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Showing posts from 2025

31 दिसंबर 2025

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  हमारे झगड़े पलंग पर  गीला तौलिया रखने से  नहीं होते अब। न होते हैं झगड़े गलत ढंग से  चप्पल जूते रखने पर । और बिना नहाए नाश्ता करने पर या  खाने के साथ सेंव या  नमकीन लेने पर भी  अब नहीं होती कोई  झंझट या तकरार । अलमारी में बेतरतीब कपड़े  या स्टडी टेबल पर  बिखरी किताबें भी  अब खीज नहीं पैदा करती । खाने में क्या पसंद करोगे ये सवाल अब नहीं लुभाता बल्कि ये पूछना कि  खाने में ये पच जाएगा  अब सुकून देता है । शहर से बाहर सफर पर जाते समय एक दूसरे को कपड़ों की नहीं  दवाइयों की याद  दिलाने का समय  आ गया है अब। अपनी अपनी स्पेस  ढूंढने के लिए झगड़ने  का नहीं  अपनी स्पेस  दूसरे के लिए छोड़ने का समय  आ गया है अब। जिन बच्चों को समझाबुझाकर  डांट डपटकर बड़ा किया है अब उनकी समझाइश  सुनने का और उनसे  डांट खाने का समय  आ गया है अब। झगड़ों और डांट का रूठने और मनाने का समझने और समझाने का सबका समय अब  निकलता जा रहा है। अब तो  एक दूसरे का  एक दूसरे के अंदर  अनंत वि...

छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाएँ – हमें रुककर सोचना होगा

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पिछले कुछ दिनों में देशभर में 4 बच्चों ने स्कूल-संबंधी तनाव और अपमान के कारण अपनी जान दे दी—दिल्ली का कक्षा 10 छात्र, मध्य प्रदेश की कक्षा 11 छात्रा, राजस्थान का 9वीं का बच्चा और जयपुर की 9 साल की बच्ची। हर कहानी दर्दनाक है… और हर कहानी एक चेतावनी भी। सच्चाई यह है कि हमने अपने बच्चों को भावनात्मक रूप से बहुत कमजोर बना दिया है। पहले शिक्षक का वाक्य—“तू गधा है”—सिर्फ टोकना माना जाता था। आज वही बात पूरी कक्षा में बोल दी जाए, तो बच्चा anxiety में चला जाता है। क्यों? क्योंकि “शिक्षक की छड़ी हम पहले ही छीन चुके हैं।” अब शिक्षक हर शब्द बोलने से डरते हैं—कहीं शिकायत न हो जाए, कहीं वायरल न हो जाए। शिक्षक धीरे-धीरे गुरु नहीं, “service-sector employee” बन रहे हैं। लेकिन दोष सिर्फ शिक्षकों का नहीं है। घर में माता-पिता भी “five-star steward” बन चुके हैं— हर मांग पूरी करना, हर छोटी सी असफलता से बचाना, हर चीज़ में show-off… यही बच्चों का मानसिक रिज़र्व कमजोर कर देता है। हम सब मिलकर अपने बच्चों को ऐसे नाजुक बना चुके हैं कि एक ताना, एक डांट, एक रिपोर्ट कार्ड… और वे टूट जाते हैं। समय आ गया है कि— ✔ शिक्...

पिता

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 एक बार मैं अपने एक परिचित से बात कर रहा था । उन्होंने मुझे बताया कि एक समय उनका परिवार अपने क्षेत्र का नामचीन परिवार हुआ करता था , किसी तरह की कोई कमी नहीं थी । तभी अचानक से उनके पिता जी की मृत्यु हों गई ,उस समय वो बहुत छोटे थे और परिवार में एक छोटा भाई भी था । पिता की मृत्यु के बाद चाचाओं ने अच्छा बर्ताव नहीं किया और ख़ानदानी संपत्ति में से भी कुछ नहीं मिला । यहाँ तक की पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई । उसके बाद माताजी ने अथक परिश्रम करके बच्चों को पढ़ाया लिखाया और काबिल बनाया । मित्रों , अक्सर हमारे परिवारों में पिता की भूमिका अंडररेटेड रहती है । मैं अक्सर ये कहता हूँ कि एक घर बनाने के किए दीवार भी चाहिए और छत भी चाहिए । माँ घर की दीवार होती है जो चारों ओर से हमे अपने आवरण में रखती है पर पिता घर की छत होता है । उस छत पर अक्सर हमारा ध्यान नहीं जाता पर जब वो छत नहीं रहती तब पता चलता है कि अब तो बारिश भी भिगा रही है , ठंड भी गला रही है और गर्मी भी जला रही है । सर पर पिता का साया है तो किसी की हिम्मत नहीं है तुम्हारी तरफ़ आँख उठाने की पर पिता के हटते ही पता चलता है कि दुनिया तो हमे नोचन...

अब न रहे वो सुननेवाले’, इसलिए नहीं गढ़ी जाती अब वो पाठशाला

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 आज की प्राथमिक शिक्षा बस स्मार्ट क्लास और स्मार्ट बोर्ड की सोशेबाजी रह गई है। बच्चा किताब से कितना जुड़ पाया, यह देखने वाला कोई नहीं, मगर प्रोजेक्टर ठीक से चल रहा है या नहीं, यही सबसे बड़ा मुद्दा है। एक समय था जब प्राथमिक शिक्षक बच्चों को अक्षर सिखाने से पहले उन्हें मिट्टी में लोट-पोट करवाते थे, ताकि वे धरती से जुड़ना सीखें। आज के शिक्षक को मजबूरी है—“एप डाउनलोड कराओ, रिपोर्ट अपलोड कराओ”। पुरानी पाठशालाओं में तख्ती पर लिखे अक्षर पीढ़ियों तक जीवन का पाठ पढ़ा देते थे। आज की किताबें ‘एक सत्र, एक परीक्षा’ तक ही सीमित हैं। शिक्षा का उद्देश्य कभी मनुष्य गढ़ना था, अब सिर्फ रैंकिंग और रिजल्ट रह गया है। बच्चे पढ़ाई में डूबते कम, और कॉपी चेकिंग व टेस्टिंग के बोझ में घुटते ज़्यादा हैं। आधुनिक शिक्षा तो किसी ब्रूटस के खंजर की तरह है—बच्चों के निष्कलुष मन में ज्ञान नहीं, बल्कि अंकों का दबाव घोंप देती है। कभी पंचतंत्र की कहानियाँ सुनो, कभी कबीर के दोहे या तेनालीराम की चतुराई—यही प्राथमिक शिक्षा का आधार थे। इनसे सोचने की शक्ति, हँसने की कला और जीने का साहस मिलता था। आज का ‘एजुकेशन सिस्टम’ मेहनत ...

एक छोटा परीक्षण

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 कई बीमारियाँ वास्तव में बीमारियाँ नहीं होतीं, बल्कि सामान्य उम्र संबंधी परिवर्तन होती हैं। बीजिंग के एक अस्पताल के निदेशक ने बुजुर्गों के लिए पाँच महत्वपूर्ण सलाहें दी हैं — आप बीमार नहीं हैं, आप बस बूढ़े हो रहे हैं  । बहुत-सी बीमारियाँ जिन्हें आप बीमारी समझते हैं, वे वास्तव में शरीर के वृद्ध होने के संकेत हैं । 1- कमज़ोर याददाश्त यह अल्ज़ाइमर नहीं है, बल्कि बुजुर्ग मस्तिष्क की एक स्व-सुरक्षात्मक प्रक्रिया है। डरिए मत — यह बीमारी नहीं, मस्तिष्क की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया है। यदि आप चाबी कहाँ रखी भूल जाएँ, लेकिन थोड़ी देर में ढूँढ लें — तो यह डिमेंशिया नहीं है। 2- धीरे चलना या पैर डगमगाना यह लकवा नहीं है, बल्कि मांसपेशियों के क्षीण होने का परिणाम है। इसका इलाज दवा नहीं, बल्कि व्यायाम है। 3- अनिद्रा (नींद न आना) यह बीमारी नहीं है, बल्कि मस्तिष्क अपनी लय बदल रहा है। यह नींद की संरचना में बदलाव है। नींद की गोलियाँ बिना सोचे-समझे न लें — लंबे समय तक इन पर निर्भरता से गिरने, स्मरणशक्ति घटने आदि का जोखिम बढ़ता है। बुजुर्गों के लिए सबसे अच्छी नींद की दवा है – धूप लेना और नियमित दिनचर...

स्त्रियां

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 कुछ स्त्रियां अब भी थोड़ी पुरानी स्त्रियां हैं  उनकी साड़ियां बहुत सुंदर होती हैं  लेकिन उनके ब्लाउज़ डीप कट वाले नहीं होते  वे नहीं दिखाती अपनी टांगें  वे शराब या सिगरेट नहीं पीतीं  फेसबुक पर अकाउंट तो बनाती हैं  लेकिन स्क्रीनशॉट स्क्रीनशॉट नहीं खेलतीं  वे ऐसी किसी भी बहस में हिस्सा नहीं लेतीं  कि स्त्रियों को पुरुष संतुष्ट कर पाते हैं या नहीं  उनके लिए शरीर शरीर जितना ही है  उनकी आत्मा आत्मा से भी बहुत सूक्ष्म है  वे अभी नहीं सीख सकी हैं कॉल रिकॉर्डिंग  उन्हें महिला थाने के नाम से भी डर लगता है  वे अपने बच्चों को तारक मेहता का उल्टा चश्मा दिखा रही हैं  उनके फोन उनके बच्चे और उनके पति भी चलाते हैं  वे सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं  लेकिन उनके दोस्तों में सिर्फ़ कुछ परिजन हैं और बहुत जानकर लोग उनके नंबर अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं  उनके फोन की गैलरी अपने बच्चों और पति की फोटोज से भरी पड़ी है  वे सुबह जल्दी उठ रही हैं  वे खाना बना रही हैं  वे टिफिन बांध रही हैं  वे बच्चों को स्कूल भे...

शराब अच्छी लगती थी

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 शराब पीकर मैंने ऐसे-ऐसे कारनामे किये जिनके लिए अब माफ़ी तक नहीं माँगी जा सकती. उनकी याद से भी गहरी शर्मिंदगी होती है. अल्कॉहोलिक बन चुका था. पंद्रह बरस पहले यह हालत हो गई थी मेरे नज़दीकी पीठ पीछे बाकायदा भविष्यवाणी करने लगे थे मैं तीन-चार साल में मर जाऊँगा.  शराब अच्छी लगती थी. बहुत अच्छी लगती थी. दुनिया भर की शराबों के बारे में जानना और उन्हें चखना पसन्द था. बांज और धुंए की लम्बी संगत से पैदा हुई सिंगल मॉल्ट #व्हिस्की की महक प्राणवायु लगती थी. अपने जीवन में बढ़िया शराबों को मैंने वफ़ादार माशूकाओं से भी ज्यादा नाज़ के साथ जगह दी.  पीते हुए शराब को हमेशा डिफेंड किया. सारे दोस्त पीते थे. शुरू-शुरू में लगता था कि एक बार साथ पी लेने पर कोई भी व्यक्ति आपका अन्तरंग दोस्त बन जाता है. इस बात को समझने में कई बरस लगे कि मैं गलत सोचता था. ऐसे बहुत से हरामखोर थे जो पीते तो मेरी थे लेकिन खुद सच्चे गृहस्थ और शरीफ-सफल नागरिक बने रह कर मुझे शराबी घोषित किया करते. इस मामले में मेरी तुलना उस लेब्राडोर कुत्ते से की जा सकती है जो घर में घुसे चोर को देख कर भी दुम हिलाने लगता है. शुरुआती जीवन की स...

बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है

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 मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ चाट के ठेले पर दहीबड़े खा रहा था। अचानक ठेले वाले ने अपने बीस-बाईस साल के बेटे को खींचकर थप्पड़ मारा और झुँझलाते हुए बोला, तुझे कितनी बार समझाया है कि कांजी के पानी वाला कुरछा दहीबड़ों में मत डाला कर। इसका अलग कुरछा रखा है न। पिता का यह व्यवहार देखकर मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा, भाई साहब, यह सही बात नहीं है। यहाँ भरी सड़क पर जवान बेटे को थप्पड़ मारना मूर्खता है।मेरी बात सुनकर ठेलेवाले की आँखों में आँसू आ गए। वह भरे गले से बोला, क्या करूँ साहब, जब यह बार-बार गलती करता है तब मुझसे रहा नहीं जाता। एम.ए. कर रहा है फिर भी चूक करता है। शायद अब मैं भी ज़रा चिड़चिड़ा हो गया हूँ। पिता के आँसू देख लड़का मेरी ओर मुड़ा और गुस्से में बोला, गलत मेरे पापा नहीं हैं साहब, गलत आप हैं जो एक बेटे के सामने बाप को गलत सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। यह मेरे पिता हैं। इनका मुझ पर पूरा हक है। ये चाहे मुझे थप्पड़ मारें या डाँटें, मुझे कोई शिकायत नहीं। जब मुझे शिकायत नहीं है तो आप क्यों टोक रहे हैं। और सुन लीजिए, बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है । इतना कहकर...

ज्ञानी झुकता है ताकि तुम्हें झुका सके।

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 बुद्ध घर वापिस लौटे बारह वर्ष के बाद।  तो बुद्ध ने आनंद से कहा, महल मुझे जाना होगा।  यशोधरा बारह वर्ष से प्रतीक्षा करती है। मैं उसका पति न रहा, लेकिन वह अभी भी मेरी पत्नी है। यह ज्ञानी और अज्ञानी की समझ है। मैं उसका पति न रहा। अब तो मैं कुछ भी नहीं हूं। न किसी का पति हूं, न किसी का पिता हूं, न किसी का बेटा हूं, लेकिन वह अब भी मेरी पत्नी है। उसका भाव अभी भी वही है। और वह नाराज बैठी है।  बारह साल का क्रोध इकट्ठा है। और उसका क्रोध स्वाभाविक है क्योंकि एक रात अचानक मैं घर छोड़कर भाग गया उससे बिना कहे। वह माननीय है, राजघर की है, राजपुत्री है, बड़ी अहंकारी है। और उसको भारी आघात लगा है। उसने किसी से एक शब्द भी नहीं कहा, वह कोई छोटे घर की अकुलीन महिला नहीं है। बुद्ध के जाने के बाद यशोधरा ने बुद्ध के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा। बारह वर्ष चुप रही। इस बात को उठाया ही नहीं। बुद्ध के पिता भी चकित, बुद्ध के परिवार के और लोग भी चकित। साधारण घर की स्त्री होती, छाती पीटती, रोती, चिल्लाती, हल्की भी हो जाती। असाधारण थी। यह बात किसी और से कहने की तो थी ही नहीं।  यह बुद्ध और उसके बीच का ...

"अंधता में एकता"

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 सुना था भारत विविधताओं का देश है - जाति, धर्म, लिंग और वर्ग में बँटा हुआ। पर अब महसूस होता है कि, हम सब भले ही अलग-अलग खानों में बँटे हों, पर समान मानसिकता से एकजुट हैं। (Differentiated by Caste, gender, religion & class but united by mindset) यह मानसिकता है - असहिष्णुता, नफ़रत और चयनात्मक न्याय की। पिछले हफ्ते एक ख़बर ने मुझे झकझोर दिया- एक वकील साहब ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर जूता फेंक दिया। और जूते के साथ "सनातन जिंदाबाद" के नारे लगे। जूता एक इंसान पर नहीं, बल्कि संविधान, न्याय और दलित अस्मिता पर उछाला गया था। फिर भी कई लोग ताली बजा रहे थे, स्टेटस लगा रहे थे -◆ "जय हो ! धर्म की रक्षा हो गई!" सोचिए ज़रा - अगर वही जूता फेंकने वाला "अल्लाह-हु-अकबर" बोलता, या "लाल सलाम" का नारा देता, या "जय भीम" की आवाज़ उठाता - तो आज वह व्यक्ति "देशद्रोही", "आतंकी", "नक्सली" और न जाने क्या-क्या कहलाता। UAPA लगाकर जेल में डाल दिया जाता, और टीवी डिबेट में उसकी नस्ल तक का विश्लेषण हो जाता। कल्पना कीजिए- अगर उस कुर्...

ऐसे तो नहीं चलेगा न।

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 पिछले दिनों सोना 56% के करीब ऊपर गया। प्रॉपर्टी और स्टॉक्स में भी उछाल आया। लेकिन सैलरी 6-7% की दर से कम हुई। जिन्हें मार्केट रेट से बढ़ना चाहिए वो नहीं बढ़ रही। कंपनियां हायरिंग बंद कर रही हैं। ज्यादा स्किल्ड लोग कम सैलरी में नौकरी करने को मजबूर है जिसके चलते कम स्किल्ड और अनुभवी लोगों, नए नए कॉलेज से निकले बच्चों को जायज नौकरी नहीं मिल रही है। इस सब में मिडिल क्लास पिछड़ रहा हैं। उसे पता नहीं है लेकिन वो धीरे धीरे गरीबी की तरफ बढ़ रहा है। सरकार टैक्स बढ़ाती जा रही है। GST हो या इनकम टैक्स , सरकार अपनी आमदनी को पूरी तरह रेग्यूलेट कर रही है। लेकिन कर्मचारियों की आमदनी को भगवान भरोसे छोड़ा हुआ है। उनके वेजेज/तनख्वाह को रेग्यूलेट नहीं कर रही। न उनको मिलने वाली कोईं सुविधा रेग्यूलेटेड है। टैक्स का मारा उद्योगपति भी कर्मचारियों सेअमानवीय ढंग से काम करवाना चाहता है। ताकि उसका मुनाफा बढ़ सके। वो एक ही आदमी से डबल शिफ्ट और काम के घंटे बढ़वाना चाहता है। उद्योगपति कह रहा की इतवार को भी काम करो। घर बैठ के बीवी का मुंह देखोगे क्या। महिलाओं की भी नाइट शिफ्ट शुरू करो। ये सब एक चैन है। ऊपर से न...

गांधी जी बनाम आम्बेडकर

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  ... जिन्ना को केवल मुसलमानों की चिन्ता थी, सावरकर को केवल हिन्दुओं की, आम्बेडकर को केवल दलितों की। अकेले गांधी जी ऐसे थे, जिन्हें पूरे हिन्दुस्तानी समाज की चिन्ता थी। अकेले गांधी जी ऐसे थे, जो हर क़ीमत पर अपने समाज को जोड़कर रखना चाहते थे। अकेले गांधी जी की दृष्टि व्यापक, संश्लेषी और दूरंदेशी थी। और अकेले गांधी जी ही ऐसे हैं, जिन्हें आज हिन्दुत्ववादियों, आम्बेडकरवादियों और मुसलमानों- सभी ने त्याग दिया है। यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी भी अब गांधीवादी मार्ग के बजाय आम्बेडकरवादी मार्ग की ओर अधिक झुकने लगी है। व्यापक-सत्य का मार्ग ऐसा ही कंटकांकीर्ण और एकाकी होता है! 1932 का पूना पैक्ट भारतीय राजनीति की एक केन्द्रीय महत्त्व वाली घटना थी। इसने गांधी जी और आम्बेडकर को एक-दूसरे के समक्ष संघर्ष की स्थिति में ला दिया। बदले रूपों और परिप्रेक्ष्यों में वह संघर्ष आज भी जारी है। लेकिन तथ्य यह है कि ब्रिटिश राज की विभाजनकारी रणनीति को लेकर जितनी सूक्ष्म और गहरी समझ गांधी जी की थी, वैसी उनके समकालीनों की नहीं थी। गांधी समन्वयकारी थे। वे स्वीकारते थे कि भारतीय समाज में अंतर्विरोध थे, लेकिन इन अंतर...

“स्नेहाद् बन्धः शरीरस्य।”

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 बुजुर्गों में कब्ज़ एक आम शिकायत है। यह समस्या चालीस के बाद पकड़ने लगती है। तब कोई ना कोई चूरन या गोली लेने से आराम मिल जाता है, फिर उसकी डोज़ डबल, फिर उससे ज़्यादा होते-होते एक समय ऐसा आता है जब कुछ काम नहीं करता। लेकिन आयुर्वेद की दृष्टि में यह केवल पेट की नहीं, पूरे जीवन की गति के ठहर जाने की कहानी है। कई इसके कारण अवसाद में चले जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कभी भी जाना पड़ सकता है। इस डर से वे मिलना-जुलना तक सीमित कर देते हैं। यहीं से एक दुष्चक्र की शुरुआत हो जाती है, फिर यह समझाना मुश्किल हो जाता है कि रोग आंत में है या मन में। आयुर्वेद में कहा गया हैं, “वायुस्तु वृद्धे प्रशस्यते”, यानी वृद्धावस्था में वात दोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। जब शरीर की धातुएँ क्षीण होने लगती हैं, रस का पोषण घट जाता है और अग्नि मंद होती है, तब वही वात जो पहले शरीर को गतिमान रखता था अब रोध उत्पन्न करता है। वही वात जब कोलन में स्थिर होता है, तब मल का गमन कठिन हो जाता है। यही वातज मलबद्धता है। ऐसे ही जब मांस और स्नायु शिथिल होते हैं तो शरीर की गति और लचक कम हो जाती है और तब वात का अतिक्रमण होकर ...

"घर के खाने की अहमियत"

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 अमेरिका जैसे देशों में जा कर बसने वाले भारतीय, जो बहुत अच्छा कमाते हैं वहां, वो भी जल्दी "कामवाली" वहां अफोर्ड नहीं कर पाते हैं.. जो थोड़ा अफोर्ड कर पाते हैं वो बस हफ्ते या दो हफ्ते में एक दिन कामवाली को खाना बनाने के लिए बुलाते हैं और एक हफ्ते से लेकर दस से पंद्रह दिन का खाना उस से बनवा के रख लेते हैं.. वो उस से सब्ज़ी, दाल, मांस और ऐसी चीज़ें बनवा के स्टोर कर लेते हैं फ्रिज में और फिर रोज़ स्वयं या तो चावल ताज़ा बना लेते हैं या फिर मॉल से लाई हुई, जमी हुई यानी फ़्रोज़न रोटी सेंक कर सब्ज़ी, दाल या मांस के साथ खा लेते हैं अमेरिका में किसी के पास समय नहीं होता है तीन समय खाना बनाने का.. एक व्यक्ति अगर एक छोटे से, यानि चार लोगों के परिवार के लिए भी अगर तीन समय खाना बनाता है, यानि सुबह नाश्ता, दोपहर का खाना और रात का डिनर तो उसे कम से कम दिन के पांच या छः घंटे देने होने हैं खाना पकाने के लिए.. अमेरिका में किसी के पास इतना समय नहीं होता है जो भारत में तीनों टाइम गरम रोटी और घर के बने खाने की वकालत करते हैं वो भी अमेरिका जा कर एक हफ़्ते का फ़्रीज़ किया हुआ खाना बड़े शौक से खाते हैं....

हम आप तो तमाशा देखने वाले हैं ही!

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 पद्मविभूषण छन्नू लाल मिश्र का परिवार लड़ मरा कि अंतिम संस्कार का पैसा कौन दे। तेरहवीं कौन कराए। कुल 25 हजार के भुगतान के लिए भाई बहन एक दूसरे का माथा फोड़ रहेसोचिए पीएम, सीएम से लेकर सोशल मीडिया पर बड़े बड़े पत्रकार छन्नूलाल मिश्र पर अपने संबंधों और उनकी तारीफ़ के ढोल पीट रहे थे. यह समाज कितना खोखला है कि अंतिम संस्कार के 25000 रूपये तक की व्यवस्था नहीं कर पाया. तेरहवीं का ख़र्चा कौन करे के लिए बेटा बेटी लड़ रहे हैं. इससे क्या सीख मिल रही है बच्चों को पारिवारिक मूल्य समझाओ यह मत बताओ कि पड़ोसी या फुआ और मौसा का बेटा इतना कमा रहा है. बच्चों को कामयाब और पारिवारिक संस्कार दो। 1. तुष्टिकरण की आदत के बाद विक्टिम कार्ड निश्चित है! 2. मेरी बेटी बेटे से कम है क्या ऐसा बोलकर बेटे को इग्नोर करना। 3. दहेज भी बेटे से त्याग कर दिलवाना और अपनी कमाई बेटी को बीच बीच में एक्सपोर्ट करना। 5. बेटे और बेटी को संस्कार दे दिए पर अगर बहु और दामाद कुसंस्कारी मिल गया तो आप क्या करेंगे। 6. मरते मरते बेटा बेटी के बीच उत्पन्न खाई को विरासत के रूप में छोड़कर जाना। सबका परिणाम यही होना है बाकी हम आप तो तमाशा द...

भगवान के घर देर जरूर है पर अन्धेर नहीं है...

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 " दुनिया गोल है " सेठ ने अभी दुकान खोली ही थी कि एक औरत आई और बोली :-    "सेठ जी यह अपने दस रुपये लो".. सेठ उस गरीब सी औरत को प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगा,जैसे पूछ रहा हो कि ... मैंने कब तुम्हे दस रुपये दिये? औरत बोली :- कल शाम को मै सामान ले कर गई थी... तब आपको सौ रुपये दिये थे, 70 रुपये का सामान खरीदा था ... आपने 30 रुपये की जगह मुझे 40 रुपये वापस दे दिये।  "सेठ ने दस रुपये को माथे से लगाया,फिर गल्ले मे डालते हुए बोला कि एक बात बताइये बहन जी?  आप सामान खरीदते समय कितने मोल भाव कर रही थी। पाँच रुपये कम करवाने के लिए आपने कितनी बहस की थी,और अब यह दस रुपये लौटाने चली आई ???? औरत बोली :- "पैसे कम करवाना मेरा हक है" मगर एक बार मोल भाव होने के बाद, "उस चीज के कम पैसा देना पाप है। सेठ बोला ... " लेकिन, आपने कम पैसे कहाँ दिये? आपने पूरे पैसे दिये थे,यह दस रुपया तो मेरी गलती से आपके पास चला गया...रख लेती,तो मुझे कोई फर्क नही पड़ने वाला था " औरत बोली :- " आपको कोई फर्क नही पड़ता ? मगर मेरे मन पर हमेशा ये बोझ रहता कि मैंने जानते हुए भी,आप...

जोड़ने वाले लोग

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 वे जोड़ने वाले लोग थे हर चीज जोड़ कर रखते थे चश्मा टूटा तब कतरन बांधी ढीली अंगूठी पर लपेटा धागा  फटे कुर्ते पर पैबंद  चप्पल पर कील ढोंक रस्सी की गाँठ खींच ली। बड़े चतुर, मेहनती लोग थे पतीले के हैंडल पर लकड़ी जोड़ लेते चाकू की धार खुद तेज करते उनके घर की कुंडी कसी रही लकड़ी एक कुल्हाड़ी से दो फांक कर लेते। वे संभाल कर रखते थे उनके यहाँ मैंने बेकार चीजें नहीं देखी पुराने कपड़ों के गुदड़े बने परात पर पतावे लगा कर संभाला गया कहीं घिस न जाए फूटी टोकनी पर तली लगवा ली बाल्टी पर पैंदी मटके की दरार पर सीमेंट लेप ली साल भर का ईंधन समेटते थे पूरे साल का अनाज। वे मेरा मेरा नहीं आपणी बेटी, आपणी बहू,  आपणा भाई, आपणा गाम पुकारते थे सब साझा था पंचायती बर्तनों में जीमते- जूठते ऊँची परस( धर्मशाला) वाले लोग थे। एक दिन जुड़ी जुड़ाई सब चीजें टूट गई  कैसे, कब पता नहीं  हाँ! इतना जानती हूँ अब कोई जोड़ने वाला भी नहीं रहा यहाँ टूटी चीजें बस फेंक दी जाती हैं।           स

इंसान का वज़न हर बार तौलने से नहीं..कई बार बोलने से भी पता चल जाता हैं..!!

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 अर्ध नग्न महिलाओं को देख कर 90℅ कौन मजे लेता है......एक दिन किसी ख़ास अवसर पर महिला सभा का आयोजन किया गया, सभा स्थल पर महिलाओं की संख्या अधिक और पुरुषों की कम थी..!! मंच पर तकरीबन पच्चीस वर्षीय खुबसूरत युवती, आधुनिक वस्त्रों से सुसज्जित, माइक थामें कोस रही थी पुरुष समाज को..!! वही पुराना अलाप.... कम और छोटे कपड़ों को जायज, और कुछ भी पहनने की स्वतंत्रता का बचाव करते हुए, पुरुषों की गन्दी सोच और खोटी नीयत का दोष बतला रही थी.!!तभी अचानक सभा स्थल से...बत्तीस पैंतीस वर्षीय सभ्य, शालीन और आकर्षक से दिखते युवक ने खड़े होकर अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति मांगी..!! अनुमति स्वीकार कर माइक उसके हाथों मे सौप दिया गया .... हाथों में माइक आते ही उसने बोलना शुरु किया..!! "माताओं, बहनों और भाइयों, मैं आप सबको नही जानता और आप सभी मुझे नहीं जानते कि, आखिर मैं कैसा इंसान हूं..??  लेकिन पहनावे और शक्ल सूरत से मैं आपको कैसा लगता हूँ बदमाश या शरीफ..??सभास्थल से कई आवाजें गूंज उठीं... पहनावे और बातचीत से तो आप शरीफ लग रहे हो... शरीफ लग रहे हो... शरीफ लग रहे हो.... बस यही सुनकर, अचानक ही उसने अजी...

भंडारे की पूरी

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 भंडारे की पूड़ियों पर किसी को प्रबंध-काव्य लिखना चाहिए! लोक में उनकी आसक्ति और प्रभाव इतने व्यापक जो हैं। वे घर में बनाई जाने वाली पूड़ियों से थोड़ी पृथक होती हैं। किंचित लम्बोतर, ललछौंही-भूरी, मुलायम, अधिक अन्नमय, और व्यापक जनवृन्द के क्षुधा-निवारण के प्रयोजन में सिद्ध।  बहुधा भंडारे की पूड़ियों में घर की गोलमटोल पूड़ियों सरीखे पुड़ नहीं होते, वे अद्वैत-भाव से ही आपकी पत्तल में सिधारती हैं। यों पूड़ी शब्द की उत्पत्ति ही पुड़ से हुई है- जैसे सतपुड़ा यानी सात तहों वाला पर्वत। पूड़ियाँ बेलते समय तो आटे की लोई एक ही पुड़ की, समतल भासती हैं, पर तले जाने पर उसमें दो पुड़े फूल आते हैं। पहला, बाहरी पुड़ा महीन और कोमल, जो जिह्वा को लालायित करता है, और दूसरा, आभ्यन्तर का, अन्न के सत्त्व को अपने में सँजोए, जिससे क्षुधा का उन्मूलन होगा! किसी धर्मशाला के कक्ष में रसोई करने वाली स्त्रियों द्वारा तारतम्य के संगीत से बेली और तली जाने वाली पूड़ियों का मन को स्निग्ध कर देने वाला दृश्य कभी निहारिए! और फिर पूड़ियों की मियाद चुक जाने पर जूठे हाथ लिए बैठे उसकी बाट जोहते भंडारा-साधकों को देखिए। महाअ...

बदलते मूल्य

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    आठ महीने की अंजली को पहली बार डे केयर में छोड़कर वृंदा आफ़िस  जा रही थी ।मेलबर्न की ये सड़कें उसे रत्ती भर भी अच्छी नहीं लग रही थी । उसे सोचकर आश्चर्य हो रहाथा कि बैंगलुरु के ट्रैफ़िक से भागकर जब वे पहली बार यहाँ आए थे तो उसने और अरविंद नेकैसे राहत की साँस ली थी, मानो अब ज़िंदगी में कोई संघर्ष बचा ही नहीं , दोनों सड़कों कीतारीफ़ में गुण गाए जा रहे थे । सब कुछ तो था ऑस्ट्रेलिया में , बढ़िया मेडिकल फ़ैसिलिटी, बढ़िया स्कूल, शुद्ध हवा, हाँ, ओज़ोन होल की समस्या थी, पर उसके लिए उपाय थे। सस्तेव्याज पर बैंक ने लोन दे दिया था ,और  उन्होंने एक बढ़िया सा घर इतने कम समय में लेलिया था। कोविड समाप्त होते न होते वह गर्भवती हो गई थी । और इधर रशिया और यूक्रेनका युद्ध भी आरम्भ हो गया था , और वे देख रहे थे कि यह युद्ध तो समाप्त होता नज़र ही नहींआ रहा , और महंगाई लगातार बढ़ रही है। जब तक उनकी बेटी अंजली हुई, तब तक व्याजकी दर भी बढ़ने लगी थी । इसलिए वृंदा को मजबूरी में अंजली को डे केयर छोड़ कर फिर सेकाम पर जाना पड़ रहा था । कार चलाते हुए उसकी ब्रा दूध से थोड़ी गीली हो आई तो उसकी आँखे...

सब मन का खेल है । जिस ने मन को समझ लिया वो मुक्त हो गया !

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 आज से तीसेक साल पहले की बात बतलाऊँ। तब अमीर भी इतने अमीर नहीं होते थे कि एकदम अलग-थलग हो जावें। अपना लोटा-थाली अलग लेकर चलें। पंगत में सब साथ ही जीमते थे। मिठाइयों की दुकान पर वही चार मिठाइयाँ थीं, बच्चों के लिए ले-देकर वही चंद खिलौने थे। जब बाज़ार ही नहीं होगा तो करोड़पति भी क्या ख़रीद लेगा? अमीर से अमीर आदमी भी तब दूरदर्शन पर हफ्ते में दो बार रामायण, तीन बार चित्रहार और नौ बार समाचार नहीं देख सकता था, क्योंकि आते ही नहीं थे। देखें तो उस ज़माने में तक़रीबन सभी एक जैसे ग़रीब-ग़ुरबे थे। सभी साइकिल से चलते थे। कोई एक तीस मार ख़ां स्कूटर से चलता होगा। हर घर में टीवी टेलीफोन नहीं थे। फ्रिज तो लखपतियों के यहां होते, जो शरबत में बर्फ़ डालकर पीते तो सब देखकर डाह करते। लोग एक पतलून को सालों-साल पहनते और फटी पतलून के झोले बना लेते। चप्पलें चिंदी-चिंदी होने तक घिसी जातीं। कोई लाटसाहब नहीं था। सब ज़िंदगी के कारख़ाने के मज़दूर थे।  जीवन जीवन जैसा ही था, जीवन संघर्ष है ऐसा तब लगता नहीं था। दुनिया छोटी थी। समय अपार था। दोपहरें काटे नहीं कटतीं। पढ़ने को एक उपन्यास का मिल जाना बड़ी दौलत थी। दूरदर्शन पर क...

अपने बुजुर्गों का सम्मान करें! यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है।

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 जब मृत्यु का समय निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धर्मपाल को बुलाकर कहा कि,  बेटा मेरे पास धन-संपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है।  तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी। बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए। अब घर का खर्च बेटे धर्मपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया।  धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा। अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है।  क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था। और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी।   एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतना...