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किवाड़

क्या आपको पता है ? कि किवाड़ की जो जोड़ी होती है, उसका एक पल्ला पुरुष और, दूसरा पल्ला स्त्री होती है। ये घर की चौखट से जुड़े - जड़े रहते हैं। हर आगत के स्वागत में  खड़े रहते हैं। खुद को ये घर का  सदस्य मानते हैं। भीतर बाहर के हर रहस्य जानते हैं।। एक रात उनके बीच था संवाद। चोरों को लाख - लाख धन्यवाद वर्ना घर के लोग हमारी एक भी चलने नहीं देते। हम रात को आपस में मिल तो जाते हैं, हमें ये मिलने भी नहीं देते। घर की चौखट के साथ हम जुड़े हैं, अगर जुड़े जड़े नहीं होते तो किसी दिन तेज आंधी -तूफान आता, तो तुम कहीं पड़ी होतीं, हम कहीं और पड़े होते।। चौखट से जो भी  एक बार उखड़ा है। वो वापस कभी भी नहीं जुड़ा है। इस घर में ये जो झरोखे , और खिड़कियाँ हैं। यह सब हमारे लड़के और लड़कियाँ हैं।। तब ही तो इन्हें बिल्कुल खुला छोड़ देते हैं। पूरे घर में जीवन रचा बसा रहे, इसलिये ये आती जाती हवा को, खेल ही खेल में ,घर की तरफ मोड़ देते हैं। हम घर की  सच्चाई छिपाते हैं। घर की शोभा को बढ़ाते हैं ।   भले कुछ भी खास नहीं ,  पर उससे ज़्यादा बतलाते हैं। इसीलिये घर ...

अगर_भारत_की_सारी_अद्भुत_जगहों_के_बारे_में_लिखूं_तो कविता_नहीं_किताब_बन_जाये ?

सुनो.... मैं कहाँ करूँगी तुमसे uk लंदन जाने की ज़िद मुझे पसंद ही नहीं है दूसरा देश... हम ना बनारस चलेंगे.... घाटों की ढ़लती शामों में.... दोनो पैरों को पानी में डालके.... हम बातें करेंगे ढेर सारी.... और वो जो बिंदी खरीदी थी हमने उस मंदिर वाली दुकान से... मैं लगा के आऊँगी.... फिर दोनों करेंगे आरती .. गंगा मैया की.... हम ना वृन्दावन भी चलेंगे महसूस करेंगे वो ज़िन्दगी.... जो मेरे कान्हा ने राधे के साथ जी होगी.... तुम लगा देना उन फूलों को मेरे बिखरे हुवे बालों में... जो उस पावन धरती पे गिरे होंगे... हम बैठेंगे मधुवन में देखेंगे रास जियेंगे हर ख़्वाब जो कभी राधे ने कृष्ण को दिखाए होंगे और सुनो.... फिर चलेंगे हम वहाँ जिसे ग़ुलाबी शहर कहते हैं अपने प्रीत का रंग भी तो गुलाबी ही है ना मैं क्यूँ कहूँगी तुमसे 5 सितारा होटल की ख़्वाहिश.... हम सड़क के किनारे ढाबे पे बाटी चोखा खाएंगे.... कैपचिनो और जाने क्या क्या पीते हैं लोग हम तुम्हारे साथ टपरी वाली चाय पिया करेंगे हमारे ख़्वाब महंगे नहीं अजीब है हम भारत के हैं.... यहीं की खूबसूरती को निहारते रह जाएंगे❤️❤️❤️ ...

अर्ध रात्रि का ज्ञान

सोचा है कभी आपने ’’अरे! क्या हुआ कल तक तो भले चंगे थे, और आज हार्ट अटैक!’’ मैंने आश्चर्य ये पूछा। ’’दो नंबर का माल भरा पड़ा है पर कहीं लगा नहीं पा रहे हैं, इसलिए बहुत दिनों से टेंशन में चल रहे थे।’’ समीर ने हंसकर कहा। तो मैं आश्चर्य में डूबा रहा क्योंकि मुझे ये समझ ही नहीं आ रहा था कि इतना कितना माल था जो कहीं इनवेस्ट नहीं कर पा रहे हैं। आखिर मैंने पूछ ही लिया। ’’यार! कितना पैसा होगा जो इनवेस्ट नहीं कर पा रहा है ?’’ ’’तुम और हम कल्पना नहीं कर सकते, इतना पैसा है। तनखा लगभग पचास हजार, चाय नाश्ता पानी पेट्रोल, दारू मुफ्त में। इसके बाद कमीशन पांच परसेंट।’’ समीर आंखें बड़ी करके बोला। ’’तो?’’ मेरे मुंह से कोई आश्चर्य प्रगट नहीं हो रहा था। समीर मुझे घूर कर देखता हुआ पूछा। ’’अच्छा! तुम ही बताओं वो सब इंजीनियर कितना कमाता होगा दो नंबर का ?’’ मैं एक पल को सोचा और बोला-’’बीस-तीस-पचास हजार रूपया महीना।’’ मेरी इस बात पर समीर हंस पड़ा और बोला-’’बस यही कमी है हमारे देशवासियों की। वो अपनी कमाई से दूसरों की तुलना करते हैं। जबकि उनकी और देशवासियों की कमाई की कोई तुलना नहीं है।’’ ’’......’’ मैं ...

एक चर्चा हिन्दू संस्कृति की

सुहागन रहो, सौभाग्यवती भव आदि पति के ज़िंदा रहने का आशीष ख़ूब मिलते हैं महिलाओं को, पत्नी जिए-ऐसा कोई आशीष सुना आजतक? सवाल आलोचना का नही, सुधार का है. हम पहले भी बदलते रहे हैं, अब भी बदलें। हमारी संस्कृति एक विज्ञान है जिसमें श्रेष्ठतम को स्थान दिया जाता है। और श्रेष्ठतम भी कैसा ? ऐसा श्रेष्ठ जो किसी अन्य को नुकसान न पहुंचाये, सिर्फ और सिर्फ अपना ही काम करे। सर्वे भवन्तु मंगलम! हमारे कृत्य से जो उद्देश्य लिया है वो तो पूरा हो जाये और उसके साथ ही किसी अन्य का नुकसान न हो भले ही लाभ हो जाये। ग़ौर कीजिए न- पुरुषों को भी गाली अगर दी जाय तो वह महिलाओं की ही होती है. इसके उलट महिलाओं को भी आशीर्वाद दिया जाय तो वह पुरुषों के लिए ही होता है. क्या यह सही है? क्या इन छोटे-छोटे बदलावों पर हमें ध्यान नही देना होगा? बदलना नही चाहिए हमें? सच ही तो है ये बात! हमें अपने समाज में ऐसी विरोधाभासी चीजों को ढूंढ ढूंढ कर नष्ट किये जाने की आवश्यकता है। और भी बहुत सी बातें हैं जिनके विरोध की आवश्यकता है। यहां एक बात विचारणीय है कि आज हम बहुत सी बातों को जानने का दावा करते हैं, क्या हम आज अपनी पढ़ाई में प...

35 वर्ष पहले मेरे बचपन की दिवाली

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आज का भ्रम और बचपन की हकीकत 35 वर्ष पहले गाँव का जीवन उतना ही सरल था जितना ग्रामीण संस्कृति की विशेषता बताने वाले समाजशास्त्री अपनी किताबों में लिखते हैं। इस सरल ग्रामीण जीवन में बच्चों का बचपन और भी ज्यादा मासूम था। दिवाली की जैसी उत्सुकता आज के बच्चों में है, वैसी हम में नहीं थी, क्योंकि मिट्टी के बने हमारे कच्चे घर में इस दिन न नये वस्त्र पहने का रिवाज था, न पकवान बनाने का और न ही पटाके फोड़ने का। इस दिन सुबह दादाजी अपने प्रतिदिन की दिनचर्या से हटकर सबसे पहले स्नान कर लेते थे और दादीजी गेंहू के दलिये की खीर (क्योंकि पैसों के अभाव में चावल खरीदना मुश्किल होता था) बनाने का उपक्रम शुरू कर देती थी। हम बच्चे उस घड़ी का इंतजार करते थे जब दादाजी उस खीर का भोग हमारे पितृ देवों को चढ़ाते थे, ताकि प्रसादस्वरूप हमें खीर खाने को मिल सके। पेट भर जाने के बाद भी बालमन को तृप्ति नहीं होती थी तो गाँव के और लोगों के पितृ देवों के चबूतरों पर दौड़कर पहुँच जाते थे, जहॉ पीपल के पत्तों पर और खीर खाने का मौका मिल जाता था। हमारे लिए दिवाली का दिन पितृ देवों के लिए बनी अमावस्य की खीर के स्वाद का आनंद लेत...

लंका-विजय के बाद

तब भारद्वाज बोले, "हे ऋषिवर, आपने मुझे परम पुनीत राम-कथा सुनाई, जिसे सुनकर मैं कृतार्थ हुआ। परन्तु लंका-विजय के बाद बानरो के चरित्र के विषय में आपने कुछ नहीं कहा. अयोध्या लौटकर बानरों ने कैसे कार्य किए, सो अब समझाकर कहिये." याज्ञवल्क्य बोले, "हे भारद्वाज, वह प्रसंग श्रद्धालु भक्तों के श्रवण योग्य नहीं है। उससे श्रद्धा स्खलित होती है. उस प्रसंग के वक्ता और श्रोता दोनों ही पाप के भागी होते हैं." तब भारद्वाज हाथ जोड़कर कहने लगे, "भगवन, आप तो परम ज्ञानी हैं। आपको विदित ही है कि श्रद्धा के आवरण में सत्य को नहीं छिपाना चाहिए. मैं एक सामान्य सत्यांवेशी हूँ. कृपा कर मुझे बानरों का सत्य चरित्र ही सुनाईए." याज्ञवल्क्य प्रसन्न होकर बोले, "हे मुनि, मैं तुम्हारी सत्य-निष्ठा देखकर परम प्रसन्न हुआ. तुममें पात्रता देखकर अब मैं तुम्हें वह दुर्लभ प्रसंग सुनाता हू, सो ध्यान से सुनो." इतना कहकर याज्ञवल्क्य ने नेत्र बंद कर लिए और ध्यान-मग्न हो गए। भारद्वाज उनके उस ज्ञानोद्दीप्त मुख को देखते रहे. उस सहज, शांत और सौम्य मुख पर आवेग और क्षोभ के चिन्ह प्रकट होन...

जाया करो गरीबों की बस्ती में भी कभी-कभी...!!! *कुछ भी नहीं तो शुक्र-ए-खुदा सीख जाओगे....!!!

जिनके पास अपने हैं, वो अपनो से झगड़ते हैं, जिनका कोई नहीं अपना, वो अपनो को तरसते हैं कल न हम होगे न गिला होगा, सिर्फ सिनटी हुई यादो का सिलसिला होगा, जो लम्हें हैं चलो हंसकर बिता ले, जाने कल जिंदगी का क्या फैसला होगा!! शरीर की सुंदरता महत्वपूर्ण नहीं हैं, कर्म सुन्दर होने चाहिए, हमारे विचार हमारी वाणी, व्यवहार, संस्कार और हमारा चरित्र सुंदर होना चाहिये, जो जीवन में कर्म सुन्दर करता हैं, वही इंसान दुनिया का सबसे सुंदर शख्स हैं और जमाना भी उनका ही दीवाना हैं....!! विचार बहता हुआ पानी हैं, यदि इसमें आप, गंदगी मिलाएंगे तो वो, गंदा नाला बन जायेगा! और सुगंध मिलाएंगे तो फिर, वही गंगाजल कहलायेगा!! किसी ने पूछा कि उम्र और जिंदगी, में क्या फर्क हैं? बहुत सुंदर जवाब... जो अपनो के बिना बीती वो उम्र, और जो अपनो के साथ बीती वो जिंदगी हैं!! बदलता वक्त..... और बदलते लोग..... किसी के भी नहीं हुआ करते.....! सच्चा व्यक्ति ना तो नास्तिक होता हैं.... ना ही आस्तिक होता हैं..... सच्चा व्यक्ति हर समय वास्तविक होता हैं....!! आँसू न होते जो आँखे इतनी खुबसूरत न होती, दर्द न ...