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चाय के नुक्कड़

कभी-कभी नहीं अक्सर ही मेरे दिल में खयाल आता है... कि शहर के हर चौराहे पर, हर एक नुक्कड़ पर.... चाय की एक गुमटी औरतों के लिए भी होनी चाहिए जहाँ खड़ी हो कर कभी अकेले तो कभी अपने दोस्तों के संग बीच बाज़ार, भरे चौराहे, ठहाके लगा सकें साझा कर पाएं अपने घुमक्कड़ी के किस्से नौकरी की परेशानियां नज़रंदाज़ कर दी गयी फब्तियां देश की इकॉनमी पर अपने विचार वायरल हुए जोक और मीम्स और वो सब कुछ जो उनके मन की चारदीवारी में खरबों युगों से ज़ब्त है एक धौल में सारी मायूसी लापता हो जाये चाय की चुस्कियों के मिठास में गुम हो जाये... बेटी के इंजीनियरिंग एंट्रेंस की चिंता नौकरीपेशा बेटे के लिए अपनी जैसी हूबहू बहु लाने का सपना बंद हो जाये... इतनी देर कैसे हो गयी, इतनी देर कहाँ रह गयी घर का कुछ ध्यान है या नहीं जैसे अनगिनत सवालों का गूंजना और सबसे बड़ा सवाल कि ''आज खाने में क्या पकेगा?'' की पकाहट से कुछ पल के लिए सही मिल जाये मुक्ति औरतें अपने सारे फ़िक्र, सारी परेशानियां पास पड़े कूड़े के डब्बे में फेंक दें और मुस्कुराते हुए कहें... चल यार! कल मिलते हैं इसी समय अप...

हद जिंदगी की

          "मम्मा, मुझे एक्सट्रा क्लासेस केलिए देर हो रहा है।मैं चलती हूँ" यह कहके राधिका दरवाजा पीट के हडबडी में चली गयी।"बेटा,नाश्ता करके तो जा" रसोई से मुद्रा ये कहके आने तक राघिका की स्कुटी की ध्वनी क्षीण हो गया था।मुद्रा को राधिका की व्यवहार आज कल अजीब लग रहा था।जो हर माँ बाप को होता है बच्चों की किशोर उम्र में।मन में संदेह की बुंद बडा आकार ले रही थी।"कहीं मेरी बेटी किसी से..." अपने आप से कुछ कहते कहते यकायक से चुप हो गयी मुद्रा।मन की नाव उसे कहीं और लेके जा रही थी।             बिलकुल राधिका की उम्र की ही थी वो। इसी तरह व्यस्त हो कर दौडती थी काॅलेज मानस से मिलने।चुपके चुपके लाइब्रेरी में मिल मिल कर ही उन दोनों का प्रेम परिपक्व हुआ था।हर प्रेमी के तरह वो भी कुछ सोच के अपने आप हसती थी।सबकी तरह वो भी डायरी में गीत की अंतरा लिखती थी,         "पहले भी यूं तो बरसे थे बादल          पहले भी यूं तो भीगा था आँचल              अब के बरस क्यों सजन   ...

ठण्ड बहुत है

दिसंबर का महीना अभी बीता नहीं ठण्ड भी परवान नहीं चढ़ी बर्फ यहाँ वहां बिखरी पड़ी है मुझे याद आता है मुंशी प्रेमचंद का झबरू जो पूस की रात में अपने मालिक से चिपक दूर करता है ठण्ड का कहर और मालिक भी बेखबर फसल के चौपट हो जाने से, अभी बाकि है बुखारी में आग का सुलगना अभी-अभी चूल्हे की आग ठण्डी पड़ी है और वो मूंगफली के स्वाद में भूल गयी है चावल चढ़ाना लकड़ी की सीलन ने बढ़ा दी हैं मुश्किलें अब आग नहीं जलती उठता है धुआं मेरी एक साल की बिटिया कुनमुनाने लगी है सच में दिसम्बर में जनवरी सी ठण्ड है

किवाड़

क्या आपको पता है ? कि किवाड़ की जो जोड़ी होती है, उसका एक पल्ला पुरुष और, दूसरा पल्ला स्त्री होती है। ये घर की चौखट से जुड़े - जड़े रहते हैं। हर आगत के स्वागत में  खड़े रहते हैं। खुद को ये घर का  सदस्य मानते हैं। भीतर बाहर के हर रहस्य जानते हैं।। एक रात उनके बीच था संवाद। चोरों को लाख - लाख धन्यवाद वर्ना घर के लोग हमारी एक भी चलने नहीं देते। हम रात को आपस में मिल तो जाते हैं, हमें ये मिलने भी नहीं देते। घर की चौखट के साथ हम जुड़े हैं, अगर जुड़े जड़े नहीं होते तो किसी दिन तेज आंधी -तूफान आता, तो तुम कहीं पड़ी होतीं, हम कहीं और पड़े होते।। चौखट से जो भी  एक बार उखड़ा है। वो वापस कभी भी नहीं जुड़ा है। इस घर में ये जो झरोखे , और खिड़कियाँ हैं। यह सब हमारे लड़के और लड़कियाँ हैं।। तब ही तो इन्हें बिल्कुल खुला छोड़ देते हैं। पूरे घर में जीवन रचा बसा रहे, इसलिये ये आती जाती हवा को, खेल ही खेल में ,घर की तरफ मोड़ देते हैं। हम घर की  सच्चाई छिपाते हैं। घर की शोभा को बढ़ाते हैं ।   भले कुछ भी खास नहीं ,  पर उससे ज़्यादा बतलाते हैं। इसीलिये घर ...

अगर_भारत_की_सारी_अद्भुत_जगहों_के_बारे_में_लिखूं_तो कविता_नहीं_किताब_बन_जाये ?

सुनो.... मैं कहाँ करूँगी तुमसे uk लंदन जाने की ज़िद मुझे पसंद ही नहीं है दूसरा देश... हम ना बनारस चलेंगे.... घाटों की ढ़लती शामों में.... दोनो पैरों को पानी में डालके.... हम बातें करेंगे ढेर सारी.... और वो जो बिंदी खरीदी थी हमने उस मंदिर वाली दुकान से... मैं लगा के आऊँगी.... फिर दोनों करेंगे आरती .. गंगा मैया की.... हम ना वृन्दावन भी चलेंगे महसूस करेंगे वो ज़िन्दगी.... जो मेरे कान्हा ने राधे के साथ जी होगी.... तुम लगा देना उन फूलों को मेरे बिखरे हुवे बालों में... जो उस पावन धरती पे गिरे होंगे... हम बैठेंगे मधुवन में देखेंगे रास जियेंगे हर ख़्वाब जो कभी राधे ने कृष्ण को दिखाए होंगे और सुनो.... फिर चलेंगे हम वहाँ जिसे ग़ुलाबी शहर कहते हैं अपने प्रीत का रंग भी तो गुलाबी ही है ना मैं क्यूँ कहूँगी तुमसे 5 सितारा होटल की ख़्वाहिश.... हम सड़क के किनारे ढाबे पे बाटी चोखा खाएंगे.... कैपचिनो और जाने क्या क्या पीते हैं लोग हम तुम्हारे साथ टपरी वाली चाय पिया करेंगे हमारे ख़्वाब महंगे नहीं अजीब है हम भारत के हैं.... यहीं की खूबसूरती को निहारते रह जाएंगे❤️❤️❤️ ...

अर्ध रात्रि का ज्ञान

सोचा है कभी आपने ’’अरे! क्या हुआ कल तक तो भले चंगे थे, और आज हार्ट अटैक!’’ मैंने आश्चर्य ये पूछा। ’’दो नंबर का माल भरा पड़ा है पर कहीं लगा नहीं पा रहे हैं, इसलिए बहुत दिनों से टेंशन में चल रहे थे।’’ समीर ने हंसकर कहा। तो मैं आश्चर्य में डूबा रहा क्योंकि मुझे ये समझ ही नहीं आ रहा था कि इतना कितना माल था जो कहीं इनवेस्ट नहीं कर पा रहे हैं। आखिर मैंने पूछ ही लिया। ’’यार! कितना पैसा होगा जो इनवेस्ट नहीं कर पा रहा है ?’’ ’’तुम और हम कल्पना नहीं कर सकते, इतना पैसा है। तनखा लगभग पचास हजार, चाय नाश्ता पानी पेट्रोल, दारू मुफ्त में। इसके बाद कमीशन पांच परसेंट।’’ समीर आंखें बड़ी करके बोला। ’’तो?’’ मेरे मुंह से कोई आश्चर्य प्रगट नहीं हो रहा था। समीर मुझे घूर कर देखता हुआ पूछा। ’’अच्छा! तुम ही बताओं वो सब इंजीनियर कितना कमाता होगा दो नंबर का ?’’ मैं एक पल को सोचा और बोला-’’बीस-तीस-पचास हजार रूपया महीना।’’ मेरी इस बात पर समीर हंस पड़ा और बोला-’’बस यही कमी है हमारे देशवासियों की। वो अपनी कमाई से दूसरों की तुलना करते हैं। जबकि उनकी और देशवासियों की कमाई की कोई तुलना नहीं है।’’ ’’......’’ मैं ...

एक चर्चा हिन्दू संस्कृति की

सुहागन रहो, सौभाग्यवती भव आदि पति के ज़िंदा रहने का आशीष ख़ूब मिलते हैं महिलाओं को, पत्नी जिए-ऐसा कोई आशीष सुना आजतक? सवाल आलोचना का नही, सुधार का है. हम पहले भी बदलते रहे हैं, अब भी बदलें। हमारी संस्कृति एक विज्ञान है जिसमें श्रेष्ठतम को स्थान दिया जाता है। और श्रेष्ठतम भी कैसा ? ऐसा श्रेष्ठ जो किसी अन्य को नुकसान न पहुंचाये, सिर्फ और सिर्फ अपना ही काम करे। सर्वे भवन्तु मंगलम! हमारे कृत्य से जो उद्देश्य लिया है वो तो पूरा हो जाये और उसके साथ ही किसी अन्य का नुकसान न हो भले ही लाभ हो जाये। ग़ौर कीजिए न- पुरुषों को भी गाली अगर दी जाय तो वह महिलाओं की ही होती है. इसके उलट महिलाओं को भी आशीर्वाद दिया जाय तो वह पुरुषों के लिए ही होता है. क्या यह सही है? क्या इन छोटे-छोटे बदलावों पर हमें ध्यान नही देना होगा? बदलना नही चाहिए हमें? सच ही तो है ये बात! हमें अपने समाज में ऐसी विरोधाभासी चीजों को ढूंढ ढूंढ कर नष्ट किये जाने की आवश्यकता है। और भी बहुत सी बातें हैं जिनके विरोध की आवश्यकता है। यहां एक बात विचारणीय है कि आज हम बहुत सी बातों को जानने का दावा करते हैं, क्या हम आज अपनी पढ़ाई में प...