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Showing posts from 2020

My Favorite book list (Nonu)

  1) India After Gandhi – Ramchandra Guha 2) Indian Philosophy – Dr S. Radhakrishnan 3) A House for Mr. Vishwas – V.S. Naipaul 4) Oliver Twist – Charles Dickens   5) Hard Times – Charles Dickens 6) The Essays – Francis Bacon 7) Dreams from my Father – Barack Obama 8) War & Peace – Leo Tolstoy 9) The God of Small Things – Arundhati Roy 10) Gora – Rabindranath Tagore 11) Hot Days Long Nights – Nadezda Obradovic 12) The Wind from the Hills – Sethu 13) Reading Gandhi – Kusumlata Chaddha 14) The Argumentative Indian – Dr. Amartya Sen 15) Sherlock Holmes - Arthur Conan Doyle 16) India : An Introduction - Khushwant SIngh  17) Muhammad Ali- Graphic Novel (Campfire)  18) Jonathan Livingston Seagull - Richard Bach 19) William Shakespeare’s The Empire Striketh Back – Ian Doescher 20) Snow - Orhan Pamuk  21) Twenty Love Poems and a Song of Despair : Pablo Neruda  22) The Book Thief - Markus Zusak  23) 1984 - George Orwell ***************Hindi Literature*****...

क्रिसमस की रात और चार्ली चैपलिन की बात

चार्ली ने अपनी नृत्यांगना बेटी को एक मशहूर खत लिखा। कहा- मैं सत्ता के खिलाफ विदूषक रहा, तुम भी गरीबी जानो, मुफलिसी का कारण ढूंढो, इंसान बनो, इंसानों को समझो, जीवन में इंसानियत के लिए कुछ कर जाओ, खिलौने बनना मुझे पसंद नहीं बेटी। मैं सबको हंसा कर रोया हूं, तुम बस हंसते रहना। बूढ़े पिता ने प्रिय बेटी को और भी बहुत कुछ ऐसा लिखा। मेरी प्यारी बेटी, रात का समय है। क्रिसमस की रात। मेरे इस छोटे से घर की सभी निहत्थी लड़ाइयां सो चुकी हैं। तुम्हारे भाई-बहन भी नीद की गोद में हैं। तुम्हारी मां भी सो चुकी है। मैं अधजगा हूं, कमरे में धीमी सी रौशनी है। तुम मुझसे कितनी दूर हो पर यकीन मानो तुम्हारा चेहरा यदि किसी दिन मेरी आंखों के सामने न रहे, उस दिन मैं चाहूंगा कि मैं अंधा हो जाऊं। तुम्हारी फोटो वहां उस मेज पर है और यहां मेरे दिल में भी, पर तुम कहां हो? वहां सपने जैसे भव्य शहर पेरिस में! चैम्प्स एलिसस के शानदार मंच पर नृत्य कर रही हो। इस रात के सन्नाटे में मैं तुम्हारे कदमों की आहट सुन सकता हूं। शरद ऋतु के आकाश में टिमटिमाते तारों की चमक मैं तुम्हारी आंखों में देख सकता हूं। ऐसा लावण्य और इतना सुन्दर नृत...

एक गहरी नदी

 गहरी नदी का बहाव शांत होता है। Indeed Deeper Rivers Flow in Majestic Silence!  करीब 30 वर्ष के अन्तराल के बाद होटल की लाबी मे मेरे एक पुराने मित्र के साथ मुलाकात हुई।  हमेशा से अति साधरण, शांत, शिष्ट, भद्र व विनयी वह मित्र अभी भी देखने मे ठीक वैसा ही दिख रहा था। उसका व्यवहार व आचरण पहले जैसा ही साधारण था। आपसी औपचारिक कुशलक्षेम पूछने के उपरांत मैने प्रस्ताव दिया की मै उसे घर तक अपने गाड़ी मे छोड़ सकता हूं। असल मे घर छोड़ने के बहाने मेरा आग्रह अपनी मर्सिडीज गाड़ी को उसे दिखाने हेतु ज्यादा था।पर उसने धन्यवाद कहकर कहा कि वह अपनी ही गाड़ी से घर जायेगा। पार्किंग लाट मे कुछ देर साथ चलने के बाद वह अपनी एक साधारण गाड़ी से लौट गया। अगले हप्ते मैने उसे अपने घर डिनर पर आमंत्रित किया। वह अपने परिवार के साथ मेरे घर आया। एक बहोत ही आडम्बरहीन मर्यादित परिवार, पर मुझे लगा एक खुशहाल परिवार है। मेरे मन के किसी कोने मे यह उत्कंठा थी कि डिनर के बहाने मै उसे अपने इतनी सुन्दर और आभिजात्यपूर्ण कीमती  व बहुत आरामदेह,  मँहगी और सुंदर विलास की वस्तुओं से भरा हुआ, कीमती साज सज्जा से सुसज...

For Nonu

“More than anything, Keep your humility. Keep your character. Never show off. Always be humble and always respect the elders. That is the thing that is going to take you far. And that is going to give you strength in your work”  Have faith in God, have a good Heart  with dignity, always use ur brain. 

Principle of LML (लोड मत लो) For Nonu

लहरों का आना-जाना स्वाभाविक है। इस बड़ी दुनिया में लहरें आती हैं जाती है, हर लहर आपको गीला करें, आपको सताए.. ऐसी इजाजत उन लहरों को न दें। मतलब हर बात का लोड मत लें।     हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाते हैं, मन-मसोस कर बैठ जाते हैं.. हम लोड कब लेते हैं.. कभी मन-पसन्द का खाना नहीं बना। कभी आपको किसी ने नमस्ते नहीं की। कभी किसी ने ज्यादा तेज बोल दिया। कभी किसी ने आपकी तारीफ नहीं की। कुछ नियम जोड़ दिए गए। कोई रिप्लाई नहीं मिला। फोन घर छुट गया। सोशल मीडिया पर लाइक्स नहीं मिले। देर से पहुंचने पर बॉस ने फटकार लगा दी। किसी की प्रतिक्षा के समय.. मौसम के बदलाव से.. किसी न फोन नहीं उठाया। और भी बहुत सी बातें हो सकती हैं.. जिनका आप लोड लेते हों.. उनकी सूची बनाए.. और खुद को बताए कि कौन-सी बात का लोड लेना है.. और किसका नहीं लेना है।        आप कोई झुई_मुई के पौधे नहीं हैं कि आपको किसी ने कुछ बोल दिया, कुछ कह दिया, कुछ कर दिया या कुछ नहीं किया तो आप सिकुड़ गए या फिर फूल गए। छोटी-छोटी बातों का लोड मत लीजिए। जो जीवन को प्रभावित करता हैं उन्हीं बातों का लोड ले, और जब वास्तवि...

दर्जी की तकदीर

      एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवों में घूम रहा था। घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया, उसने अपने मंत्री को कहा कि इस गांव में कौन सा दर्जी है, जो मेरे बटन को सिल सके !  उस गांव में सिर्फ एक ही दर्जी था, जो कपड़े सिलने का काम करता था। उसको राजा के सामने ले जाया गया । राजा ने कहा कि तुम मेरे कुर्ते का बटन सी सकते हो ?   दर्जी ने कहा यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है ! उसने मन्त्री से बटन ले लिया, धागे से उसने राजा के कुर्ते का बटन फौरन टांक दिया। क्योंकि बटन भी राजा का था, सिर्फ उसने अपना धागा प्रयोग किया था, राजा ने दर्जी से पूछा कि कितने पैसे दूं ?   उसने कहा :- "महाराज रहने दो, छोटा सा काम था !" उसने मन में सोचा कि बटन राजा के पास था, उसने तो सिर्फ धागा ही लगाया है !!  राजा ने फिर से दर्जी को कहा कि नहीं-नहीं, बोलो कितने दूं ?   दर्जी ने सोचा की दो रूपये मांग लेता हूँ। फिर मन में यही सोच आ गयी कि कहीं राजा यह न सोचे की बटन टांकने के मेरे से दो रुपये ले रहा है, तो गाँव वालों से कितना लेता होगा, क्योंकि ...

आत्मनिर्भरता

 🌹🌷 आज की कहानी🌹🌷 एक विद्वान किसी गाँव से गुजर रहा था,  उसे याद आया, उसके बचपन का मित्र इस गावँ में है, सोचा मिला जाए ।  मित्र के घर पहुचा, लेकिन देखा, मित्र गरीबी व दरिद्रता में रह रहा है, साथ मे दो नौजवान भाई भी है। बात करते करते शाम हो गयी, विद्वान ने देखा, मित्र के दोनों भाइयों ने घर के पीछे आंगन में फली के पेड़ से कुछ फलियां तोड़ी, और घर के बाहर बेचकर चंद पैसे कमाए और दाल आटा खरीद कर लाये। मात्रा कम थी, तीन भाई व विद्वान के लिए भोजन कम पड़ता,  एक ने उपवास का बहाना बनाया,  एक ने खराब पेट का।  केवल मित्र, विद्वान के साथ भोजन ग्रहण करने बैठा। रात हुई,  विद्वान उलझन में कि मित्र की दरिद्रता कैसे दूर की जाए?, नींद नही आई,  चुपके से उठा, एक कुल्हाड़ी ली और आंगन में जाकर फली का पेड़ काट डाला और रातों रात भाग गया। सुबह होते ही भीड़ जमा हुई, विद्वान की निंदा हरएक ने की, कि तीन भाइयों की रोजी रोटी का एकमात्र सहारा, विद्वान ने एक झटके में खत्म कर डाला, कैसा निर्दयी मित्र था?? तीनो भाइयों की आंखों में आंसू थे। 2-3 बरस बीत गए,  विद्वान को फिर उसी गांव ...

Nonu ke lessons which cannot taught by any book.

एक दिन एक कुम्हार  का गधा कुएँ में गिर गया ।वह गधा घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और कुम्हार  सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं। अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि गधा काफी बूढा हो चूका था,अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था;और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ। कुम्हार ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया। सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही गधे कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है, वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा । और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया। सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे। तभी कुम्हार ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया। अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह गधा एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था। वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था। जैसे-जैसे कुम्हार  तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल- हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और उस सीढी ऊपर चढ़ आता । जल्दी ही सबको आश्चर...

सब यहीं छूट जाता है।

 *रात मैं पत्नी के साथ होटल में रुका था। सुबह दस बजे मैं नाश्ता करने गया। क्योंकि नाश्ता का समय साढ़े दस बजे तक ही होता है, इसलिए होटल वालों ने बताया कि जिसे जो कुछ लेना है, वो साढ़े दस बजे तक ले ले। इसके बाद बुफे बंद कर दिया जाएगा।* *कोई भी आदमी नाश्ते  में क्या और कितना खा सकता है? पर क्योंकि नाश्ताबंदी का फरमान आ चुका था इसलिए मैंने देखा कि लोग फटाफट अपनी कुर्सी से उठे और कोई पूरी प्लेट फल भर कर ला रहा है, कोई चार छोले भटुरे का  ऑर्डर कर रहा है। कोई इडली, डोसा उठा लाया तो  एक आदमी दो-तीन गिलास जूस के उठा लाया। कोई बहुत से टोस्ट प्लेट में भर लाया और साथ में शहद, मक्खन और सरसो की सॉस भी।*  *मैं चुपचाप अपनी जगह पर बैठ कर ये सब देखता रहा ।* *एक-दो मांएं अपने बच्चों के मुंह में खाना ठूंस रही थीं। कह रही थीं कि फटाफट खा लो, अब ये रेस्त्रां बंद हो जाएगा।*   *जो लोग होटल में ठहरते हैं, आमतौर पर उनके लिए नाश्ता मुफ्त होता है।*  *मतलब होटल के किराए में सुबह का नाश्ता शामिल होता है।*  *मैंने बहुत बार बहुत से लोगों को देखा है कि वो कोशिश करते हैं कि सुबह द...

घर में छूटी औरतों

 बहु लिवाने गई बारात के पीछे  घर पर बची औरतों के जिम्मे  उतने ही काम होते हैं, जितने बारात की अगुवाई  मेहमानवाज़ी करते घरातियों के जिम्मे! बिखरे कंघों, सेफ्टीपिनों हेयरक्लिपों, दुपट्टों, चूड़ियों, बची पूड़ियों सूखती भाजी,  बूढ़ी अम्मा की नाराजी, हेयर ड्रायरों के प्लग सबके अधखुले बैगों  सूटकेसों को सहेजकर  गिनकर रखते कुल जमा नग, ढोलक, बतासे , देवघर में सजे  दई-पितरों की आन थापे - हत्थड़ी के  आगे जलते दीए, दरियों की झाड़ पुंछावट बहु के कमरे की साज सजावट उनींदे बैठकर गवते गीत ब्याहली की अगुवाई को याद कर गिनती भूल-बिसरी रसम-रीत आरते के थाल की रोली मीठे चावल को पकती मेवों की सौंधी बघारी  बड़बूढ़न के सोने को ढूंढकर बिछते गद्दे भंडारे में सहेजकर रखते  भाजी-परोसे के डिब्बे, मेहमान विदाई को गिनकर भरते लिफाफे , साड़ी-जोड़े संग गोले रुमाल और साफे , इन सबके बीच  घर पर बची औरतें  इस धर-उठाई में बन जाती हैं  वे बैकस्टेज पर्फार्मिंग आर्टिस्ट्स  जिनकी पर्फार्मेंस शादी की  एलबम की तस्वीरों और वीडियो फिल्म में  कवर होने ...

लौट आया नरेन

 आज  तक तो कभी उसके साथ ऐसा नहीं हुआ था। लेकिन आज उसके साथ यह क्या हो रहा है, वह समझ ही नहीं पा रहा। कभी भावना गीत बन जाती है, तो कभी गीत भावना में बह जाता है। वह अपने आप को पर्वत की सूखी चोटी समझता रहा है, फिर आज वह हिमाच्छादित शिखर कैसे बनता जा रहा है? अभी-अभी पापा का फोन आया था। हालांकि उन्होंने शब्दों में तो कुछ नहीं कहा था, लेकिन उनके बार-बार रुंधते गले और रह-रह कर नाक सुड़कने की आवाज ने बहुत कुछ कह दिया था। उसे काफ़ी वर्ष पहले पढ़ी पापा की एक लघुकथा 'लौट आओ नरेन' याद आ रही थी। लघुकथा का नायक नरेन बिल्कुल उसी की तरह एमबीबीएस करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चला जाता है और फिर वहीं का होकर रह जाता है। कथा-नायक का पिता उसे बहुत समझाता है- 'मेरे और अपनी मम्मी के लिए नहीं, तो अपनी मातृभूमि के लिए ही आ जाओ बेटा! उसका कर्ज तो तुम हजारों जन्म निछावर करके भी नहीं उतार सकते। अमेरिका के लोग तो बहुत धनी हैं, लेकिन तुम्हारे देश के गरीब मरीज़ तो तुम्हारे पास ईलाज के लिए नहीं आ पायेंगे ना! फिर उन्हें तुम्हारी उच्च शिक्षा और प्रतिभा का क्या फायदा हुआ?' आदि-आदि। लेकिन कथा-ना...

मेरे जाने के बाद

  मेरे जाने के बाद कहीं कोई उदास नहीं होगा  सिवाय ख़ुद मेरे जैसे किसी के आने जाने को लेते हैं वैसे ही मेरे जाने को लेंगे सब लोग ख़ुद मुझे भी इसी तरह लेना चाहिए अपने जाने को  सब मुझे विदा करेंगे गर्मजोशी से और लग जाएंगे अपने अपने कामों में मैं सुबह-सुबह जागते ही जिस पेड़ को  देखता था खिड़की खोलकर  वह पेड़ मुझे याद नहीं करेगा  जिस पानी से अपनी प्यास बुझाता था  जिस पानी से मल-मल कर खूब नहाता था मैं वह पानी नहीं याद करेगा जो हवा दिन-रात मेरी सांसों को चलना सिखाती थी वो हवा नहीं याद करेगी मुझे मैं जिस घर को छोड़कर जाऊँगा  उस घर को भी नहीं याद आऊंगा मैं जबकि इस घर को कभी नहीं भूल पाऊँगा मैं इस घर में कई-कई रात मैं बेहद फूट-फूटकर फफक-फफककर रोया हूँ क्या कोई सुन पाएगा ? जो कोई आएगा इस घर में मेरी जगह क्या यह घर उसे बता पाएगा किसकी प्रतीक्षा रही दिन-रात इस घर में मुझे ? क्या इस घर की छत को याद आएँगी मेरी वो डबडब लाचार आँखें जो रात-भर ताकती थीं उसे एकटक अकारण इस घर की चौखट को क्या याद आएँगे मेरे वो पाँव जो हरदम थके-थके से लौटते थे क्या इस घर के दरवाजे को या...

पुरुष

 पुरुष का रोना  व्याकुल कर जाता है, उस आसमान को जिसने अपना दर्द हंसते हंसते  सौंप दिया था, एक दिन बारिश को ! पुरुष का रोना  हरबार ढूंढता है मां का आँचल, प्रेमिका का काजल, बहन का कांधा, अपने तकिए का कोना! पुरुष के रोते ही  पुरुष हो जाती है  वह स्त्री जो पोंछती है उसके आँसूं , और मर जाता है  वह दर्द जो जीत कर  मुस्कुरा रहा था  उस पुरुष से ! पुरुष के रोने से टूट जाते हैं पितृसत्ता के पाषाण हृदय ताले  और खुल जाते हैं द्वार  उन अहसासों के जो उसे उसके भी  इंसान होने का अहसास दिलाते हैं ! पुरुष के रोते ही पृथ्वी आकाश से  अपनी गति, स्थिति और  कक्षा की मंत्रणा कर हिसाब लगाती है उस आँसू का जो गृहों की चाल के सारे गणित  बिगाड़ कर रख देता है

लड़के

 कुछ लड़के बड़े अच्छे लगते हैं जब मां से पूछते हैं , "आम का अचार है क्या ?" कुछ लड़के जब कभी किसी लड़की को  कनखियों से देखने पर पकड़े जाते हैं, तो शर्माकर, सकपकाकर , पकड़ने वाले से ही  पलटकर पूछते हैं "क्या हुआ ? कुछ भी तो नहीं !" कसम से , अच्छे लगते हैं ! अच्छे लगते हैं वे सारे लड़के, जो मंगलवार और शनिवार  मंदिर में प्रसाद चढ़ा, मन ही मन सबकी राजी-खुशी  मांगा करते हैं , और मीठी बूंदी और पेड़े घर -मुहल्ले में बिना नागा बाँटा करते हैं ! अच्छे लगते हैं वे सारे लड़के  जो चाकलेट, चिप्स के पैकेट खोलकर कर देते हैं सबसे पहले  अपनी माँ और बहन के आगे, और कहते हैं , "लो, आपका फेवरेट है न ये वाला !" कुछ लड़के सचमुच अच्छे लगते हैं जब, ऐमी.वाई.बंटाई के गानों से बेखबर , सुनते हैं किशोर कुमार और मोहम्मद रफी को, और गुनगुनाते हैं, कहीं दूर जब दिन ढल जाए ! वे सारे लड़के सच में बहुत अच्छे लगते हैं, जो अक्सर  गोलगप्पे वाले से कहते हैं , "भैया मुझे अबकी मीठा पानी वाला देना !" अच्छे लगते हैं ऐसे सारे लड़के , क्योंकि इनके व्यक्तित्व में कुछ न कुछ तो  ऐसा जरूर होता ...

मेरे बेटे

  कभी इतने ऊँचे मत होना कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ . न कभी इतने बुद्धिजीवी कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग . इतने इज़्ज़तदार भी न होना कि मुँह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो . न इतने तमीज़दार ही कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी . इतने सभ्य भी मत होना कि छत पर प्रेम करते कबूतरों का जोड़ा तुम्हें अश्लील लगने लगे और कंकड़ मारकर उड़ा दो उन्हें बच्चों के सामने से . न इतने सुथरे ही होना कि मेहनत से कमाए गए कॉलर का मैल छुपाते फिरो महफ़िल में . इतने धार्मिक मत होना कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ . न कभी इतने देशभक्त कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको . कभी इतने स्थायी मत होना कि कोई लड़खड़ाए तो अनजाने ही फूट पड़े हँसी . और न कभी इतने भरे-पूरे कि किसी का प्रेम में बिलखना और भूख से मर जाना लगने लगे गल्प। .

बेटियां

   घुंघराले बालों वाली सीधे, और सीधे बालों वाली  उन्हें घुंघराला करवाती हैं, लंबे बालों वाली ब्वायकट और ब्वायकट वाली  नकली चोटी लगाती है! ये लड़कियां भी न जाने  क्या ऊधम मचाती हैं ? साड़ी बाँधती हैं मम्मी की ,  ऊपर भाई की टीशर्ट  पहन इठलाती हैं, कभी हाई हील की सैंडिल  तो कभी स्पोर्टशूज़ पहन कदम बढ़ाती हैं, ये लड़कियां भी न जाने  क्या ऊधम मचाती हैं! लिपस्टिक लगाती हैं छिप छिप कर, कभी चश्मा पहन, हाथ नचाती हैं! कलाई पर घड़ी बांध, कभी हाथ में छड़ी ले टीचर बन जाती हैं ! ये लड़कियां भी न जाने क्या क्या ऊधम मचाती हैं! घर-घर में कभी पापा बन, अखबार के पन्ने उलटाती हैं! और कभी अम्मा बन  सब पर हुकुम चलाती हैं! गुड्डे-गुड़िया की शादी कर मुहल्ले में बताशे  बंटवाती है! ये लड़कियां भी न जाने  क्या क्या ऊधम मचाती हैं! चाकलेट, टाफी हुए पुराने अब खुद ही ओरियो शेक बनाती हैं! घर में तितली बन कर उड़ती, एक दिन चिड़िया बन उड़ जाती हैं ! याद आती है बस तब इनकी बेटियां घर क्यों छोड़ जाती हैं ?

एक प्रेरक भावपूर्ण संस्मरण

  मन तो कानपुर में बसने का बनाया था किन्तु नियति लखनऊ खींच लायी। सन् 1980 में सपरिवार जाकर बस गया। उस क्षेत्र में मेरे आवास बनाने के पूर्व मात्र चार आवास ही बने थे। अत: अपने आवास से जब कभी बाहर निकलता तो सर्वत्र सन्नाटा ही सन्नाटा। किन्तु हाँ! चूँकि मेरे आवासीय क्षेत्र से सटा हुआ गाँव फतेहपुर था अत: लगता था कि पड़ोस में कुछ घर बसे हैं। ख़ैर! ये सब विवरण तो संस्मरण की मुख्य सामग्री से हटकर है। मेरे संस्मरण का मुख्य केन्द्र तो एक अख़बार वाला है जो इस विरल बस्ती में भी मात्र मुझको अख़बार देने के लिए प्रात: 4:30 बजे के लगभग आ जाता था। प्रात:काल जिस समय वह अख़बार देने आता था उस समय मैं उसको अपने मकान की 'गैलरी' में टहलता हुआ मिल जाता था। अत: वह मेरे आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए मेरे आवास में अख़बार फेंकता और मुझको *'नमस्ते बाबू जी'* वाक्य से अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था।  क्रमश: समय बीतने के साथ मेरे सोकर उठने का समय बदल कर प्रात: 5:0 बजे हो गया। जब कई दिनों तक मैं उसको प्रात: टहलते नहीं दिखा तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:0 बजे वह मेर...

सबसे अनमोल

  अशोक जी अपनी पत्नी के  साथ अपनी रिटायर्ड जिंदगी बहुत हँसी खुशी गुजा़र रहे थे...उनके तीनों बेटे अलग अलग शहरों में अपने अपने परिवारों के साथ थे...उन्होनें नियम बना रखा था....दीपावली पर तीनों बेटे सपरिवार उनके पास आते थे...वो एक सप्ताह कैसे मस्ती में बीत जाता था...कुछ पता ही नही चलता था। कैसे क्या हुआ...उनकी खुशियों को जैसे नज़र ही लग गई... अचानक शीला जी को दिल का दौरा पड़ा ...एक झटके में उनकी सारी खुशियाँ बिखर गईं। तीनों बेटे दुखद समाचार पाकर दौड़े आए...उनके सब क्रिया कर्म के बाद सब शाम को एकत्रित हो गए...बड़ी बहू ने बात उठाई,"बाबूजी, अब आप यहाँ अकेले कैसे रह पाऐंगे... आप हमारे साथ चलिऐ।" "नही बहू, अभी यही रहने दो...यहाँ अपनापन लगता है... बच्चों की गृहस्थी में...।" कहते कहते वो चुप से हो गए... बड़ा पोता कुछ बोलने को हुआ...उन्होंने हाथ के इशारे से उसे चुप कर दिया... "बच्चों, अब तुम लोगों की माँ हम सबको छोड़ कर जा चुकी हैं... उनकी कुछ चीजें हैं... वो तुम लोग आपस  में बांट लो...हमसे अब उनकी साजसम्हाल नही हो पाऐगी।" कहते हुए अल्मारी से कुछ निकाल कर लाए....मखमल के थै...

ज़िन्दगी की शाम ढलने को है

किसी बात पर पत्नी से चिकचिक हो गई, वह बड़बड़ाते घर से बाहर निकला, सोचा कभी इस लड़ाकू औरत से बात नहीं करूँगा, पता नहीं समझती क्या है खुद को? जब देखो झगड़ा, सुकून से रहने नहीं देती। नजदीक के चाय के स्टॉल पर पहुँच कर चाय ऑर्डर की और सामने रखे स्टूल पर बैठ गया.  आवाज सुनाई दी - *"इतनी सर्दी में बाहर चाय पी रहे हो?"* उसने गर्दन घुमा कर देखा तो साथ के स्टूल पर बैठे बुजुर्ग उससे मुख़ातिब थे.  *"आप भी तो इतनी सर्दी और इस उम्र में बाहर हैं."* बुजुर्ग ने मुस्कुरा कर कहा *"मैं निपट अकेला, न कोई गृहस्थी, न साथी, तुम तो शादीशुदा लगते हो."*  *"पत्नी घर में जीने नहीं देती, हर समय चिकचिक,बाहर न भटकूँ तो क्या करूँ?"* गर्म चाय के घूँट अंदर जाते ही दिल की कड़वाहट निकल पड़ी. बुजुर्ग-: *"पत्नी जीने नहीं देती?"* *"बरखुरदार ज़िन्दगी ही पत्नी से होती है. आठ बरस हो गए हमारी पत्नी को गए हुए, जब ज़िंदा थी, कभी कद्र नहीं की, आज कम्बख़्त चली गयी तो भूलाई नहीं जाती, घर काटने को होता है, बच्चे अपने अपने काम में मस्त, आलीशान घर, धन दौलत सब है पर उसके बिना कुछ मज़ा नहीं, य...

बूढ़े माँ-बाप के पास,

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 बूढ़े माँ-बाप के पास, आखिरी बचा सहारा , बस यही एक मकान है, जिसमें सजा बरसों बरस से, पुराना सा कुछ सामान है! कुछ फर्नीचर है दीमक खाया, हिलती मेज के बीच रखा  प्लास्टिक का एक गुलदान है! दालान में खड़ी शीशम की  अलमारी में माँ के हाथों डाला  आंवले के मुरब्बे भरा  पुराना रंगीन काँच का  एक मर्तबान है! पिछवाड़े में खड़ा बरसों से हरा सा था जो एक लैंब्रैटा, अब सफेद होकर लगता जैसे घर से बेघर होकर  सहारा तलाशता मेहमान है ! पड़े हैं संदूकों में कई छोटे मोजे, चार फ्राक, एक निक्कर , तीन टोपे छुटकी की छटी का पीला झबला एक पुड़िया में घर के शुभ को रखी  बड़के की आँवनाल है! एक काजल की डिबिया है  सूखी बादाम वाली महक जिसमें से आती है  आज भी मंझली वाली ! दीवारों की किरचों से झाँकते, कई परतों के झड़ते रंग, अलग-अलग जीवन के दौरों की  कहानी सुनाते जैसे कोई निगहबान है ! सहारे सारे साथ छोड़ गए  अब इनके लाठी में बसते प्राण हैं ! बस यही सब बचा-खुचा सा जीने को जरूरी ये सामान है ! बूढ़े माता-पिता के पास, आखिरी बचा सहारा , बस यही एक मकान है, जिसमें सजा बरसों ब...

न जाति की बेड़ी पैरों में, न पाँति का मोहर ठप्पा था

 न जाति की बेड़ी पैरों में, न पाँति का मोहर ठप्पा था- आया जब माँ की कोख में तब, केवल इंसान का बच्चा था आया सुमधुर किलकारी संग, था खाली हाथ बदन नंगा जगत के पापों से अनजान,निष्पाप निर्मल निर्झर गंगा मासूम वचन, चंचल थिरकन, वह ठुमक-ठुमक चलना उसका, वह चाँद कभी पूर्णिमा, कभी रजनी बनकर छुपना उसका, वह खालिस था इंसान जो अब कई पदों का दावेदार बना, सिलनेवाली इक सूई थी वह,ना जाने कब तलवार बना। असहाय, सहज, अनभिज्ञ, विचलित,मासूम बड़ा कोमल-सा है, मन कोंपल, तन माकूल,अनुज वह,अद्भुत,तुला दोलन-सा है। वह जिज्ञासा का पुंज,प्रश्न का तोप निश्छल दिवाली है- वह षड्यंत्रों से दूर, सहज, निर्भय एवम पनियाली है। वह बालक जग की नीँव अपनपा,दबा-दबा रह जाता है, सब बड़ों का विचलित खेल अनबुझा, कभी समझ कहां पाता है। टूटे तारे-जैसा निर्दोष, निरुद्देश्य भटकता रहता है- कभी विरोध, कभी गुस्सा, कभी आंखें मूंदे सब सहता है। वह माँ के विद्यालय का पहला छात्र, अनंत मासूम-सा वह- वह जिगर का टुकड़ा, आंख का तारा, दंत-बीच मजलूम-सा वह। गंगा की निश्चल धार में वह, निष्पाप कभी बह जाता है, वह भय अपार जो शत्रु-हाथ या दैत्य-पाश चढ़ जाता है। वह मात...

Evening Rain

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  The night will be sweet If the ceilings rains decides to beet Pity pity patter patter Pity pity patter patter Shrinking profusely from the skies As go to bed is its best advice Workers rushing home for dinner Rush this might be its beginner  The busy street all empty Restaurants vacuous absolutely Now every men will be at home Lying on their wives foam No late night returning Every reasons are under adjourning The kids will see Dad return so early Mum offers late dinner barely Love love the ceilings sings Family is the first before other things Pity pity patter patter all along Pity pity patter patter like a song Rainy evenings seems to be complete Because in togetherness happiness fits  The family will be together again Having awesome moments planned by the rain. ANKIT VERMA
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 पचपन --------- पचपन पार का पुरुष व्यस्त रखता है स्वयं को, अखबार के पलटते पन्नों में, टीवी के बदलते चैनलों में, टैक्स और इंश्योरेंस की रसीदों में, पुराने किस्से बांचकर मिली तारीफों में! पचपन पार का पुरुष  समेटता है स्वयं को, आसपास पसरे मौन में, नए बने चश्मे के फ्रेम में, कनौतियों पर छितरे सफेद शेड में, कमीज़ के एक नए शेप में ! पचपन पार का पुरुष खोजता है स्वयं को, जीवन साथी के छूटे प्रेम में, बच्चों संग खेले बचपन के गेम में, पुरानी एलबम के फोटो फ्रेम में ! अंजान झलक जो छूटी थी ट्रेन में! पचपन पार का पुरुष, ढालता है स्वयं को, पुराने गीतों की नई धुनों के बोल में, पुराने रिश्तों को पहनाए नए खोल में, अपनी अहमियत के घटते मोल में , दाम ठहराकर तराजू के घटते तोल में ! पचपन पार का पुरुष, दूर करता है स्वयं को, अनायास दस्तक देते  ठहाकों से , छोटों से चलती बेबाक मजाकों से , यारों से होती नियमित मुलाकातों से, दिल में करवट लेते रूमानी जज़्बातों से! पचपन पार का पुरुष, आँकता है स्वयं को, कुछ गलत लिए फैसलों में, अपनों से मिले हौंसलों में, दुनिया के बनाए ढकोसलों में, दरार देखकर अपने ही बनाए...

Where did they fail?

 He is dead She is in jail What went wrong Where did they fail? They were both middle class In a way they were the same Bright and intelligent Just looking for money and fame. They just chose the wrong set Of people around them So totally unaware that It could lead to mayhem The glitz misled them The ‘friends’ were all fake Dope and substance abuse All for ‘keeping up’ sake The big guys are out there Having parties and fun Who cares if families are broken They are safe, they do not have to run So maybe we should tell our kids To dream and dream high But check their own parachutes Before they take off for the sky.

फंदे उल्टे सीधे...This is for my Pari

माँ ने कुछ फंदे सलाई में डाले और बिठा लिया बेटी को पास। ध्यान से देखो क्योंकि तुमको भी बुनना है एक स्वेटर अपनी सास का अपने श्वसुर का बुनना होगा पति के लिए और एक देवर का ननद नंदोई के लिए पहले बुनना है ताकि आए न तुम पर कोई भी बात। यह बातें मेरी माँ ने कही थी। ऊन ध्यान से तुम  सुलाझना पड़ न जाए उसमें गांठ एक डिजाइन उल्टे फंदो का एक सिखाऊं सीधे का आज।  रख लूंगी सहेज कर इनको तुम्हारे दहेज के मैं साथ खुश हो जायेंगे घरवाले पाकर बहू के हाथों की गरमाहट। यह बातें मुझसे मेरी माँ ने कही थी वही समझा रही हूं तुमको आज कम न रहे मेरी भी गुड़िया सारे आएं उसको काज। रंग बिरंगे फंदो को तुम आपस में कुछ ऐसे मिलाना बुन जाए नया डिजाइन सबसे सुंदर नजर वो आए बच्चों के टोपे के साथ मोजे बुनना मैं सिखाऊं दस्ताने और मफलर गुड़िया सबकी ठंडक जल्द भगाएं। ऐसा मेरी माँ ने कहा था तुमको भी मैं समझा रही कुछ बुनाई सीखा रही हूं। कुछ ऊन अपनी पसंद की अपने लिए भी तुम ले लेना बुन लेना अपने भी सपने यह कहना माँ को याद नहीं क्योंकि ऐसा माँ ने कभी नहीं सुना था क्योंकि माँ की माँ ने नहीं कहा था।

बेटे

  कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं ! संबल , आस, उम्मीद जहां भर की, हर सवाल के हाजिर जवाब में रखते हैं, घर की रौनक बन चहकते बेटे, परिवार को रौशन कर चिराग से दिखते हैं ! कभी झगड़े, कभी मस्ती , कभी धूम-धड़क्का  जिन्हें लड़ाकू कहकर दोस्त शिकायत करते हैं ! सबसे  से आँख बचाकर आज भी अम्मा के तकिये के नीचे बटुआ छिपा कर रखते हैं ! रिश्ते की बात चले अगर कभी तो, शर्माकर कनखियों से माहौल को तकते हैं ! फोटो देख अपने भावी जीवन साथी का, पैर के अंगूठे से फर्श की दरार को कुरेदते हैं ! बेटा, भाई, पति और पिता का किरदार निभाकर, अपने वजूद को तलाश हरबार तरसते हैं ! घर की नींव की ईंट में लगे सिमेंट जैसे, रिश्तों में आई हर दरार को भरते हैं ! कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं !

गोपाल

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द्वापर युग में भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में जन्म लिया| भगवान श्रीकृष्ण का बचपन गायों की सेवा करते ही बीता. शायद इसी कारण से उन्हें गोपाल भी कहकर पुकारा जाता है. वैसे तो वृंदावन के हर घर में ही गाय पाली जाती थी. लेकिन बाल्यकाल से ही  कृष्ण और गायों के बीच एक अलग ही प्रकार का अलौकिक और भावपूर्ण रिश्ता रहा. कृष्ण ने जब पूतना का वध किया तो श्रीकृष्ण के पूरे शरीर को शुद्ध करने के लिए उनकी मां यशोदा और गोपियों ने कृष्ण के शरीर पर गोरज, गोमूत्र लगाया था. यानि कि तीन लोकों के स्वामी को बुरी नज़र से बचाने का कार्य गाय किया करती थी.  कृष्ण के पिता नंदबाबा के घर कई सेवादार थे लेकिन कृष्ण हमेशा खुद गाय दुहने की ज़िद किया करते थे. 'तनक कनक की दोहनी दे री मैया। तात दुहन सिखवन कह्यौ मोहि धौरी गैया।' यहां सूरदासजी ने देखिए किस खूबसूरती से कृष्ण और मैया यशोदा के बीच हुई बातचीत का वर्णन किया है- आजु मैं गाइ चरावन जैहौं। बृंदाबन के भांति-भांति फल अपने कर मैं खेहौं।। ऐसी बात कहौ जनि बारे, देखो अपनी भांति। तनक-तनक पग चलिहौ कैसैं, आवत ह्वैह्वै राति।। प्रात जात गैया लै चारन, घर आवत हैं सांझ। तुम...

इस तरह करता हूं मैं प्रेम

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मैं इस तरह  करता हूं तुमसे प्रेम जैसे चिड़िया करती है  तिनका-तिनका जोड़ कर अपने घोंसले से या फिर बालों को संवारती हुई मां अपनी बेटी से और जैसे माली करता है अपने उगाए पौधों पर खिलते हुए फूलों से। तुम्हारे तपते चेहरे पर सुनहरी हो गई मुस्कान से करता हूं मैं प्रेम क्योंकि यह  पृथ्वी के प्रथम युगल में संवाद की कूट भाषा है। मैं इस तरह  करता हूं तुमसे प्रेम जैसे चूमते हैं युगल  एक दूसरे में डूब कर, उस चुंबन का अहसास करोगी तो जान जाओगी कि  मैंने चूमा है हर बार  सिर्फ तुुम्हारी रूह को फिर समझ लोगी कि  मैंने क्या कहा है  आसमान में इंद्रधनुष बनाती तुम्हारी सपनीली आंखों से जहां निरंतर  जलती है एक लौ जो गरीबों के चूल्हे को सुलगाती है सुबह-शाम जिसकी आंच पर  रोटियां ही नहीं धीरे धीरे पकता है प्रेम भी उन श्रमिक युगलों के लिए जो बनाते हैं - हमारे लिए धरती पर आशियाना और खुद रह जाते हैं बेघर।   ज्वालामुखी की आग समेटे तुम्हारी इन आंखों से करता हूं प्रेम जो रूढ़ियों और मरती परंपराओं   की लौह शृंखलाओं को गला देना चाहती हैं और खोल देना चा...

सफर

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  अपनी सत्तर बरस की मां को देखकर, क्या सोचा है तुमने कभी, कि वो भी कभी कालेज में टाईट कुर्ती  और स्लैक्स पहन कर जाया करती थी ! तुम हरगिज़ नहीं सोच सकते कि तुम्हारी माँ जब अपने घर के आँगन में छमछम कर चहकती हुई ऊधम मचाती दौड़ा करती तो घर का कोना-कोना  उस आवाज़ से गुलज़ार हो उठता था ! तुम नहीं जानते कि 'ट्विस्ट' डांस वाली प्रतियोगिता में, जीते थे उन्होंने अनेकों बार प्रथम पुरुस्कार ! किशोरावस्था में वो जब भी कभी अपने गीले बालों को तौलिए में लपेटे  छत पर फैली गुनगुनी धूप में सुखाने जाया करती, तो न जाने कितनी ही पतंगें  आसमान में कटने लगा करती थी ! क्या सोचा है तुमने कभी कि अट्ठारह बरस की मां ने तुम्हारे बीस बरस के पिता को  जब वरमाला पहनाई तो मारे लाज से  दुहरी होकर गठरी बन, उन्होंने अपने वर को  नज़र उठाकर भी नहीं देखा था! तुमने तो ये भी नहीं सोचा होगा कि  तुम्हारे आने की दस्तक देती उस प्रसव पीड़ा के उठने पर अस्पताल जाने से पहले  उन्होंने माँग कर बेसन की खट्टी सब्जी खाई थी ! तुम सोच सकते हो क्या कि कभी, अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि तुम्हें...

बेटे

  कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं ! संबल , आस, उम्मीद जहां भर की, हर सवाल के हाजिर जवाब में रखते हैं, घर की रौनक बन चहकते बेटे, परिवार को रौशन कर चिराग से दिखते हैं ! कभी झगड़े, कभी मस्ती , कभी धूम-धड़क्का  जिन्हें लड़ाकू कहकर दोस्त शिकायत करते हैं ! सबसे  से आँख बचाकर आज भी अम्मा के तकिये के नीचे बटुआ छिपा कर रखते हैं ! रिश्ते की बात चले अगर कभी तो, शर्माकर कनखियों से माहौल को तकते हैं ! फोटो देख अपने भावी जीवन साथी का, पैर के अंगूठे से फर्श की दरार को कुरेदते हैं ! बेटा, भाई, पति और पिता का किरदार निभाकर, अपने वजूद को तलाश हरबार तरसते हैं ! घर की नींव की ईंट में लगे सिमेंट जैसे, रिश्तों में आई हर दरार को भरते हैं ! कदकाठी में हूबहू पिता के जैसे आँख की नमी में माँ से लगते है, खुशनसीब होते हैं ऐसे सारे घर जहां बेटे परछाईं बन बहन में बसते हैं !

पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो।

  बेईमानी का पैसा  पेट की एक-एक आंत  फाड़कर निकलता है।         रमेश चंद्र शर्मा, जो पंजाब के 'खन्ना' नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे,  उन्होंने अपने जीवन का एक पृष्ठ खोल कर सुनाया  जो पाठकों की आँखें भी खोल सकता है  और शायद उस पाप से, जिस में वह भागीदार बना, उस से भी बचा सकता है।       मेडिकल स्टोर अपने स्थान के कारण, काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था।  लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि *धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है*  और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई। रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी।  अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली।  लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा। मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था, क्योंकि मेडिकल फील्ड में दोगुनी नहीं, बल्कि कई गुना कमाई होती है। शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे, कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में...

रामायण

रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के इंतजार में बेंच पर बैठे एक बुजुर्ग हाथों में रामायण गुटका (छोटी पुस्तक ) ले कर तल्लीनता से पढ़ रहे थे । समीप ही बेंच पर एक नवयुवक अपनी श्रीमती के साथ बैठे थे । नवयुवक बुजुर्ग से सम्बोधित होकर बोला ..आप ये सुनी सुनाई कथाओं को पढ़ने में अपना समय क्यों नष्ट कर रहे हैं ...इनसे आपको क्या सीखने को मिलेगा ? अरे पढ़ना ही है तो , अखबार पढ़ो , इंडिया टुडे पढ़ो , और भी अन्य सैकड़ो पुस्तकें उपलब्ध है जो आपको दुनियादारी सिखाती है , व्यवहारिक ज्ञान देती है , उन्हें पढ़ो । तभी ट्रेन आ गई । बुजुर्ग पिछले और युवक अगले दरवाजे से ट्रेन में चढ़ गए , ट्रेन चलते ही कुछ देर बाद बुजुर्ग को उसी नवयुवक के चीखने चिल्लाने ट्रेन रोकने की आवाज सुनाई दी । पता लगा युवक खुद तो चढ़ गया था किंतु उसकी पत्नी नीचे ही रह गई थी । तब बुजुर्ग ने उस युवक से कहा - बेटा यदि तुमने अखबारों , इंडिया टुडे और अन्य सैकडों पुस्तकों के बजाय रामायण पढ़ी होती तो तुम्हे ज्ञात होता कि वनवास हेतु अयोध्य्या से प्रस्थान करते समय रामजी ने पहले सीताजी को रथ पर चढ़ाया था खुद पीछे चढ़े थे । चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई।  चले हृदयँ अ...

फैसला

बृजमोहन जी छत पर जमीन पे बिछाये गददे पर लेटे ... आसमान मे चांद और तारो को देख रहे थे उम्र दराज हो गए थे और वैसे भी ऐसी अवस्था मे कुछ घंटो की नींद, मुश्किल से आती थी .... पास मे उनकी धर्मपत्नी सुधाजी का भी रोज यही हाल रहता था... खुद का बनाया मकान था रिटायरमेंट के सभी पैसे लगाकर एक अपना घर बनाया  था....ताकि बुढापे मे पत्नी और बच्चों सहित चैन से बचा जीवन व्यतीत करेंगे मगर..... दोनों बेटे कुछ ज्यादा ही समझदार निकले .... जैसे ही दोनो बेटों की शादी हुई ...दोनों का व्यवहार बदलने लगा...दोनों के दो-दो बच्चे हो गये .... और हालत घर के कमरे ही नही हर जगह जैसे बंट गयी हो....तभी पत्नी सुधा का हाथ गाल पर महसूस हुआ... सोने की कोशिश कीजिए..... आज फिर बच्चो ने कुछ अपमानजनक कह दिया क्या... बृजमोहन जी बोले  -नही.... पर आंसुओं ने सुधा के हाथ को गीला कर दिया ... एक ने छुपाया तो दूसरे ने समझ लिया... सुधा बोली -सुनो .....कई दिन से चारों बेटे बहूऐ...  पता नही देर तक  चुपचाप क्या बातें करते रहते है...  कुछ पता है आपको.... बृजमोहन जी -हूं..... सो जाओ ..... सुधा जबतक मे हूं तुम मत घबराओ .....

क्या लिखूं माँ ,मैं तेरे लिए मैं तो खुद तेरी लिखावट हूँ |

 llमाँ  ||     माँ तुझे शब्दों में कैसे  बुनु       मैं तो खुद तेरी बनावट हूँ ,   क्या लिखूं मैं तेरे लिए     मैं तो तेरी ही लिखावट हूँ |                                                             तू अनंत  अविरत प्रेम                              तू ममता का सागर,                             तुझसे ही जन्म जगत का                             तुझ में ही बसता ईश्वर | हर गलती की माफी और सज़ा      दोनों तेरे पास है ,   तेरे तो डाँट में भी    प्यार का एहसास है |                     ...

तुम्हें लिखना

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 तुम्हें लिखना हमेशा तुमसे प्यार करने से⁣ ज़्यादा आसान रहा मेरे लिए।⁣ ⁣ इसकी सबसे बड़ी और सरल वजह ये रही कि -⁣ तुमसे प्यार करने में मुझे तुमपर निर्भर रहकर⁣ तुम्हारी अपेक्षा करनी पड़ती है!⁣ ⁣ मैं उम्मीदों में उलझा रहता हूँ कि -⁣ जब तुमने अपने हाथों में⁣ मेहंदी लगाई तो उसमें⁣ मेरे नाम का पहला अक्षर पिरोया या नहीं⁣ या⁣ जब कभी मैंने⁣ मर जाने की बात कही⁣ तो तुमने मेरे होंठ पर⁣ उँगली रखी या नहीं!⁣ ⁣ मुझे लगता है प्यार के नशे में धुत्त रहना वाला इंसान⁣ मृत्यु पर सिर्फ़ पढ़ सकता है - लिख नहीं सकता,⁣ क्यूँकि जब जब वो ख़ुद के मरने पर लिखेगा⁣ तो एक उँगली हमेशा आकर शांत करा देगी! ⁣ ⁣ मैं अब सब कुछ लिख सकता हूँ क्यूँकि⁣ ना अब मुझे किसी से प्रेम है⁣ ना ही कोई उँगली मेरे होंठों तक पहुँच पाती है!⁣ 🥀

याद करोगे मुझे

 || उस दिन ||     आज नहीं--- याद करोगे मुझे उस दिन--- जिस दिन सुख-समुद्र में निर्द्वन्द्व विचर रहे इन जहाजों के फास्ट-फूड-टिन खत्म हो जाएंगे और बस्ती का कहीं पता न होगा! ढूंढोगे तुम किनारा--- जमीन का छोटा-सा हरा टुकड़ा जहां आज भी चने उगते हों गौवें हरी-हरी घास चर रही हों दूर से ही उनकी आंखों में तुम्हें तरल प्यार झलकेगा ! छप्पर से छनता धुआं देख                                                       निश्चय ही इष्ट को साष्टांग करोगे! आज के अछोर विश्व-व्यापार-साम्राज्य के स्वयंभू सम्राट तुम अपनी गरबीले आर्थिक-भाषा की श्रेष्ठता के परम दावेदार तुम उस दिन---उस दिन तुम सब कुछ भूलकर जिंदगी के झूले में झूलकर सामने वाले से सिक्कों की भाषा में नहीं मनुष्यता की आदिम-भाषा में दोस्ती के संवाद करोगे याद करोगे मुझे निश्चित ही उस दिन--जिस दिन परसा के ठोंगे में भरे हुए भींगे चने से जमीन के उस हरे टुकड़े पर तुम्हारा जीवन-दायी स्वागत होगा बालाएं नह...

वह

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 इतने दिनों के बाद वह इस समय ठीक मेरे सामने है न कुछ कहना न सुनना न पाना न खोना सिर्फ़ आँखों के आगे एक परिचित चेहरे का होना होना- इतना ही काफ़ी है बस इतने से हल हो जाते हैं बहुत-से सवाल बहुत-से शब्दों में बस इसी से भर आया है लबालब अर्थ कि वह है वह है है और चकित हूँ मैं कि इतने बरस बाद और इस कठिन समय में भी वह बिल्कुल उसी तरह  हँस रही है और बस इतना ही काफ़ी है। वह 

लड़के

कुछ लड़के बड़े अच्छे लगते हैं जब मां से पूछते हैं , "आम का अचार है क्या ?" कुछ लड़के जब कभी किसी लड़की को  कनखियों से देखने पर पकड़े जाते हैं, तो शर्माकर, सकपकाकर , पकड़ने वाले से ही  पलटकर पूछते हैं "क्या हुआ ? कुछ भी तो नहीं !" कसम से , अच्छे लगते हैं ! अच्छे लगते हैं वे सारे लड़के, जो मंगलवार और शनिवार को, मंदिर में  प्रसाद चढ़ाकर, मन ही मन सबके लिए राजी-खुशी  मांगा करते हैं , और मीठी बूंदी और पेड़े घर -मुहल्ले में बिना नागा बाँटा करते हैं ! अच्छे लगते हैं वे सारे लड़के  जो चाकलेट, चिप्स के पैकेट खोलकर कर देते हैं सबसे पहले  अपनी माँ और बहन के आगे, और कहते हैं , "लो, आपका फेवरेट है न ये वाला !" कुछ लड़के सचमुच अच्छे लगते हैं जब, ऐमी.वाई.बंटाई के गानों से बेखबर , सुनते हैं किशोर कुमार और मोहम्मद रफी को, और गुनगुनाते हैं, कहीं दूर जब दिन ढल जाए ! वे सारे लड़के सच में बहुत अच्छे लगते हैं, जो अक्सर  गोलगप्पे वाले से कहते हैं , "भैया मुझे मीठे पानी वाला देना !" अच्छे लगते हैं ऐसे सारे लड़के , क्योंकि इनके व्यक्तित्व में कुछ तो  जरूर होता है , जो इन...

भैंस : एक दार्शनिक पशु।

पशु समाजिक हो सकता है जैसे मनुष्य, या धार्मिक जैसे गाय-बकरा आदि। पर दार्शनिक पशु बस भैंस है। शायद ही किसी ने किसी भैंस को उपद्रव मचाते देखा हो। इसे देख कर किसी पीर-सन्यासी की याद आती है, जो जीवन के सुख और दुख से ऊपर उठ चुका है। तमाम दार्शनिक किताबें भैंस के अनमनी दार्शनिकता के आगे फिके पड़ जाती हैं।  भैंस से मेरी पहली मुलाकात बचपन में हुई। बिहार में एक छोटा सा गाँव है,पटना से 30 किलोमीटर दूर है 'रसलपुर'। यही है मेरा गाँव। मेरे पापा ने अपना बचपन यहीं काटा था, और नौकरी लगने के बाद भी वो चाहते थे कि बच्चे गाँव से मानसिक रूप से ज्यादा दूर न चले जाएं।  इसलिए हर छुट्टी में वहाँ जाते ही हमें गाँव के काम पकड़ा दिए जाते थे, जैसे घास काट के लाना, खेत में बाकी काम,भैंस को चराने ले जाना आदि। इसमें मेरा सबसे प्रिय काम रहा है भैंस चराना।  गाँव में भैंसों और गायों को दोपहर में नदी के तरफ घास खिलाने ले जाया जाता है। इसे ही भैंस चराने ले जाना कहते हैं। उनके घास खाते वक़्त वहाँ एक व्यक्ति को खड़ा रहना पड़ता है कि जानवर किसी और के खेत में न घुस जाये। और अगर ऐसा हुआ तो उस रोज गांव में लड़ाई पक्की।...

काशी विश्वनाथ-| प्रेम गली

| मैं कई गलियों से होकर गुजरा  तुम्हें खोजते ---- ---तृष्णा गली  --सूरत गली ---समाज गली ---तिरस्कार गली  ---कुण्ठा गली    ---धोखा गली  ---दुःख गली  ---झगड़ा गली  ---तंज गली  ---दंश गली  ---खीज गली   पर तुम कहीं न मिली --- ---मैं तुम्हें ढूँढते-ढूँढते      तुम्हारी कूक का इन्तजार करते                 थक गया  आखिर मैं उस गली में जा घुसा---- ---जिससे मेरा दूर-दूर का     खासकर प्रेम का कोई रिश्ता       नहीं था और आश्चर्य---------- ! तुम वहीँ मेरा इन्तजार करतीं --- ---मुस्कुरातीं---स्वागत में आगत खड़ी मिलीं न जाने तुम  कब से यहीं रहतीं थीं   यह तुम्हारा स्थाई पता था ---जो मुझे नहीं पता था  इसलिए मेरा हर सन्देश ---हर चिट्ठी  भटककर लौट आती थी  हाय ! मैं इस प्रेम गली में पहले क्यों नहीं घुसा ! प्रिये ! तुम्हारी यह प्रेम गली तो  बहुत खूबसूरत  अपनत्व भरी   ख़ुशी-ख़ुशी रहने लायक  गली है !...

मदारी-जब तक ये संसार नचाए, झूम झूम के नाचे जा ।

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मदारी की भी तो कुछ मजबूरियां रही होंगी ... वर्ना कौन अपना वक्त जाया कर के मुझे इस कदर नचाता ... ~ अब जब मदारी जिस रोज घर से बाहर नहीं निकलता है , उस रोज मै भयभीत हो जाता हूं । आज ना वो मुझे नचाएगा और ना ही मेरे नाचने पर चंद सिक्के आएंगे ...फिर भोजन कहां से आएगा ?  देर सुबह मै उसके पैर झकझोरता हूं - उठो , जागो अब देर हो रही । तुम्हे कमाने जाना है और मुझे नाचने । अब यही बंधन अच्छा लगता है । बंधन तो है लेकिन दो वक़्त की रोटी भी तो मिलती है । हां , मदारी जब अपने बड़े एल्युमिनियम के कटोरे से कुछ कुछ निकाल खाता है । मै भी वहीं बैठा रहता हूं - अब मुझे भी कुछ मिल जाएगा । देह हाथ कि थकान खत्म हो जाती है जब अंत में वो अपने झोले से केला निकालता है ।  कभी कभी मन करता है - भाग जाऊं , वापस लौट जाऊं अपने झुंड में । फिर अपने झुंड में अपनों को किस्से सुनाऊं - शहर के मदारी का खेल और उस खेल से निकले दो वक़्त की रोटी का ।  कौन सुनेगा उस झुंड में मेरे किस्से ... वो तो अपनी दुनिया में मस्त होंगे ...एक टहनी से दूसरी टहनी ...अपनी प्रकृति के संग ...अपनी दुनिया में मस्त ... या फिर मै ही फंस गया या...