Posts

अनुभव

 आज एक ऐसा अनुभव हुआ जिसे मैं शायद ही कभी भूल सकूं.  मेरे मोबाइल का स्क्रीन गार्ड दरक गया था. उसे बदलवाने के लिए एक छोटी-सी थड़ी नुमा दुकान पर रुका. एक छोटी उम्र का लड़का वह दुकान चला रहा था. उसे मोबाइल दिखाया तो उसने कहा कि ऑरिजिनल, कम्पनी का स्क्रीन गार्ड एक सौ रुपये का होगा. मैंने उसे लगाने की स्वीकृति दे दी. वह किसी और के मोबाइल पर स्क्रीन गार्ड लगा रहा था. बहुत तसल्ली और सफाई से वह अपना काम कर रहा था. जैसे ग्राहक को निबटा कर पैसे जेब के हवाले करने की उसे कोई जल्दी ही न हो. मुझे समझ में आया कि उसके हाथ में जो मोबाइल था वह स्विगी के एक डिलीवरी बॉय का था. बॉय जल्दी कर रहा था, कि उसकी डिलीवरी लेट हो रही है, लेकिन मोबाइल वाला लड़का पूरे परफेक्शन के साथ अपना काम कर रहा था. काम पूरा हुआ, डिलीवरी बॉय ने उसे सौ का नोट दिया, मैंने चोर निगाहों से देखा कि मोबाइल वाले ने उसे बीस रुपये लौटाए हैं. डिलीवरी बॉय वहां से हट ही रहा था कि मैंने मोबाइल वाले लड़के से कहा कि तुमने इससे तो अस्सी रुपये लिए हैं, मुझसे सौ क्यों लोगे? यह बात जाते हुए डिलीवरी बॉय ने सुन ली. वह पलटा और मोबाइल वाले लड़के के ...

मनुष्य को अभी पशुओं से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।

गिद्ध की प्रजाति का एक पक्षी है, वह अंडे देने के लिए किसी ऊंचे पर्वत की चोटी पर चला जाता है। जोड़ा वहीं अंडे देता है, मादा अंडों को सेती है, और एक दिन बच्चे अंडा तोड़ कर बाहर निकलते हैं। उसके अगले दिन सारे बच्चे घोंसले से निकलते हैं और नीचे गिर पड़ते हैं। एक दिन के बच्चे हजारों फीट की ऊंचाई से गिरते हैं। नर-मादा इस समय सिवाय चुपचाप देखते रहने के और कुछ नहीं कर सकते, वे बस देखते रहते हैं। बच्चे पत्थरों से टकराते हुए गिरते हैं। कुछ ऊपर ही टकरा कर मर जाते हैं, कुछ नीचे गिर कर मर जाते हैं। उन्ही में से कुछ होते हैं जो एक दो बार टकराने के बाद पंखों पर जोर लगाते हैं और नीचे पहुँचने के पहले पंख फड़फड़ा कर स्वयं को रोक लेते हैं। बस वे ही बच जाते हैं। बचने वालों की संख्या दस में से अधिकतम दो ही होती है। अब आप उस पक्षी के जीवन का संघर्ष देखिये! जन्म लेने के बाद उनके दस में से आठ बच्चे उनके सामने दुर्घटना का शिकार हो कर मर जाते हैं, पर उनकी प्रजाति बीस प्रतिशत जीवन दर के बावजूद करोड़ों वर्षों से जी रही है। संघर्ष इसको कहते हैं। एक और मजेदार उदाहरण है। जंगल का राजा कहे जाने वाला शेर शिकार के लिए क...

संदेश देती कहानी

  पवन काफी देर से नोएडा, गौर सिटी चौक पर खड़ा हुआ किसी ऑटो के इंतजार में था, जो भी ऑटो आ रहे थे वह पहले से भरे होने के कारण ड्राइवर के साथ आगे बैठने को कह रहे थे, वह सोच रहा था ऐसा ऑटो दिखे जो खाली हो, ताकि पीछे की सीट पर आराम से बैठ सके व उसका सफर एक हाथ से ऑटो पकड़कर व दूसरा हाथ लटकाकर बैठने में न गुजरे, कुछ देर बाद एक ऑटो दिखाई दिया, ऑटो के धीमे होते ही पवन ने पूछा  "मेट्रो सेक्टर 52 चलोगे क्या ?" "बाबन सेक्टर? जी साहब चलिए," ऑटो वाले ने रिप्लाई किया "कितना रुपया ?" पवन ने यह सोच कर पूछा कि पूरा खाली है तो ज्यादा न मांग ले  30/ -, यह सुनकर वह बैठ गया,और जेब से मोबाइल हाथ में निकालकर चलाने लगा, जैसे ही ऑटो थोड़ा आगे बढ़ा, तो एक बुजुर्ग महिला ने, जो दो बच्चों के साथ थी, रुकने का इशारा किया और पूछा "सिटी सेंटर चलोगे क्या?" ऑटो वाले ने पीछे सीट की तरफ इशारा किया और कहा " जल्दी बैठो" "कितने रुपए लोगे?" बच्चों को पहले बिठालते हुए उस महिला ने पूछा  "30 रुपए सवारी" ऑटो वाले ने जल्दी से जवाब दिया  "अरे नहीं! पागल ...

एक तिलस्मी सपना महिला का

 . . धनपत राय 'प्रेमचन्द', जयशंकर प्रसाद, पन्त, महादेवी वर्मा,निराला, अमृतलाल नागर,बाबा नागार्जुन, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, प्रभाकर श्रोत्रिय, कल इन‌ साहित्य-रत्नों से सपने में रोचक आत्मीय संवाद हुआ । मैंने विनम्रता से कहा : एक जिज्ञासा भरा प्रश्न आप सबसे मुख़ातिब है__ "आप सब में से किसी ने कभी   कोई साहित्योत्सव आयोजित किए, उनमें भागीदारी की ?अपने ऑडियो- वीडियो बनवाए ?" यह सुनते ही, कुछ ने व्यंग्य से तिर्यक मुस्कान के साथ, बाबू जी अमृतलाल नागर एवं बाबा नागार्जुन ने ज़ोरदार ठहाके के साथ ‌और निराला जी ने बड़ी-बड़ी ऑंखों से तरेरते हुए  कहा___    "नहीं, पगली, नहीं" मैंने अचरज भरे सुर में कहा___ " फिर भी आप का साहित्य, आपकी शोहरत, आपके चर्चो की आज तक धूम कैसे है । देश में ही नहीं, सीमा पार भी, अनेक देशों में आप पर साहित्यिक अध्ययन, कार्यशालाऍं, संगोष्ठियाॅं, भाषण प्रतियोगिता, निबन्ध प्रतियोगिता, छोटे-बड़े संस्थानों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों आदि में बड़े सम्मान और उत्साह से आयोजित होती हैं । ऐसा ...

बहुमूल्य रत्न

बीस दिन के पश्चात अस्पताल से घर लौटी शैलजा, पर.. घर लौट कर भी तो वह बिस्तर पर ही है। अचानक पैर फिसल जाने के कारण पांव की हड्डी टूट गई है। जब से वह बिस्तर पर है तब से उसकी 18 वर्षीय बेटी लेखा ने अपने कंधों पर सारी जिम्मेदारी ले रखी है। घर में खाना बनाना, फिर मां के लिए टिफिन भर के अस्पताल ले जाना, उन्हें खिलाना, बेड पैन देना, उनके शरीर को स्पंज करना, कपड़े बदलना सारी जिम्मेदारी लेखा ने बखूबी संभाल ली। एक नन्ही सी जान और काम हजार फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं। इतने सब कामों के बीच भी अपनी पढ़ाई जारी रखना कोई मामूली बात नहीं है परंतु लेखा ने उसे भी बखूबी संभाल लिया है क्योंकि इस साल उसे इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जाम देना है।  शैलजा को चाहे कितनी ही तकलीफ हो वह अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेर कर अपनी बेटी से कहती "अब थोड़ा सा आराम कर लो बेटा! इतना काम करने के पश्चात फिर पढ़ाई के लिए बैठ गई हो। शरीर को भी थोड़ा सा आराम देना जरूरी है।" मां की तकलीफ को देखकर लेखा की आंखों में कई बार आंसू आ जाते परंतु मां के सामने वह अपने चेहरे पर दुख का भाव आने नहीं देती। वह जानती है कि "अगर मेरे चेहरे प...

स्वप्न

   विभीषण को लंका का राजपाठ सँभाले दो दिन हो गए थे , और वह लंका के बहुत से मानचित्र लेकर समुद्र के इस पार राम, सीता, लक्ष्मण से मिलने आए थे । राम , रावण की समृद्धि, तकनीकी प्रगति, विज्ञान, मनोरंजन के साधन, विचार आदि को समझना चाहते थे ।विभीषण उन्हें एक के बाद एक मानचित्र समझाते चले जा रहे थे । “ यह देखिये , यहाँ पूरी शोध की सुविधाएँ हैं, यहाँ दूर तलक मनोरंजन ग्रह है , यहाँ विभिन्न विचारों को पोषित करने वाले गुरूकुल है, सूचनाएँ विस्तृत थी, और प्रभावी थी । राम, सीता और लक्ष्मण इस नए ज्ञान से स्तब्ध थे । विभीषण के जाने के बाद,लक्ष्मण ने अपने विचारों से उभरते हुए कहा,  “ भईया, मुझे आश्चर्य है कि इतने शक्तिशाली साम्राज्य को हमने निर्धन , अशिक्षित, वानर सेना की सहायता से पराजित कैसे कर दिया?  यदि विभीषण ने हमें उसके भेद बता भी दिये थे , तो भी , यह कारण तो पर्याप्त नहीं हो सकता ।” “ मैं भी यही सोच रहा हूँ , “ राम ने कहा, “ उनके पास तो वायुयान थे और हमारे पास रथ भी नहीं थे , वे नित नए हथियार बना रहे थे, और हमारे पास वहीं प्राचीन हथियार थे , उनके पास प्रशिक्षित सेना थी , हमारे...

चीन

Image
चीन पर वे हथकंडे नहीं अपनाए जा सकते थे, जो भारत में काम आए। भारत में रह कर ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहाँ के भेद समझ लिए थे। जबकि चीन उनके लिए अनसुलझी पहेली थी।  भारत में उन्हें अलग-अलग रंगों के, आस्थाओं के, सामाजिक वर्गों, भाषाओं के, और अलग रियासतों के लोग मिले। उनमें फूट डालने के तरीके तो उन्हें मिल गए थे। उन्हें अपनी सहूलियत से जोड़ना कुछ पेचीदा काम था। दूसरी तरफ़, चीन की सरहदों को उन्होंने सिर्फ़ एक बंदरगाह पर आवा-जाही और कुछ संस्मरणों से जाना था। वहाँ के लोग उन्हें एक जैसे दिखते, एक जैसी भाषा बोलने-लिखने वाले और एक ही राजा के अधीन नज़र आते। उन्हें कैसे तोड़ा जाए? हालाँकि ब्रिटिशों को यह मालूम हुआ कि मंचू साम्राज्य में मंगोलों की भागेदारी घट रही है, और उत्तरी हान वंशजों की बढ़ रही है। तिब्बत भी चीन में शामिल तो था, मगर वे चीनी नहीं। कुछ ऐसा ही शिनजियांग प्रांत में भी था।  मकार्टनी ने चीन से लौटते हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा-  “चीन का साम्राज्य किसी दक़ियानूसी लेकिन एक ऊँचे दर्जे के जहाज की तरह है, जिसे उसके काबिल अधिकारियों ने डेढ़ सौ वर्षों से समंदर में टिकाए रखा है। वह जहा...