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Showing posts from 2022

समय का फेर

मंदिर में शादी हुई थी अनामिका और सुदर्शन की। ससुराल में तो कोहराम मच गया दोनों ने अपनी मर्जी से शादी कर ली है इसलिए। एक तो अपनी मर्जी की शादी और ऊपर से जात बिरादरी अलग। ससुराल में कदम रखते ही सास छाती पीट-पीटकर दहाड़ें मार कर रोने लगी "हाय रे मेरा भाग्य फूट गया। मेरे बेटे ने मेरे मर्जी के खिलाफ शादी कर ली। अब गांव में क्या मुंह दिखाऊंगी। इससे तो अच्छा है मर जाती। कोई रस्सी लेकर आओ मैं पेड़ से लटक जाऊंगी। यह जीवन समाप्त कर दूंगी। इस बहू के हाथ का पानी तक नहीं पियूंगी। जात बिरादरी में मुंह दिखाने के लायक नहीं रही।" एक तो नई नवेली दुल्हन ऊपर से उम्र मात्र 20 साल। वह टुकुर टुकुर देखने लगी। क्या करेगी कुछ समझ में नहीं आया तो शादीशुदा बड़ी ननद ने आकर कान के पास फुसफुसाई "जाकर माँ के पांव पकड़ लो। क्षमा मांग लो वरना तुम्हें घर में घुसने नहीं दिया जाएगा।" बहू क्या करती कुछ समझ में नहीं आया तो दौड़कर सासू माँ के पैर पकड़ ली और रो रो कर कहने लगी "मुझसे गलती हो गई माँ जी, मुझे माफ कर दीजिए। मुझे अपनी बहू स्वीकार कर लीजिए।" थोड़ी देर में सासु माँ का रोना कम हुआ। उसने ...

कठपुतली

   "भाभी! कहां हो? जल्दी से तैयार हो जाओ,मेरी सब फ्रेंड्स आपसे मिलने आ रही हैं,आपकी स्पेशल पाव भाजी भी बना देना।और हां वो ऑरेंज सूट बहुत अच्छा लगता है,वही पहनना प्लीज।" छोटी ननद का फरमान सुनते ही ऋतु ने फटाफट मूड और मुखौटा दोनों ही बदल लिए। आज ससुरजी के मॉर्निंग वॉक के संगी साथी आएंगे,गर्मागर्म कचौड़ी के साथ कोई ढंग की साड़ी पहनना है उसे। एक और मुखौटा..! मांजी के गुरुदेव वृंदावन जाने से पहले रास्ते में कुछ देर घर पर रुकेंगे,सभी को आशीर्वाद देने । खाने में मेवे की खीर के साथ फलाहारी सब्जी पूड़ी खायेंगे। गुरुजी का मान रखने के लिए कोई अच्छी कॉटन की साड़ी पूरी बांहों के ब्लाउज के साथ पहनने का आदेश मिला है। चुप रहने की ताकीद भी।सभी चीजों के साथ आदर्श नई बहु का मुखौटा भी ओढ़ लिया। पतिदेव के दोस्त के घर जाना है,कॉकटेल पार्टी में,पाश्चात्य परिधान के ऊपर साड़ी लपेट घर से निकली। अल्ट्रा मॉडर्न बीवी का मुखौटा रास्ते में चढ़ा लेगी। शादी के बाद पहली बार छोटा भाई उससे मिलने ससुराल आया,कुछ समझ ही नहीं पा रही है वो,क्या करे,क्या कहे? भाई भी असमंजस में है,मौका मिलते ही पूछा, " दीदी क्या ...

अनुभव

 आज एक ऐसा अनुभव हुआ जिसे मैं शायद ही कभी भूल सकूं.  मेरे मोबाइल का स्क्रीन गार्ड दरक गया था. उसे बदलवाने के लिए एक छोटी-सी थड़ी नुमा दुकान पर रुका. एक छोटी उम्र का लड़का वह दुकान चला रहा था. उसे मोबाइल दिखाया तो उसने कहा कि ऑरिजिनल, कम्पनी का स्क्रीन गार्ड एक सौ रुपये का होगा. मैंने उसे लगाने की स्वीकृति दे दी. वह किसी और के मोबाइल पर स्क्रीन गार्ड लगा रहा था. बहुत तसल्ली और सफाई से वह अपना काम कर रहा था. जैसे ग्राहक को निबटा कर पैसे जेब के हवाले करने की उसे कोई जल्दी ही न हो. मुझे समझ में आया कि उसके हाथ में जो मोबाइल था वह स्विगी के एक डिलीवरी बॉय का था. बॉय जल्दी कर रहा था, कि उसकी डिलीवरी लेट हो रही है, लेकिन मोबाइल वाला लड़का पूरे परफेक्शन के साथ अपना काम कर रहा था. काम पूरा हुआ, डिलीवरी बॉय ने उसे सौ का नोट दिया, मैंने चोर निगाहों से देखा कि मोबाइल वाले ने उसे बीस रुपये लौटाए हैं. डिलीवरी बॉय वहां से हट ही रहा था कि मैंने मोबाइल वाले लड़के से कहा कि तुमने इससे तो अस्सी रुपये लिए हैं, मुझसे सौ क्यों लोगे? यह बात जाते हुए डिलीवरी बॉय ने सुन ली. वह पलटा और मोबाइल वाले लड़के के ...

मनुष्य को अभी पशुओं से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।

गिद्ध की प्रजाति का एक पक्षी है, वह अंडे देने के लिए किसी ऊंचे पर्वत की चोटी पर चला जाता है। जोड़ा वहीं अंडे देता है, मादा अंडों को सेती है, और एक दिन बच्चे अंडा तोड़ कर बाहर निकलते हैं। उसके अगले दिन सारे बच्चे घोंसले से निकलते हैं और नीचे गिर पड़ते हैं। एक दिन के बच्चे हजारों फीट की ऊंचाई से गिरते हैं। नर-मादा इस समय सिवाय चुपचाप देखते रहने के और कुछ नहीं कर सकते, वे बस देखते रहते हैं। बच्चे पत्थरों से टकराते हुए गिरते हैं। कुछ ऊपर ही टकरा कर मर जाते हैं, कुछ नीचे गिर कर मर जाते हैं। उन्ही में से कुछ होते हैं जो एक दो बार टकराने के बाद पंखों पर जोर लगाते हैं और नीचे पहुँचने के पहले पंख फड़फड़ा कर स्वयं को रोक लेते हैं। बस वे ही बच जाते हैं। बचने वालों की संख्या दस में से अधिकतम दो ही होती है। अब आप उस पक्षी के जीवन का संघर्ष देखिये! जन्म लेने के बाद उनके दस में से आठ बच्चे उनके सामने दुर्घटना का शिकार हो कर मर जाते हैं, पर उनकी प्रजाति बीस प्रतिशत जीवन दर के बावजूद करोड़ों वर्षों से जी रही है। संघर्ष इसको कहते हैं। एक और मजेदार उदाहरण है। जंगल का राजा कहे जाने वाला शेर शिकार के लिए क...

संदेश देती कहानी

  पवन काफी देर से नोएडा, गौर सिटी चौक पर खड़ा हुआ किसी ऑटो के इंतजार में था, जो भी ऑटो आ रहे थे वह पहले से भरे होने के कारण ड्राइवर के साथ आगे बैठने को कह रहे थे, वह सोच रहा था ऐसा ऑटो दिखे जो खाली हो, ताकि पीछे की सीट पर आराम से बैठ सके व उसका सफर एक हाथ से ऑटो पकड़कर व दूसरा हाथ लटकाकर बैठने में न गुजरे, कुछ देर बाद एक ऑटो दिखाई दिया, ऑटो के धीमे होते ही पवन ने पूछा  "मेट्रो सेक्टर 52 चलोगे क्या ?" "बाबन सेक्टर? जी साहब चलिए," ऑटो वाले ने रिप्लाई किया "कितना रुपया ?" पवन ने यह सोच कर पूछा कि पूरा खाली है तो ज्यादा न मांग ले  30/ -, यह सुनकर वह बैठ गया,और जेब से मोबाइल हाथ में निकालकर चलाने लगा, जैसे ही ऑटो थोड़ा आगे बढ़ा, तो एक बुजुर्ग महिला ने, जो दो बच्चों के साथ थी, रुकने का इशारा किया और पूछा "सिटी सेंटर चलोगे क्या?" ऑटो वाले ने पीछे सीट की तरफ इशारा किया और कहा " जल्दी बैठो" "कितने रुपए लोगे?" बच्चों को पहले बिठालते हुए उस महिला ने पूछा  "30 रुपए सवारी" ऑटो वाले ने जल्दी से जवाब दिया  "अरे नहीं! पागल ...

एक तिलस्मी सपना महिला का

 . . धनपत राय 'प्रेमचन्द', जयशंकर प्रसाद, पन्त, महादेवी वर्मा,निराला, अमृतलाल नागर,बाबा नागार्जुन, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, प्रभाकर श्रोत्रिय, कल इन‌ साहित्य-रत्नों से सपने में रोचक आत्मीय संवाद हुआ । मैंने विनम्रता से कहा : एक जिज्ञासा भरा प्रश्न आप सबसे मुख़ातिब है__ "आप सब में से किसी ने कभी   कोई साहित्योत्सव आयोजित किए, उनमें भागीदारी की ?अपने ऑडियो- वीडियो बनवाए ?" यह सुनते ही, कुछ ने व्यंग्य से तिर्यक मुस्कान के साथ, बाबू जी अमृतलाल नागर एवं बाबा नागार्जुन ने ज़ोरदार ठहाके के साथ ‌और निराला जी ने बड़ी-बड़ी ऑंखों से तरेरते हुए  कहा___    "नहीं, पगली, नहीं" मैंने अचरज भरे सुर में कहा___ " फिर भी आप का साहित्य, आपकी शोहरत, आपके चर्चो की आज तक धूम कैसे है । देश में ही नहीं, सीमा पार भी, अनेक देशों में आप पर साहित्यिक अध्ययन, कार्यशालाऍं, संगोष्ठियाॅं, भाषण प्रतियोगिता, निबन्ध प्रतियोगिता, छोटे-बड़े संस्थानों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों आदि में बड़े सम्मान और उत्साह से आयोजित होती हैं । ऐसा ...

बहुमूल्य रत्न

बीस दिन के पश्चात अस्पताल से घर लौटी शैलजा, पर.. घर लौट कर भी तो वह बिस्तर पर ही है। अचानक पैर फिसल जाने के कारण पांव की हड्डी टूट गई है। जब से वह बिस्तर पर है तब से उसकी 18 वर्षीय बेटी लेखा ने अपने कंधों पर सारी जिम्मेदारी ले रखी है। घर में खाना बनाना, फिर मां के लिए टिफिन भर के अस्पताल ले जाना, उन्हें खिलाना, बेड पैन देना, उनके शरीर को स्पंज करना, कपड़े बदलना सारी जिम्मेदारी लेखा ने बखूबी संभाल ली। एक नन्ही सी जान और काम हजार फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं। इतने सब कामों के बीच भी अपनी पढ़ाई जारी रखना कोई मामूली बात नहीं है परंतु लेखा ने उसे भी बखूबी संभाल लिया है क्योंकि इस साल उसे इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जाम देना है।  शैलजा को चाहे कितनी ही तकलीफ हो वह अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेर कर अपनी बेटी से कहती "अब थोड़ा सा आराम कर लो बेटा! इतना काम करने के पश्चात फिर पढ़ाई के लिए बैठ गई हो। शरीर को भी थोड़ा सा आराम देना जरूरी है।" मां की तकलीफ को देखकर लेखा की आंखों में कई बार आंसू आ जाते परंतु मां के सामने वह अपने चेहरे पर दुख का भाव आने नहीं देती। वह जानती है कि "अगर मेरे चेहरे प...

स्वप्न

   विभीषण को लंका का राजपाठ सँभाले दो दिन हो गए थे , और वह लंका के बहुत से मानचित्र लेकर समुद्र के इस पार राम, सीता, लक्ष्मण से मिलने आए थे । राम , रावण की समृद्धि, तकनीकी प्रगति, विज्ञान, मनोरंजन के साधन, विचार आदि को समझना चाहते थे ।विभीषण उन्हें एक के बाद एक मानचित्र समझाते चले जा रहे थे । “ यह देखिये , यहाँ पूरी शोध की सुविधाएँ हैं, यहाँ दूर तलक मनोरंजन ग्रह है , यहाँ विभिन्न विचारों को पोषित करने वाले गुरूकुल है, सूचनाएँ विस्तृत थी, और प्रभावी थी । राम, सीता और लक्ष्मण इस नए ज्ञान से स्तब्ध थे । विभीषण के जाने के बाद,लक्ष्मण ने अपने विचारों से उभरते हुए कहा,  “ भईया, मुझे आश्चर्य है कि इतने शक्तिशाली साम्राज्य को हमने निर्धन , अशिक्षित, वानर सेना की सहायता से पराजित कैसे कर दिया?  यदि विभीषण ने हमें उसके भेद बता भी दिये थे , तो भी , यह कारण तो पर्याप्त नहीं हो सकता ।” “ मैं भी यही सोच रहा हूँ , “ राम ने कहा, “ उनके पास तो वायुयान थे और हमारे पास रथ भी नहीं थे , वे नित नए हथियार बना रहे थे, और हमारे पास वहीं प्राचीन हथियार थे , उनके पास प्रशिक्षित सेना थी , हमारे...

चीन

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चीन पर वे हथकंडे नहीं अपनाए जा सकते थे, जो भारत में काम आए। भारत में रह कर ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहाँ के भेद समझ लिए थे। जबकि चीन उनके लिए अनसुलझी पहेली थी।  भारत में उन्हें अलग-अलग रंगों के, आस्थाओं के, सामाजिक वर्गों, भाषाओं के, और अलग रियासतों के लोग मिले। उनमें फूट डालने के तरीके तो उन्हें मिल गए थे। उन्हें अपनी सहूलियत से जोड़ना कुछ पेचीदा काम था। दूसरी तरफ़, चीन की सरहदों को उन्होंने सिर्फ़ एक बंदरगाह पर आवा-जाही और कुछ संस्मरणों से जाना था। वहाँ के लोग उन्हें एक जैसे दिखते, एक जैसी भाषा बोलने-लिखने वाले और एक ही राजा के अधीन नज़र आते। उन्हें कैसे तोड़ा जाए? हालाँकि ब्रिटिशों को यह मालूम हुआ कि मंचू साम्राज्य में मंगोलों की भागेदारी घट रही है, और उत्तरी हान वंशजों की बढ़ रही है। तिब्बत भी चीन में शामिल तो था, मगर वे चीनी नहीं। कुछ ऐसा ही शिनजियांग प्रांत में भी था।  मकार्टनी ने चीन से लौटते हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा-  “चीन का साम्राज्य किसी दक़ियानूसी लेकिन एक ऊँचे दर्जे के जहाज की तरह है, जिसे उसके काबिल अधिकारियों ने डेढ़ सौ वर्षों से समंदर में टिकाए रखा है। वह जहा...

ब्रह्मास्त्र

  अभी हाल ही में एक केस के सिलसिले में पत्नी जी को मुंबई हाईकोर्ट जाना था और मेरा भी चर्चगेट (दक्षिण मुंबई) में कुछ काम था तो हम साथ ही हो लिये।    हमेशा की तरह हमने AC Local से सफर तय करने का फैसला किया। कार के बनिस्बत मुंबई की AC Local ने सफर को आसान और आराम दायक बना दिया है। कार ले जाओ तो ट्राफिक की कीचकीच बहुत रहती है। समय और ईंधन दोनो जाया होते है।         हमारी सामने वाली सीट पर एक शख्स बैठा था, उसकी पीठ हमारी तरफ थी। वह किसी युवती से विडियो कॉल पर बात कर रहा था। उस युवक की पीठ हमारी तरफ होने से उसके फोन की स्क्रीन पर उभर रहा चेहरा हम साफ देख पा रहे थे। युवती खूबसूरत थी,वे दोनो आपस में बडा हंस-हंस कर बातें कर रहे थे।  यह दृश्य देख कर मेरी पत्नी रेनू से मैने कहा,..." देखो ये पति-पत्नी एक दूसरे से कितना प्यार करते है! कब से कितनी सारी बातें कर रहे है।" रेनू ने मेरी तरफ देखा और बोली," ...ये उसकी पत्नी नही है,गर्ल फ्रेंड है। तभी ये दोनो इतना दांत दिखा रहे है।"  मैने पूछा तुम कैसे कह सकती हो कि.. "वह युवती उसकी पत्नी नही,प्रेमिका है?" र...

जनरेशन गैप

  कर्नाटक संपर्क क्रांति, लगभग अपने समय पर भोपाल स्टेशन पर पहुंची थी,रुकने का अनाउंसमेंट अंदर तक सुना जा सकता था, 3rd AC कोच B2 में 38 नंबर बर्थ सर्च करती हुई, लाइट जलाकर अपने सीट का नंबर खोजते हुए,एक युवती पहुंची,पहले मोबाइल के किसी एप से कन्फर्म किया फिर वहां लिखे हुए सीट पर कन्फर्म कर, युवती ने अपना बैग सीट के नीचे रखा और अपर बर्थ पर जा बैठी, रात के 10:30 का समय हुआ था तो अधिकतर लोग सो चुके थे या सोने की तैयारी में थे। स्टेशन पर यात्रियों के आने के कारण नींद खुलना स्वाभाविक ही है,लेकिन इसको लेकर आपत्ति दर्ज करा भी नहीं सकते क्योंकि यह एक सिस्टम का हिस्सा है और दूसरों को भी ट्रेन में आना ही है और किसी किसी को यात्रा पूरी कर उतरना ही है । आखिर उसने सीट पर बैठने के बाद कर्मचारी से प्राप्त कवर में से चादर निकाला उसे बिछा कर लेटने से पहले किसी को काल किया और धीमी आवाज में बात करने लगी, बीच बीच में मौसी- मौसी कर के संबोधित कर रही थी इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि शायद वह अपनी मौसी से बात कर रही थी उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा,"मौसी क्या हम अपनी जिन्दगी भी नहीं जी सकते?, मैं किसी ...

पुरानी रसीद

  नरोत्तम सेठ ने आज कहीं व्यस्त होने के कारण ईंट भट्टे पर फिर अपने बेटे को ही भेजा था ।  बेटे का मन क़भी भी भट्टा पर नही लगता , जिसके कारण वह अक्सर ग्राहकों से उलझ जाता था , जबकि नरोत्तम सेठ चाहते थे कि अब वह अपना अधिक से अधिक समय भट्टा पर दे जिससे वो अपने पुस्तैनी व्यवसाय में दक्ष हो सके। अभी उनका बेटा आकर अपने केबिन में बैठा ही था कि मुनीम आ गया-" भईया जी एक बुजुर्ग फटी-पुरानी पुर्जी लेकर आया है और दस हजार ईंट मांग रहा है।" "क्या मतलब..!" बेटे ने पूछा । "कह रहा है कि सन उन्नीस सौ अड़सठ में पन्द्रह रुपया हजार के भाव से उसने दस हजार ईंट का दाम एक सौ पचास रुपया जमा किए थे जो आज लेने आया है।" "दिमाग खराब है उसका । आज दस हजार ईंट की कीमत अस्सी हजार है, एक सौ पचास रुपये में कैसे दे देंगे , भगा दो उसको यहां से ....।" "पर बड़े बाबूजी के हाथ की दस्तख़त की हुई रसीद है उसके पास है।" "तो क्या हुआ...? तब क्यों नही ले गये थे । अब ,जब ईंट का मूल्य आठ हजार रुपये प्रति हजार है तब ये पन्द्रह रुपये के भाव से ले जाएंगे !" सेठ का लड़का अभी मुंशी ...

फ़र्ज

पिताजी के जाने के बाद आज पहली बार हम दोनों भाईयों में जम कर बहसबाजी हुई। फ़ोन पर ही उसे मैंने उसे खूब खरी-खरी सुना दी।  पुश्तैनी घर छोड़कर मैं कुछ किलोमीटर दूर इस सोसायटी में रहने आ गया था। उन तंग गलियों में रहना मुझे और मेरे बच्चों को कतई नहीं भाता था। हम दोनों मियां-बीबी की अच्छी खासी तनख्वाह के बूते हमने ये बढ़िया से फ्लैट ले लिया। सीधे-साधे से हमारे पिताजी ने कोई वसीयत तो की नहीं पर उस पुश्तैनी घर पर मेरा भी तो बराबर का हक बनता है। छोटा भाई मना नहीं करता, लिखा-पढ़ी को भी राजी है पर दिक्कत अब ये है कि वो मेरे वाले हिस्से में कोचिंग सेंटर खोलना चाह रहा है। उसकी टीचर की नौकरी सात महीने पहले छूट चुकी है। दो महीने पहले ही आस-पास कहीं किराये का कमरा लेकर कोचिंग सेंटर खोला है। फोन पर कह रहा था, "आपके वाले हिस्से में कोचिंग सेंटर खोल लूँ तो मेरा किराया बच जाएगा।"  अब भला ये क्या बात हुई। चीज मेरी बरतेगा वो। ऊपर से मेरी धर्मपत्नी भी उसी की बात को सही ठहराते हुए बोली, "खोलने दो ना उसे कोचिंग सेंटर, छोटा भाई है आपका। मुश्किल में है कुछ सहारा ही हो जायेगा। आखिर बड़े भाई हो कुछ तो फ़र्...

ऊँगली

 आज किचन में काम करते हुए, ऊँगली कट गयी, पतिदेव वंही थे सो देख लिया, बोले ध्यान रखना चाहिये ऐसे कैसे काम करती हो, सासु माँ बोली, कि ध्यान कहीं ओर होगा ओर आँखे कहीं ओर, ससुर जी तो बस मुँह सिकोड़ कर रह गये ? ओर बात आयी गयी हो गयी, खुद ही enticeptic लगाया फिर घर के सारे काम किये, दवाई लगाते हुए ध्यान आया, कि यदि यही मायके में हुआ होता तो, मेरी माँ दौड़ते हुए आती ओर सबसे पहले हाथ पकड कर कहती, हाय राम कितना खुन निकल रहा है, ये लड़की कभी सुनती नही है, करते हुए चोट को हल्दी लगाती, पापा तो मम्मी को ही डांट लगाते कहते, इतना ही नही, भुआ मामा -नानी दादी - अब शुरु हुआ हिदायतों का सिलसिला, पता नहीं ससुराल मे अकेले कैसे सब सम्भालेगी, अभी छोटी है, सीख जाएगी अभी से kitchen सौंप दिया है उसे, सबको फोन करके खबर दी जाती है कि गुड्डो का हाथ कट गया, सब खबर लेने घर आते है, कि हाय फूल सी बच्ची कुल मिलाकर चोट लगने का असली मज़ा भी मायके में ही आता है, जँहा आपकी परवाह कि जाती है, आपकी चोट को पारिवारिक चोट घोषित करके, प्यार ओर अपनेपन का ऐसा मरहम लगाया जाता है, कि चोट लगवाने का बार बार दिल करता है,

आलू टमाटर की सब्ज़ी

आज बाबूजी की तेरहवीं है। नाते-रिश्तेदार इकट्ठे हो रहे हैं पर उनकी बातचीत, हँसी मज़ाक देख-सुनकर उसका मन उद्दिग्न हो रहा है.."कोई किसी के दुख में भी कैसे हँसी मज़ाक कर सकता है? पर किससे कहे,किसे मना करे" इसीलिये वह बाबूजी की तस्वीर के सामने जाकर आँख बंद करके चुपचाप बैठ गई। अभी बीस दिन पहले ही की तो बात है.. वह रक्षाबंधन पर मायके आई थी। तब बाबूजी कितने कमजोर लग रहे थे। सबके बीच होने के बावजूद उसे लगा कि जैसे वह कुछ कहना चाहते हों फिर मौका मिलते ही फुसफुसा कर धीरे से बोले भी थे .."बिट्टू... रमा(भाभी) हमको भूखा मार देगी। आधा पेट ही खाना देती है, दोबारा माँगने पर कहती है कि परेशान ना करो ,जितना देते हैं उतना ही खा लिया करो। ज़्यादा खाओगे तो नुकसान करेगा फिर परेशान हम लोगों को करोगे " कहते-कहते उनका गला भर आया।  " पर कभी आपने बताया क्यों नही बाबूजी?" सुनकर सन्न रह गई वह और तुरंत अपने साथ लाई मिठाई से चार पीस बर्फी निकाल कर बाबूजी को दे दिया। वह लगभग झपट पड़े..और जल्दी-जल्दी खाने लगे.. ऐसा लग रहा था मानों बरसों से उन्होंने कुछ खाया ही ना हो। "अरे,अरे,,,,इतना मत...

समाज के साथ मेलजोल क्यो जरूरी है

 सेवानिवृत्त बड़े अधिकारी को अपने कार्यालय जाने की जिज्ञासा हुई। वह अपने मन में बड़े-बड़े सपने लेकर जैसे कि :- मैं जब कार्यालय पहुंचूँगा तो सभी अधिकारी एवं कर्मचारी मेरा बढ़-चढ़कर स्वागत करेंगे तत्काल अच्छा नाश्ता मंगाया जाएगा आदि आदि। ऐसा सोचते सोचते वह अपने वाहन से कार्यालय जा रहा था। जैसे ही दरवाजे पर पहुंचा तो पहरेदार ने रोका और कहा कि "आप अंदर जाने से पहले गाड़ी बाहर ही एक तरफ लगा दें"। इस पर अधिकारी भौचक्का रह गया, और कहा कि "अरे! तुम जानते नहीं हो, मैं यहां का मुख्य अधिकारी रहा हूं। गत वर्ष ही सेवानिवृत्त हुआ हूं"। इस पर पहरेदार बोला- "तब थे, अब नहीं हो। गाड़ी दरवाजे के अंदर नहीं जाएगी"। अधिकारी बहुत नाराज हुआ और वहां के अधिकारी को फोन कर दरवाजे पर बुलाया। अधिकारी दरवाजे पर आया और सेवानिवृत्त मुख्य अधिकारी को अंदर ले गया।गाड़ी भी अंदर करवाई और अपने चेंबर में जाते ही वह चेयर पर बैठ गया और चपरासी से कहा- "साहब को जो भी कार्य हो, संबंधित कर्मचारी के पास ले जाकर बता दो"। चपरासी साहब को ले गया और संबंधित कर्मचारी के काउंटर पर छोड़ आया। मुख्य अ...

रौनक

   पूरे परिवार को एकसूत्र में पिरोकर रखने वाली , सबकी चिंता और परवाह करने में मगन खुद के प्रति बेपरवाह रहने वाली , गाहे-बगाहे हमारी गल्तियों पर अपनी खट्टी-मीठी झिड़कियों से नसीहत देने वाली, चाँद और परियों की कहानियां सुनाकर हमें प्रेरणा देने वाली, मीठी लोरी गुनगुनाकर हमें सपनों की रंग-बिरंगी दुनिया में सुख की नींद सुलाने वाली ,सादा खाने में भी अपने हाथों के जादू से स्वाद का तड़का लगाने वाली, रसोई-चौके में कुछ सामान न होते हुए भी, बढिया पकवान झट से बना डालने वाली , अपने हाथों के स्पर्श से पुराने सामान को एकदम नया सा रूप देने वाली, आर्थिक संकट से जूझते परिवार पर अपने पास सहेज कर रखी गई पूंजी न्यौछावर कर देने वाली , हर अपने-पराए को हंस कर गले लगाने वाली दादी-नानी मां , हर घर-परिवार की रौनक होती हैं ! लेकिन न जाने क्यों आजकल परिवार की यही रौनक अब परिवारों से दूर होकर एकाकी जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं और बच्चे इनके अस्तित्व से अंजान एक अलग ही दुनिया में पल-बढ़ रहे हैं जहां मानवीय मूल्य और संवेदनाएं लगभग लुप्त हो चुकी हैं ! कारण , एकल परिवारों का चलन और रिश्तों से अधिक पैसों को...

चिडि़यों की टोली

  चिडि़यों की टोली उतरती है दोपहर में दो बजे। स्कूल बस ग्लोरी अपार्टमेंट्स के सामने रुकती है। सबसे पहले रजत की आवाज गूंजती है, ‘‘दादी, हम आ गए।’’ हम यानी ग्लोरी अपार्टमेंट्स के फ्लैटों में रहने वाले बच्चे भले ही अलग-अलग हैं, पर दादी सबकी एक हैं। उन्होंने ही बच्चों को नाम दिया है-चिडि़यों की टोली। दादी यानी उमा देवी हंसती हुई सबको एक-एक थैली पकड़ाती हैं। ‘‘आज मैंने तुम्हारी मनपसंद मिठाई बनाई है। शाम को आना नई कहानी सुनाएंगे तुम्हारे बाबा।“ बच्चों के बाबा हैं उमादेवी के पति अजयसिंह। वह भी एक तरफ खड़े हंस रहे हैं।उमादेवी और अजयसिंह एक फ्लैट में अकेले रहते हैं। उनके दो बेटे हैं-श्यामल और सुरेश। दोनों अपने-अपने परिवार के साथ अमरीका जाकर बस गए हैं। बीच में जब भारत आते हैं तो माता-पिता से एक बार जरूर कहते हैं-‘‘यहां क्या रखा है? अमरीका चलकर रहिए न।’’ दोनों चुप रहते हैं-यानी उत्तर साफ है कि उन्हें कहीं नहीं जाना। दादी और बाबा चिडि़यों की टोली को कैसे छोड़ें! उनका यह मौन उत्तर घर के नौकर बिलासी को भी अच्छा लगता है। आखिर वह कहां जाएगा उमादेवी और अजयसिंह के अमरीका जाने के बाद? एक दिन उमादेवी...

तुम जैसे हो वैसा ही सारा अस्तित्व हो जाता है

 बड़ी प्राचीन कथा है कि रामदास राम की कथा कह रहे हैं। कथा इतनी प्रीतिकर है, राम की कहानी इतनी प्रीतिकर है कि हनुमान भी सुनने आने लगे। हनुमान ने तो खुद ही आंखों से देखी थी सारी कहानी। लेकिन फिर भी कहते हैं, रामदास ने ऐसी कही कि हनुमान को भी आना पड़ा। खबर मिली तो वह सुनने आने लगे। बड़ी अदभुत थी। छिपे-छिपे भीड़ में बैठकर सुनते थे। पर एक दिन खड़े हो गए, खयाल ही न रहा कि छिपकर सुनना है, छिपकर ही आना है। क्योंकि रामदास कुछ बात कहे जो हनुमान को जंची नहीं, गलत थी, क्योंकि हनुमान मौजूद थे। और यह आदमी तो हजारों साल बाद कह रहा है। तो उन्होंने कहा कि देखो, इसको सुधार कर लो। रामदास ने कहा कि जब हनुमान लंका गए और अशोक वाटिका में गए, और उन्होंने सीता को वहा बंद देखा, तो वहा चारों तरफ सफेद फल खिले थे। हनुमान ने कहा, यह बात गलत है, तुम इसमें सुधार कर लो। फूल लाल थे, सफेद नहीं थे। रामदास ने कहा, तुम बैठो, बीच में बोलने की जरूरत नहीं है। तुम हो कौन? फूल सफेद थे। तब तो हनुमान को अपना रूप बताना पड़ा। हनुमान ही हैं! भूल ही गए सब। कहा कि मैं खुद हनुमान हूं। प्रगट हो गए। और कहा कि अब तो सुधार करोगे? तुम हजारों ...

ओशो

 तुर्गनेव की एक बड़ी प्रसिद्ध कथा है। एक गांव में एक महामूर्ख था, लोग उस पर बहुत हंसते थे। गांव का महामूर्ख, सारा गाव उस पर हंसता था। आखिर गांव में एक फकीर आया और उस महामूर्ख ने उस फकीर से कहा कि और सब पर तुम्हारी कृपा हौती है, मुझ पर भी करो, क्या जिंदगीभर मैं लोगों के हंसने का साधन ही बना रहूंगा? लोग मुझे महामूर्ख समझते हैं और मैं हूं नहीं। फकीर ने कहा, एक काम कर, जहां भी कोई किसी ऐसी चीज की बात कर रहा हो जिसको सिद्ध करना कठिन हो, तू विरोध में हो जाना। जैसे कोई कह रहा हो कि ईश्वर की कृपा, तू फौरन पकड़ लेना शब्द कि कहौ है ईश्वर, कैसा ईश्वर, सिद्ध करो! कोई कहता हो, चांद सुंदर है, फौरन पकड़ लेना, जबान पकड़ लेना कि क्या प्रमाण है? मैं कहता हूं, कहौ है सौंदर्य? कैसा सौंदर्य? कोई कहता हो, गुलाब का फूल सुंदर है कोई कहता हो, यह स्त्री जा रही है, देखो कितनी प्रसादपूर्ण है, कितनी सुंदर—पकड़ लेना जबान उसकी, छोड़ना मत। जहां भी सौंदर्य की, सत्य की, शिवम् की कोई चर्चा हो रही हो, तू पकड़ लेना। क्योंकि न सत्य सिद्ध होता, न सौंदर्य सिद्ध होता, न शिवम् सिद्ध होता, ये चीजें सिद्ध होती ही नहीं। इनके लिए कोई...

तुम्हारा एकांत ही तुम्हें मनुष्य बना सकता है, भीड़ तुम्हें भेड़ बना देगी

कुछ लोग हैं जिनका दर्द मैं अच्छी तरह से समझता हूँ.. उनकी उम्र डिग्रियां लेने में बीत गयीं. उनके फेसबुक के “क्वालिफिकेशन” कॉलम में “स्क्रॉल बार” आता है.. क्यूंकि डिग्रियां लिखने की जगह नहीं बची है वहां.. ऐसे लोगों के सामने आप परसेंटेज और ज़्यादा अंक पाने के “पागलपन” को आप ग़लत कह दें तो वो बड़े परेशान हो जाते हैं इस बात को आप भी समझिये.. ये वैसे ही है जैसे एक औरत “बहु” बनकर सारी उम्र अपनी सास के “ज़ुल्म” को सह चुकी है और उस से आप ये कह दें कि अपनी बहु को “नौकरानी” न समझो, तो वो अंदर ही अंदर आपको “गाली” देगी.. सारी उम्र उस औरत की प्रताड़ना कहाँ निकलेगी? और जिस पल का उसने दशकों इंतज़ार किया अब आप उसे वो पल “एन्जॉय” नहीं करने देंगे? यही परपीड़ा तो उस औरत का सुख है.. और उसे उस सुख से वंचित करोगे तो गाली ही खाओगे.. ऐसे ही दूसरे बच्चों की “परपीड़ा” इन ढेर सारी डिग्री धारियों का “सुख” होता है मेरे पास ऐसी ऐसे एम्प्लोई रह चुके हैं जो चार से पांच मास्टर डिग्री लिए थे, और मेरे यहाँ डिप्लोमा होल्डर के अंडर में काम कर रहे थे.. एक दो नहीं जाने कितने ऐसे आये और गए.. मैं जब इंटरव्यू लेता था तो कभी उनकी डिग्री...

अयोग्यता की आकांक्षा

लोक प्रशासन में पढ़ते हैं कि सभी सरकारी कार्यालयों पर पार्किंसन सिद्धांत लागू होता है, जिसका अर्थ यह है कि प्रत्येक अधिकारी व कर्मचारी अपना अधीनस्थ चाहता है व काम टालकर नीचे की ओर भेजता है और इस प्रकार नीचे का कर्मचारी कार्याधिक्य बताकर और नीचे कर्मचारी की नियुक्ति करना चाहता है व उससे काम लेकर खुद आराम करना चाहता है, इस प्रकार प्रत्येक कार्यालय में कर्मचारियों की संख्या बढ़ती जाती है,व एक ऐसा व्यक्ति हर जगह मिल जाता है जिसे कम वेतन व सबसे ज्यादा जिम्मेदारी मिलती है, कोई भी गलती होने के बाद उस साबसे नीचे वाले व्यक्ति पर ही कार्यवाही होती है,क्योंकि बार फ़ाइल या नोटशीट को शुरू करने वाला वही है । एक और सिद्धांत है जो यह कहता है कि हर व्यक्ति तब तक तरक्की करता है जब तक कि वह ऐसे पद पर न पहुंच जाए जिसके लिये वह अयोग्य हो,या जिसके लायक वह न हो, उदाहरण के लिए कोई क्लर्क कुछ वर्ष वाद उसी विभाग में छोटा अधिकारी बन जाता है,वह योग्य लिपिक था लेकिन  अधिकांश मामलों में अधिकारी के रूप में उसमें नियंत्रण क्षमता न होने के कारण वह अयोग्य सिद्ध होता है,वह अधिकारी बनने के बाद भी अपना कार्य छोड़कर बार बा...

बेटी या लक्ष्मी

  *हर लडकी के लिए प्रेरक कहानी...* *और लड़कों के लिए अनुकरणीय शिक्षा...,* कोई भी लडकी की सुदंरता उसके चेहरे से ज्यादा दिल की होती है। ...पति ने घर मेँ पैर रखा....‘अरी सुनती हो !' आवाज सुनते ही पत्नी हाथ मेँ पानी का गिलास लेकर बाहर आयी और बोली "अपनी बेटी का रिश्ता आया है, अच्छा भला इज्जतदार सुखी परिवार है, लडके का नाम युवराज है । बैँक मे काम करता है।  बस बेटी हाँ कह दे तो सगाई कर देते है." बेटी उनकी एकमात्र लडकी थी.. घर मेँ हमेशा आनंद का वातावरण रहता था । कभी कभार सिगरेट व पान मसाले के कारण उनकी पत्नी और बेटी के साथ कहा सुनी हो जाती लेकिन वो मजाक मेँ निकाल देते । बेटी खूब समझदार और संस्कारी थी । S.S.C पास करके टयूशन, सिलाई का काम करके पिता की मदद करने की कोशिश करती । अब तो बेटी ग्रेज्यूऐट हो गई थी और नौकरी भी करती थी लेकिन बाप उसकी पगार मेँ से एक रुपया भी नही लेते थे... और रोज कहते ‘बेटी यह पगार तेरे पास रख तेरे भविष्य मेँ तेरे काम आयेगी ।' दोनो घरो की सहमति से बेटी और युवराज की सगाई कर दी गई और शादी का मुहूर्त भी निकलवा दिया. अब शादी के 15 दिन और बाकी थे. बाप ने बेटी ...

जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए

 पत्नी ने कहा - आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना… पति- क्यों?? उसने कहा..- अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी… पति- क्यों?? पत्नी- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के यहाँ जा रही है, बोली थी… पति- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता… पत्नी- और हाँ!!! गणपति के लिए पाँच सौ रूपए दे दूँ उसे? त्यौहार का बोनस.. पति- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे… पत्नी- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से त्यौहार कैसे मनाएगी बेचारी!! पति- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हो… पत्नी- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ… खामख्वाहपाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के उन आठ टुकड़ों के पीछे… पति- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा छीनकर बाई की थाली में?? तीन दिन बाद… पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा... पति- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी? बाई- बहुत बढ़िया हुई साहब… दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का बोनस.. पति- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपन...

ईगो

... अभी एक साल भी नहीं हुआ था दोनों की शादी को कि दोनों में झगड़ा हो गया किसी बात पर ... जरा सी अनबन हुईं और दोनो के बीच बातचीत बंद हो गई ...वैसे दोनो बराबर पढ़ें - लिखे , दोनो अपनी नौकरी में व्यस्त तो दोनों का इगो भी बराबर ... वहीं पहले मैं क्यों बोलूं....मे कयो झुकूं.... तीन दिन हो गए थे पर दोनों के बीच बातचीत बिल्कुल बंद थी ... कल सुधा ने ब्रेकफास्ट में पोहे बनाये, पोहे में मिर्च बहुत ज्यादा हो गई सुध ने चखा नही तो उसे पता भी नहीं चला...और मोहन ने भी नाराजगी की वजह से बिना कुछ कहे पूरा नाश्ता किया पर एक शब्द नही बोला, लेकिन अधिक तीखे की वजह से सर्दी में भी वह पसीने से भीग गया बाद मे जब सुधा ने ब्रेकफास्ट किया तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ.... एक बार उसे लगा कि वह मोहन से सॉरी बोलना चाहिए.. लेकिन फिर उसे अपनी फ्रैंड की सीख याद आ गई कि अगर तुम पहले झुकी तो फिर हमेशा तुम्हें ही झुकना पड़ेगा और वह चुप रह गई हालांकि उसे अंदर ही अंदर अपराध बोध हो रहा था अगले दिन सन्डे था तो मोहन की नींद देर से खुली घड़ी देखी तो नौ बज गए थे , उसने सुधा की साइड देखा, वह अभी तक सो रही थी , वह तो रोज जल्दी ...

वान गाॅग

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 वान गाॅग सिरफिरा था। पता नहीं कैसा मस्तिष्क लेकर आया था दुनिया में। हर चीज को अलग नज़रिये से देखता और सुध-बुध खो बैठता था। जीवनभर उसकी किसी से नहीं बनी। आधि-व्याधि दोनों ने जकड़ रखा था। फटेहाली में कहीं पहुँचता तो लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते। किसी के साथ उसका सामंजस्य ही न बैठ पाया। उसकी अनुभूति और विक्षोभ विप्लव की तरह उसके पत्रों में उतरे हैं, जिसे उसने अपने भाई-बहन और मित्रों को लिखा था।  वह एक देश से दूसरे देशों के चक्कर लगाता रहा, मनोनुकूल रोजगार तलाशता और छोड़ता रहा। लेकिन प्रेतबाधा की तरह पीछा करते दर्द और पेचिश ने आख़िरी सांस तक उसका साथ न छोड़ा। यही उसके सच्चे सहचर थे। हर वक़्त अँतड़ियां चीस मारकर उसे बेकल करती रहतीं। मेरूदंड से उठता वर्तुल दर्द जब रेंगते हुये उसके मस्तिष्क तक पहुँचता तो और भी प्रभंजन पैदा कर देता था। कम उम्र में ही थक गया था वान गाॅग ! उसके लिए कायनात की कोई रेमेडी कारगर न थी। फिर धीरे-धीरे शायद उसे नियति का विधान समझ में आया। उसे लगा, इससे आगे राह नहीं। अब क्या करता, उसने अपनी पीड़ा को फ़ैंटेसी में उतारना शुरू कर दिया। दर्द अपने शुरूआती दौर में मटमैल...

पति-पत्नी के सम्बंधों पर आधारित|

शादी की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर पति-पत्नी साथ में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे। संसार की दृष्टि में वो एक आदर्श युगल था। प्रेम भी बहुत था दोनों में लेकिन कुछ समय से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि संबंधों पर समय की धूल जम रही है। शिकायतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं। बातें करते-करते अचानक पत्नी ने एक प्रस्ताव रखा कि मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना होता है लेकिन हमारे पास समय ही नहीं होता एक-दूसरे के लिए। इसलिए मैं दो डायरियाँ ले आती हूँ और हमारी जो भी शिकायत हो हम पूरा साल अपनी-अपनी डायरी में लिखेंगे। अगले साल इसी दिन हम एक-दूसरे की डायरी पढ़ेंगे ताकि हमें पता चल सके कि हममें कौन सी कमियां हैं जिससे कि उसका पुनरावर्तन ना हो सके। पति भी सहमत हो गया कि विचार तो अच्छा है। डायरियाँ आ गईं और देखते ही देखते साल बीत गया। अगले साल फिर विवाह की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर दोनों साथ बैठे। एक-दूसरे की डायरियाँ लीं। पहले आप, पहले आप की मनुहार हुई। आखिर में महिला प्रथम की परिपाटी के आधार पर पत्नी की लिखी डायरी पति ने पढ़नी शुरू की। पहला पन्ना...... दूसरा पन्ना........ तीसरा पन्ना ..... आज शादी की वर्षगांठ पर मुझे ...

मीनू

  दस साल की मीनू के कमरे में जब माँ आई तो उन्होंने देखा, मीनू सो गई है, उसका लैपटॉप अभी भी खुला था , बंद करने गई तो उनकी नज़र शीर्षक पर चली गई, लिखा था, ‘ दादाजी का स्कूल’ , वह हैरान हो उसे पढ़ने लगीं । उसे लेख कहूँ या कहानी, मुझे पता नहीं, पर वो कुछ इस प्रकार था ; दो महीने पूर्व मेरे क्लास के बच्चे रवांडा जा रहे थे, गुरीला देखने के लिए, और वहाँ से कांगो का रेनफ़ारेस्ट देखने का कार्यक्रम भी था, यह मेरा स्कूल के साथ पहला अंतरराष्ट्रीय ट्रिप होता, परंतु तभी भारत से दादाजी का फ़ोन आया कि दादी बहुत बीमार हैं । पापा ने अपनी सारी मीटिंग कैंसल कर दी, और मम्मी ने मिनटों में टिकटें बुक कर दीं , और मैं इथोपियन ए्अर लाईनस की जगह एमिरेट के जहाज़ में बैठ गई । दादा दादी पिछले साल पूरे तीन महीने हमारे साथ यहाँ बोस्टन में बिता कर गए थे । दादाजी हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज थे, और तीन साल से अपने गाँव के पुश्तैनी घर में रह रहे थे । हम जब तक घर पहुँचे दादी जा चुकीं थी, वे अंतिम दर्शन के लिए हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे । तब मैंने पहली बार मृतक शरीर देखा, और मुझे लगा, मृतक शरीर में भाव, बुध्दि , शक्ति, कुछ भ...

फिजूलखर्ची

  जलाने वाली गर्मियों में कपड़े के जूते पैर जला देते थे। पूरे दिन जूते पसीने से तरबतर हो जाते थे, श्याम लाल ने इस महीने पहली तारीख को ही मन बना लिया था, इस बार कैसे भी 700 रुपये बचाकर उनसे अच्छी सैंडिल ले लेगा ताकि सारे दिन पैर में पसीना न आये और हवा लगती रहे। उस दिन वो ऑफिस से निकला और मैंन मार्किट की और निकल गया, उसने मन बना लिया था कि बढ़िया क्वालिटी की सैंडिल ही लेगा, सोच रहा था बाटा या लिबर्टी की लेगा ताकि देखने में सुंदर भी लगें और पाँवों को आराम भी मिल जाये। कई साल चल भी जाएंगी वे। सामने एक जूते चप्पलों का बढ़िया शोरूम था, वो जल्दी से उस और बढ़ गया दो स्टेप चढ़कर शीशे का दरवाजा अंदर धकेलने वाला ही था कि उसका मोबाईल बज उठा, घर से फोन आया था उसने फोन रिसीव किया। बेटा था फोन पर,उसने कहा,"पापा, मुझे केमिस्ट्री की गाइड बुक चाहिए है आज ही चाहिए है आपको पता है न जुलाई में मेरा नीट का पेपर है।" सुनते ही श्याम लाल के पैर ठिठक गये, उसने कहा "हाँ बेटे आज ही ले आता हूँ।" वो शोरूम की सीढ़ियों से उतरा और सामने के बुक स्टोर की और बढ़ गया, उसने केमिस्ट्री की गाईड ले ली, जो 620 रुपय...

एक दिन सारे प्रेमी योगी हो जाएँगे और सारे योगी प्रेमी।”

 “…और फिर कथा सुनाने वाली बुढ़िया ने कहा, ‘‘देखना ! एक दिन सारे प्रेमी योगी हो जाएँगे और सारे योगी प्रेमी।” ॰॰ प्रियंवदा को बुद्ध से प्रेम हो गया था। भिक्षाटन के लिए आए बुद्ध के पात्र में हर दिन वह आँसू की दो बूँदें भर देती। गौतम आगे बढ़ जाते। तथागत की दृष्टि अपनी जगह थिर, प्रिया की अपनी जगह। न भगवन आँखें ऊपर करते, न प्रिया नज़रें फेरती। इस तरह दिन-महीने-साल बीतते रहे। प्रियवंदा ठहर गई थी समय के परे किसी बिंदु पर। धरती पर समय और मन नामक दो दैत्यों के बीच सदा से ही होड़ रही है। क्षत्राणी प्रियवंदा मन और समय दोनों को ही पराजित कर शक्ति के थिर सिंहासन पर आसीन हो चुकी थी। किंतु प्रेम के निहत्थे देवता ने सशस्त्र प्रियवंदा को हरा कर उसे अपने वश में कर लिया। खगोल-विज्ञान, दर्शन, संगीत, वेद-पुराणों की ज्ञाता विदुषी प्रियवंदा की बुद्धि का लोहा मानने वाले विद्वान भी उसकी थिर दृष्टि के रहस्य से अनभिज्ञ थे। उसका मौन प्रकृति ने अपनी संदूकची में सुरक्षित रखा लिया जिसके भेद तक पहुंचना सरल बात न थी। पत्थरों की जकड़ में रहने वाले ईश्वर से बेहतर कौन जानता है कि इस दुनिया में सर्वाधिक अनुवाद मौन का हुआ ह...

तरूणाई जाने के बाद

  अंजलि की दोपहर की मीठी सी झपकी फोन की घण्टी से टूट गई । अलसाते हुए उसने देखा तो शेखर ( उसका पति ) की कॉल थी ।  " हाँजी " " हाँ …..हैलो अंजलि " " जी बोलिए " " सुनो , तुम कपड़े पैक कर लो ,हमें कल सुबह निकलना है " शेखर बोले " निकलना है , पर कहाँ ? " " अरे यार ! वो कम्पनी वालों ने मुझे घूमने का पैकेज दिया है । " " हाँ तो आप जाइये न , जैसे हमेशा जाते हैं अपने कुलीग्स के साथ ….." " अरे नहीं यार …उसमें पति पत्नी दोनों का साथ जाना ज़रूरी है , तभी वो टूर मिलेगा वरना कैंसिल । हमें शिमला जाना है । " शेखर का उत्तर आया " शिमला ……" " हाँ … शिमला , चलो तुम तैयारी करो , मैं रखता हूँ …." अंजलि ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि दूसरी ओर से फोन कट गया ।  पर अंजलि के कानों में शेखर के वो शब्द गूँज रहे थे , शिमला ….शिमला  बचपन से तमन्ना थी उसकी शिमला घूमने की , फिल्मों में शिमला की हरी भरी वादियों को देखती तो उसका वहाँ जाने का मन करता । जब विवाह तय हुआ तो उसके मन में भावी पति संग शिमला की वादियों में ...