Posts

31 दिसंबर 2025

Image
  हमारे झगड़े पलंग पर  गीला तौलिया रखने से  नहीं होते अब। न होते हैं झगड़े गलत ढंग से  चप्पल जूते रखने पर । और बिना नहाए नाश्ता करने पर या  खाने के साथ सेंव या  नमकीन लेने पर भी  अब नहीं होती कोई  झंझट या तकरार । अलमारी में बेतरतीब कपड़े  या स्टडी टेबल पर  बिखरी किताबें भी  अब खीज नहीं पैदा करती । खाने में क्या पसंद करोगे ये सवाल अब नहीं लुभाता बल्कि ये पूछना कि  खाने में ये पच जाएगा  अब सुकून देता है । शहर से बाहर सफर पर जाते समय एक दूसरे को कपड़ों की नहीं  दवाइयों की याद  दिलाने का समय  आ गया है अब। अपनी अपनी स्पेस  ढूंढने के लिए झगड़ने  का नहीं  अपनी स्पेस  दूसरे के लिए छोड़ने का समय  आ गया है अब। जिन बच्चों को समझाबुझाकर  डांट डपटकर बड़ा किया है अब उनकी समझाइश  सुनने का और उनसे  डांट खाने का समय  आ गया है अब। झगड़ों और डांट का रूठने और मनाने का समझने और समझाने का सबका समय अब  निकलता जा रहा है। अब तो  एक दूसरे का  एक दूसरे के अंदर  अनंत वि...

छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाएँ – हमें रुककर सोचना होगा

Image
पिछले कुछ दिनों में देशभर में 4 बच्चों ने स्कूल-संबंधी तनाव और अपमान के कारण अपनी जान दे दी—दिल्ली का कक्षा 10 छात्र, मध्य प्रदेश की कक्षा 11 छात्रा, राजस्थान का 9वीं का बच्चा और जयपुर की 9 साल की बच्ची। हर कहानी दर्दनाक है… और हर कहानी एक चेतावनी भी। सच्चाई यह है कि हमने अपने बच्चों को भावनात्मक रूप से बहुत कमजोर बना दिया है। पहले शिक्षक का वाक्य—“तू गधा है”—सिर्फ टोकना माना जाता था। आज वही बात पूरी कक्षा में बोल दी जाए, तो बच्चा anxiety में चला जाता है। क्यों? क्योंकि “शिक्षक की छड़ी हम पहले ही छीन चुके हैं।” अब शिक्षक हर शब्द बोलने से डरते हैं—कहीं शिकायत न हो जाए, कहीं वायरल न हो जाए। शिक्षक धीरे-धीरे गुरु नहीं, “service-sector employee” बन रहे हैं। लेकिन दोष सिर्फ शिक्षकों का नहीं है। घर में माता-पिता भी “five-star steward” बन चुके हैं— हर मांग पूरी करना, हर छोटी सी असफलता से बचाना, हर चीज़ में show-off… यही बच्चों का मानसिक रिज़र्व कमजोर कर देता है। हम सब मिलकर अपने बच्चों को ऐसे नाजुक बना चुके हैं कि एक ताना, एक डांट, एक रिपोर्ट कार्ड… और वे टूट जाते हैं। समय आ गया है कि— ✔ शिक्...

पिता

Image
 एक बार मैं अपने एक परिचित से बात कर रहा था । उन्होंने मुझे बताया कि एक समय उनका परिवार अपने क्षेत्र का नामचीन परिवार हुआ करता था , किसी तरह की कोई कमी नहीं थी । तभी अचानक से उनके पिता जी की मृत्यु हों गई ,उस समय वो बहुत छोटे थे और परिवार में एक छोटा भाई भी था । पिता की मृत्यु के बाद चाचाओं ने अच्छा बर्ताव नहीं किया और ख़ानदानी संपत्ति में से भी कुछ नहीं मिला । यहाँ तक की पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई । उसके बाद माताजी ने अथक परिश्रम करके बच्चों को पढ़ाया लिखाया और काबिल बनाया । मित्रों , अक्सर हमारे परिवारों में पिता की भूमिका अंडररेटेड रहती है । मैं अक्सर ये कहता हूँ कि एक घर बनाने के किए दीवार भी चाहिए और छत भी चाहिए । माँ घर की दीवार होती है जो चारों ओर से हमे अपने आवरण में रखती है पर पिता घर की छत होता है । उस छत पर अक्सर हमारा ध्यान नहीं जाता पर जब वो छत नहीं रहती तब पता चलता है कि अब तो बारिश भी भिगा रही है , ठंड भी गला रही है और गर्मी भी जला रही है । सर पर पिता का साया है तो किसी की हिम्मत नहीं है तुम्हारी तरफ़ आँख उठाने की पर पिता के हटते ही पता चलता है कि दुनिया तो हमे नोचन...

अब न रहे वो सुननेवाले’, इसलिए नहीं गढ़ी जाती अब वो पाठशाला

Image
 आज की प्राथमिक शिक्षा बस स्मार्ट क्लास और स्मार्ट बोर्ड की सोशेबाजी रह गई है। बच्चा किताब से कितना जुड़ पाया, यह देखने वाला कोई नहीं, मगर प्रोजेक्टर ठीक से चल रहा है या नहीं, यही सबसे बड़ा मुद्दा है। एक समय था जब प्राथमिक शिक्षक बच्चों को अक्षर सिखाने से पहले उन्हें मिट्टी में लोट-पोट करवाते थे, ताकि वे धरती से जुड़ना सीखें। आज के शिक्षक को मजबूरी है—“एप डाउनलोड कराओ, रिपोर्ट अपलोड कराओ”। पुरानी पाठशालाओं में तख्ती पर लिखे अक्षर पीढ़ियों तक जीवन का पाठ पढ़ा देते थे। आज की किताबें ‘एक सत्र, एक परीक्षा’ तक ही सीमित हैं। शिक्षा का उद्देश्य कभी मनुष्य गढ़ना था, अब सिर्फ रैंकिंग और रिजल्ट रह गया है। बच्चे पढ़ाई में डूबते कम, और कॉपी चेकिंग व टेस्टिंग के बोझ में घुटते ज़्यादा हैं। आधुनिक शिक्षा तो किसी ब्रूटस के खंजर की तरह है—बच्चों के निष्कलुष मन में ज्ञान नहीं, बल्कि अंकों का दबाव घोंप देती है। कभी पंचतंत्र की कहानियाँ सुनो, कभी कबीर के दोहे या तेनालीराम की चतुराई—यही प्राथमिक शिक्षा का आधार थे। इनसे सोचने की शक्ति, हँसने की कला और जीने का साहस मिलता था। आज का ‘एजुकेशन सिस्टम’ मेहनत ...

एक छोटा परीक्षण

Image
 कई बीमारियाँ वास्तव में बीमारियाँ नहीं होतीं, बल्कि सामान्य उम्र संबंधी परिवर्तन होती हैं। बीजिंग के एक अस्पताल के निदेशक ने बुजुर्गों के लिए पाँच महत्वपूर्ण सलाहें दी हैं — आप बीमार नहीं हैं, आप बस बूढ़े हो रहे हैं  । बहुत-सी बीमारियाँ जिन्हें आप बीमारी समझते हैं, वे वास्तव में शरीर के वृद्ध होने के संकेत हैं । 1- कमज़ोर याददाश्त यह अल्ज़ाइमर नहीं है, बल्कि बुजुर्ग मस्तिष्क की एक स्व-सुरक्षात्मक प्रक्रिया है। डरिए मत — यह बीमारी नहीं, मस्तिष्क की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया है। यदि आप चाबी कहाँ रखी भूल जाएँ, लेकिन थोड़ी देर में ढूँढ लें — तो यह डिमेंशिया नहीं है। 2- धीरे चलना या पैर डगमगाना यह लकवा नहीं है, बल्कि मांसपेशियों के क्षीण होने का परिणाम है। इसका इलाज दवा नहीं, बल्कि व्यायाम है। 3- अनिद्रा (नींद न आना) यह बीमारी नहीं है, बल्कि मस्तिष्क अपनी लय बदल रहा है। यह नींद की संरचना में बदलाव है। नींद की गोलियाँ बिना सोचे-समझे न लें — लंबे समय तक इन पर निर्भरता से गिरने, स्मरणशक्ति घटने आदि का जोखिम बढ़ता है। बुजुर्गों के लिए सबसे अच्छी नींद की दवा है – धूप लेना और नियमित दिनचर...

स्त्रियां

Image
 कुछ स्त्रियां अब भी थोड़ी पुरानी स्त्रियां हैं  उनकी साड़ियां बहुत सुंदर होती हैं  लेकिन उनके ब्लाउज़ डीप कट वाले नहीं होते  वे नहीं दिखाती अपनी टांगें  वे शराब या सिगरेट नहीं पीतीं  फेसबुक पर अकाउंट तो बनाती हैं  लेकिन स्क्रीनशॉट स्क्रीनशॉट नहीं खेलतीं  वे ऐसी किसी भी बहस में हिस्सा नहीं लेतीं  कि स्त्रियों को पुरुष संतुष्ट कर पाते हैं या नहीं  उनके लिए शरीर शरीर जितना ही है  उनकी आत्मा आत्मा से भी बहुत सूक्ष्म है  वे अभी नहीं सीख सकी हैं कॉल रिकॉर्डिंग  उन्हें महिला थाने के नाम से भी डर लगता है  वे अपने बच्चों को तारक मेहता का उल्टा चश्मा दिखा रही हैं  उनके फोन उनके बच्चे और उनके पति भी चलाते हैं  वे सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं  लेकिन उनके दोस्तों में सिर्फ़ कुछ परिजन हैं और बहुत जानकर लोग उनके नंबर अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं  उनके फोन की गैलरी अपने बच्चों और पति की फोटोज से भरी पड़ी है  वे सुबह जल्दी उठ रही हैं  वे खाना बना रही हैं  वे टिफिन बांध रही हैं  वे बच्चों को स्कूल भे...

शराब अच्छी लगती थी

Image
 शराब पीकर मैंने ऐसे-ऐसे कारनामे किये जिनके लिए अब माफ़ी तक नहीं माँगी जा सकती. उनकी याद से भी गहरी शर्मिंदगी होती है. अल्कॉहोलिक बन चुका था. पंद्रह बरस पहले यह हालत हो गई थी मेरे नज़दीकी पीठ पीछे बाकायदा भविष्यवाणी करने लगे थे मैं तीन-चार साल में मर जाऊँगा.  शराब अच्छी लगती थी. बहुत अच्छी लगती थी. दुनिया भर की शराबों के बारे में जानना और उन्हें चखना पसन्द था. बांज और धुंए की लम्बी संगत से पैदा हुई सिंगल मॉल्ट #व्हिस्की की महक प्राणवायु लगती थी. अपने जीवन में बढ़िया शराबों को मैंने वफ़ादार माशूकाओं से भी ज्यादा नाज़ के साथ जगह दी.  पीते हुए शराब को हमेशा डिफेंड किया. सारे दोस्त पीते थे. शुरू-शुरू में लगता था कि एक बार साथ पी लेने पर कोई भी व्यक्ति आपका अन्तरंग दोस्त बन जाता है. इस बात को समझने में कई बरस लगे कि मैं गलत सोचता था. ऐसे बहुत से हरामखोर थे जो पीते तो मेरी थे लेकिन खुद सच्चे गृहस्थ और शरीफ-सफल नागरिक बने रह कर मुझे शराबी घोषित किया करते. इस मामले में मेरी तुलना उस लेब्राडोर कुत्ते से की जा सकती है जो घर में घुसे चोर को देख कर भी दुम हिलाने लगता है. शुरुआती जीवन की स...