवारें उधड़ीं, गुरूजी के हाथों की छड़ी, ककहरा,पहाड़े और बारहखड़ी।। सावधान! विश्राम! की आवाज, सजगता की अलख जगाती। प्रार्थना पंक्ति की कतारें, अखाड़ा सी बन जातीं।। गोबर से फर्श लीपकर, टाटफट्टी बिछाते। हरी पत्तियों से घिस घिस, श्यामपट्ट चमकाते।। गुरूजी की छड़ी का, आतंक था भयंकर। शरारतों का भूत, जाता था झट उतर।। पालथी मार, सिर घुमा घुमा, पहाड़े याद किया करते। याद होने पर हाथ उठा, स्वगर्वित हो जाते ।। शोक सभा बाद मिली छुट्टी, दे जाती थीं खुशियां बड़ी। मासूम सा बालमन क्या जाने, जनम-मरण की धोखाधड़ी।। राष्ट्रीय त्यौहारों के अवसर पर, अनुशासन में बंध जाते। भाषण गीत ध्यान से सुनते, पा लड्डू हर्षाते।। जब भी नागपंचमी आती, स्लेट पे नागाकृति बनाते। फिर शाला में स्लेट सजाकर, दूध,फूल, बेलपत्ती चढ़ाते।। बैलों का पर्व, जब आता पोला, लकड़ी का घुड़ला सजाते। ठेठरे-खुरमे जेबों में भर, घुड़ले संग दौड़ लगाते।। भोले पार्वती का पर्व तीजा, रतजगा कर मनाते। अगली सुबह अलसाए नेत्रों से, शाला ...

।। कितने दिन बीत गए ।।

हवा में खिले हुए कितने दिन बीत गए बादलों से गले मिले कितने दिन बीत गए सूरज से बात किए कितने दिन बीत गए चांद से आंख लड़े कितने दिन बीत गए नदी में घुसे हुए कितने दिन बीत गए रेत पर बिछे हुए कितने दिन बीत गए खेत पर झुके हुए कितने दिन बीत गए मेंड़ पर पड़े हुए कितने दिन बीत गए पेड़ों की छांह तले कितने दिन बीत गए अपनों से तने हुए कितने दिन बीत गए बेसुध से गिरे-पड़े कितने दिन बीत गए अंधेरे से बिना लड़े कितने दिन बीत गए खुद पर मेहरबान हुए कितने दिन बीत गए खुद से अनजान हुए कितने दिन बीत गए हवा में खिले हुए.... …..... बीत गए...

पिता

  पिता! तुम हिमालय से थे पिता  कभी तो कितने विराट  पिघलते हुए से कभी  बुलाते अपनी दुर्गम चोटियों से  भी और ऊपर कि आओ- चढ़ आओ   पिता तुममें कितनी थीं गुफाएँ  कुछ गहरी सुरंग सी  कुछ अँधेरी कितने रहस्य भरी  कितने कितने बर्फीले रास्ते  जाते थे तुम तक  कैसे दीप्त हो जाते थे  तुम पिता जब सुबह होती  दोपहर जब कहीं सुदूर किसी  नदी को छूकर दर्द से गीली हवाएँ आतीं तुम झरनों से बह जाते  पर शाम जब तुम्हारी चोटियों के पार सूरज डूबता  तब तुम्हें क्या हो जाता था पिता  तुम क्यों आँख की कोरें छिपाते थे  तुम हमारे भर नहीं थे पिता  हाँ! चीड़ों से याकों से भोले गोरखाओं से तुम कहते थे पिता- 'मै हूँ '  तब तुम और ऊँचा कर लेते थे खुद को  पर जब हम थक जाते  तुम मुड़कर पिट्ठू हो जाते  विशाल देवदार से बड़े भैया  जब चले गए थे घर छोड़कर  तब तुम बर्फीली चट्टानों जैसे  ढह गए थे   रावी सिंधु सी बहनें जब बिदा हुई थीं  फफककर रो पड़े थे तुम पिता   ताउम्र कितने कितने ...

एक पूरा पहाड़

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 किसी रोज़ मैं तुम्हारे लिए  एक पूरा पहाड़ बनाऊंगा- मैं उसकी छाती पर  चीर के पेड़ लगाऊंगा  हर उस दिन के लिए-एक  जिस दिन मैं तुमसे नहीं मिल पाया। वो पहाड़ हरी घास से ढका होगा, उतना ही जितना  ढक कर रखते हैं तुम्हारे ख्याल मुझे।  उसमें एक झरना भी होगा,  जो तुम्हारे हंसते ही  फूट पड़ेगा वक़्त के पत्थरों से।  और उसमें मैं समेट दूंगा  तमाम आंसू कि वो अब कभी हिम्मत न करें  उन आंखों से निकलने की।  उसकी चोटी पर होगा  एक गांव- जहां बचपन से लेकर अभी तक  देखा तुम्हारे हर खूबसूरत सपने  को दूंगा मैं एक मकाँ।  काफी उम्र होने पे जब इस कविता के बाल सफेद हो जाएं, और शब्दों को पड़ जाएं झुर्रियां तब उस पहाड़ पर  मैं चला जाऊंगा रहने  और रहूंगा वहां  तब तक-जब तक  तुम फुर्सत नहीं निकाल पाओ  और  नक्शा न ढूंढ पाओ उस पहाड़ तक  पहुंचने का।  डरना मत तुम आराम से आना मैं मरूंगा नहीं क्योंकि देवता मर सकते हैं प्रेम और पहाड़ कभी नहीं।। 

My Favorite book list (Nonu)

  1) India After Gandhi – Ramchandra Guha 2) Indian Philosophy – Dr S. Radhakrishnan 3) A House for Mr. Vishwas – V.S. Naipaul 4) Oliver Twist – Charles Dickens   5) Hard Times – Charles Dickens 6) The Essays – Francis Bacon 7) Dreams from my Father – Barack Obama 8) War & Peace – Leo Tolstoy 9) The God of Small Things – Arundhati Roy 10) Gora – Rabindranath Tagore 11) Hot Days Long Nights – Nadezda Obradovic 12) The Wind from the Hills – Sethu 13) Reading Gandhi – Kusumlata Chaddha 14) The Argumentative Indian – Dr. Amartya Sen 15) Sherlock Holmes - Arthur Conan Doyle 16) India : An Introduction - Khushwant SIngh  17) Muhammad Ali- Graphic Novel (Campfire)  18) Jonathan Livingston Seagull - Richard Bach 19) William Shakespeare’s The Empire Striketh Back – Ian Doescher 20) Snow - Orhan Pamuk  21) Twenty Love Poems and a Song of Despair : Pablo Neruda  22) The Book Thief - Markus Zusak  23) 1984 - George Orwell ***************Hindi Literature*****...

क्रिसमस की रात और चार्ली चैपलिन की बात

चार्ली ने अपनी नृत्यांगना बेटी को एक मशहूर खत लिखा। कहा- मैं सत्ता के खिलाफ विदूषक रहा, तुम भी गरीबी जानो, मुफलिसी का कारण ढूंढो, इंसान बनो, इंसानों को समझो, जीवन में इंसानियत के लिए कुछ कर जाओ, खिलौने बनना मुझे पसंद नहीं बेटी। मैं सबको हंसा कर रोया हूं, तुम बस हंसते रहना। बूढ़े पिता ने प्रिय बेटी को और भी बहुत कुछ ऐसा लिखा। मेरी प्यारी बेटी, रात का समय है। क्रिसमस की रात। मेरे इस छोटे से घर की सभी निहत्थी लड़ाइयां सो चुकी हैं। तुम्हारे भाई-बहन भी नीद की गोद में हैं। तुम्हारी मां भी सो चुकी है। मैं अधजगा हूं, कमरे में धीमी सी रौशनी है। तुम मुझसे कितनी दूर हो पर यकीन मानो तुम्हारा चेहरा यदि किसी दिन मेरी आंखों के सामने न रहे, उस दिन मैं चाहूंगा कि मैं अंधा हो जाऊं। तुम्हारी फोटो वहां उस मेज पर है और यहां मेरे दिल में भी, पर तुम कहां हो? वहां सपने जैसे भव्य शहर पेरिस में! चैम्प्स एलिसस के शानदार मंच पर नृत्य कर रही हो। इस रात के सन्नाटे में मैं तुम्हारे कदमों की आहट सुन सकता हूं। शरद ऋतु के आकाश में टिमटिमाते तारों की चमक मैं तुम्हारी आंखों में देख सकता हूं। ऐसा लावण्य और इतना सुन्दर नृत...