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Showing posts from June, 2020

परथन का आटा

रोटियाँ बेल रही माँ के कंधे पर झूलती वो छोटी बच्ची ज़िद करती थी अक्सर माँ ! रहने दो ना एक आखिरी छोटी वाली लोई मैं भी बनाऊँगी एक रोटी जो तुम्हारी बनायी रोटी से होगी बहुत छोटी जैसे मैं तुम्हारी बेटी छोटी-सी वैसे ही तुम्हारी बड़ी रोटी की बेटी मेरी वाली छोटी रोटी। और तब माँ समझाती बड़े ही प्यार से रोटी छोटी हो या बड़ी एक रोटी दूसरी रोटी की माँ नहीं होती हाँ ! बहन हो सकती है। तब आश्चर्य से पूछती वो मासूम बच्ची अच्छा! तो फिर रोटियों की माँ कौन होती है? गोद में बिठा कर बेटी को माँ हँसकर कहती ये जो परथन का आटा है ना यही रोटियों की माँ होती हैं जो सहलाती हैं उसे दुलारती है, पुचकारती है लिपटकर अपनी बेटी से बचाती है उसे बेलन में चिपकने से ताकि वो नाचती रहे, थिरकती रहे और ले सकें मनचाही आकार। आज वो बच्ची बड़ी हो गई है और अहसास हो रहा है उसे सचमुच माएँ भी बिल्कुल परथन के आटा की तरह होती हैं जिनके दिए संस्कार, प्यार-दुलार, दुआएं लिपटी रहती हैं ताउम्र अपनी संतान से ताकि सही आकार लेने से पहले ही वक्त के बेलन तले चिपककर थम न जाये उसकी जिंदगी।

आँधी आ ही जाती है

आँधी आ ही जाती है हल्की-सी आँधी में भी डालियाँ गिर पड़ती हैं अक्सर उन्हीं के सिर पर जिनके हाथों ने संभाल कर रखा था बीज और सही समय आने पर मिट्टी में दिये जाने से हुआ था वह अंकुरित। फूटी थी उसकी कोंपलें तो उन्हीं हाथों ने किया देखभाल उन्हें सींचा उन्हें पाला उन्हें पोसा नन्हे बीज से फलदार और छायादार विशाल वृक्ष बनाया। पर वह सृजक जब-जब जाता है उस वृक्ष के नीचे थोड़े फल और थोड़ी छाया की चाह में तब-तब पता नहीं क्यों ? आँधी आ ही जाती है।

बाबा नागार्जुन---बापू को ही बना रहे हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के!

बापू को हीबना रहे हैं ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के! बच्चे होंगे मालामाल ख़ूब गलेगी उनकी दाल औरों की टपकेगी राल इनकी मगर तनेगी पाल मत पूछो तुम इनका हाल सर्वोदय के नटवरलाल सेठों का हित साध रहे हैं तीनों बन्दर बापू के! युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बन्दर बापू के! सत्य अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बन्दर बापू के! पूँछों से छबि आँक रहे हैं तीनों बन्दर बापू के! दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बन्दर बापू के! मुस्काते हैं आँखें मीचे तीनों बन्दर बापू के! छील रहे गीता की खाल उपनिषदें हैं इनकी ढाल उधर सजे मोती के थाल इधर जमे सतजुगी दलाल मत पूछो तुम इनका हाल सर्वोदय के नटवरलाल मूंड रहे दुनिया-जहान को तीनों बन्दर बापू के! चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बन्दर बापू के! करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बन्दर बापू के! बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बन्दर बापू के! गाँधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बन्दर बापू के! असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बन्दर बापू के! दिल चटकीला, उजले बाल नाप चुके हैं गगन विशाल फूल गए हैं कैसे गाल मत पूछो तुम इनका हाल सर्वोदय के नटवरलाल हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनो...

सच न बोलना ----नागार्जुन(रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा, कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!)

मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को, डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को! जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा! सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा! जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है! बंद सेल, बेगूसराय में नौजवान दो भले मरे जगह नहीं है जेलों में, यमराज तुम्हारी मदद करे। ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का, फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका! बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे! भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे! ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है, अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है! सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर! छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे, देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे! जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा, काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा! माताओं पर, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं! बच्चे, बूढ़े-बाप तक न ...

अहंकारी पिता और आज्ञाकारी पुत्र !

गंगा बाई से मन भर गया. बुढ़ापे में भी जवानी हिचकोले मारने लगी. एक दिन नज़र सत्यवती पर पड़ी, बेटी के उम्र की थी आशीर्वाद देकर आगे बढ़ा जा सकता था ! लेकिन शांतनु की वासना जाग उठी, उसे दिन रात सिर्फ सत्यवती का शरीर नज़र आने लगा. प्रजा भुखी थी, राज्य का कामकाज कुछ ठीक नही चल रहा था. शांतनु अपनी वासना की दुनिया में खोया हुआ था ! सुबह होते ही उसने सत्यवती से निवेदन किया क्या तुम मुझसे विवाह करोगी. सत्यवती बड़ी बुद्धिमान महिला थी, उसने कहा.. हे राजन सीधे सीधे क्यों नही कहते तुम्हे मेरा शरीर का भोग लगाना है.. इतना घुमा फिराकर कहने की क्या जरुरत है... करुँगी विवाह लेकिन मेरी एक शर्त है, मेरी कोख से जन्मा बालक ही हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी होगा. शांतनु बीच मझधार में फंस गया ! भीष्म ने कहा हे पिता क्यों एक मामूली सत्यवती के लिए व्याकुल हो, आपके हरेम महल में एक से एक टन टन टका टक महिलाएं हैं. शांतनु ने कहा आंखें अटक गई हैं सत्यवती के शरीर के लिए काश तुम आज्ञाकारी पुत्र होते ? भीष्म ने आज्ञाकारी पुत्र का दायित्व निभाते हुए आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा ली. पुरे राज्य में आज्ञाकारी पुत्र की ...

ईश्वरचंद्र विद्यासागर

एक बालक नित्य विद्यालय पढ़ने जाता था। घर में उसकी माता थी। माँ अपने बेटे पर प्राण न्योछावर किए रहती थी,उसकी हर माँग पूरी करने में आनंद का अनुभव करती। पुत्र भी पढ़ने-लिखने में बड़ा तेज़ और परिश्रमी था। खेल के समय खेलता, लेकिन पढ़ने के समय का ध्यान रखता। एक दिन दरवाज़े पर किसी ने - 'माई! ओ माई!' पुकारते हुए आवाज़ लगाई तो बालक हाथ में पुस्तक पकड़े हुए द्वार पर गया, देखा कि एक फटेहाल बुढ़िया काँपते हाथ फैलाए खड़ी थी। उसने कहा, 'बेटा! कुछ भीख दे दे।' बुढ़िया के मुँह से बेटा सुनकर वह भावुक हो गया और माँ से आकर कहने लगा, 'माँ! एक बेचारी गरीब माँ मुझे बेटा कहकर कुछ माँग रही है।' उस समय घर में कुछ खाने की चीज़ थी नहीं, इसलिए माँ ने कहा, 'बेटा! रोटी-भात तो कुछ बचा नहीं है, चाहे तो चावल दे दो।' पर बालक ने हठ करते हुए कहा -'माँ! चावल से क्या होगा? तुम जो अपने हाथ में सोने का कंगन पहने हो, वही दे दो न उस बेचारी को। मैं जब बड़ा होकर कमाऊँगा तो तुम्हें दो कंगन बनवा दूँगा।' माँ ने बालक का मन रखने के लिए सच में ही सोने का अपना वह कंगन कलाई से उतारा और कहा,...

जकडन रीति रिवाजों की

                अत्यधिक पढ़ी ' विभा 'घर परिवार के बंधनों में कैद मन की अभिलाषा का कत्ल करती रही । परंतु फिर भी किसी पारिवारिक सदस्य को प्रसन्न नही कर पाई। लम्वा घूंघट लाले सुबह नहा धोकर सास ससुर के पैर छूकर दिन का शुभारंभ करती है । उस पर भी बातें सुनती , उसका मन नही समझ पाता कि कैसी कैद है ? जहां उसे अपने मन की रचना करने की स्वतंत्रा नही है। अपना कमरा भी अपने हाथ की बनी कलाकृति से नही सजा पाती । लगाई थी कमरे की दीवार पर कभी अपने हाथ से काढ़ा कर बनाई साटन के कपडे पर राधा कृष्ण की मूरत । सास यह कह कर उठा लेगई "अरे बहू भगवान की मूरत है मंदिर में होनी चाहिए, फिर यहा सब देखेंगे तो तेरे हाथो को नजर लग जायगी " ।विभाग समझ नही पाई कि उसके हाथ इतने गुणकारी है तो खाने की प्रशंसा क्यो नही करते है ।             इस प्रकार कुछ रीति रिवाजों की कैद कुछ सास के लगाये बंधन , जिंदगी आगे सरक रही थी , पर विभा का अंतः मन कभी कभी बहुत छटपटाता कि किस प्रकार वह इस सब से स्वतंत्र हो।कुछ लोग दुनिया को ताकत और लड़ाई से जितना चाहते है।कुछ ...

हां!! तुम बदल गए

तुम बदल गए हो। काश के तुम तब ऐसे होते तो आज हमारे संबंध कुछ और अच्छे होते। हम चार बहने और मै सबसे बड़ी, कितनी इच्छा थी कि एक ऐसा जीवनसाथी मिले जो अपना मोल ना लगाएं और दो जोड़ी कपड़ों में सिर्फ मुझे अपनाए। मै अपने मातापिता का सुखदुख साथ बांट सकूं। पर कहा ऐसा हो पाया था, तुम्हारा वो दामाद वाला रुतबा और उस पर तुम्हारे मातापिता के उलहाने। तुम चाह कर भी मेरे और मेरे परिवार के ना हो पाए। बड़े बेटे होने के फ़र्ज़ में तुम मुझे मारते चले गए। मैं जहां अपने मातापिता और बहनों का साथ देना चाहती थी वहां उनसे दूर होती चली गई। हर बार मायके खाली हाथ जाना और उनका रस्मों में लपेट कर कपड़े, जोड़ो, मिठाई का खर्जा कराना, हर बार मुझे अन्दर तक काट देता। मातापिता ने भी हमेशा ससुराल और पति को सर्वोपरि मानने पर जोर दिया। वह वह सब करते चले गए जो मुझे सुखी देखने के लिए जरूरी था। पर मै, मै अन्दर से धीरे-धीरे मरने लगी। यह किसी ने ना देखा। माता पिता की हसीं और दुख दोनो में शामिल ना हो पाई। मेरा बचपन, मेरा अस्तित्व एक पहेली बन गया। अपने माता पिता का घर एक मेहमान ग्रह बन गया। आज बीस साल शादी के बाद तुम मेरे मा...

माला का धागा

बड़ी भौजी के मृत शरीर को स्नान करवा कर तैयार कर बाहर लाया जा चुका था।घर की ननद देवरानी ,बहू ,बेटियों ने रो रो कर बुरा हाल कर लिया था।शायद ही कोई अपनी भाभी के मरने पर इतना विलाप करता होगा।उन्हें देख मोहल्ले की औरतों के आँसू भी नहीं रुक रहे थे। थोड़ी देर में  बाजों की राम नाम सत्य है की धुन बजी और वो चल पड़ी महायात्रा पर।उनका अंतिम संस्कार हो गया।वे अपने जीवनकर्म पूरे कर स्वर्गीय हो चुकी थी। सभी  श्मशान से  घर आ चुके थे।घोर सन्नाटा पसरा था।थोड़ी देर में किसी न किसी की सिसकी निकल ही जाती थी। घर में बुजुर्ग के नाम पर एक मात्र बुआजी रह गईं थी।उन्होंने सबको अपने पास बुलाया और समझाया ,बेटा ,तुम सब इतना दुःख मनाओगे तो उसकी आत्मा भी दुखी होगी।वो जो तुम लोगों के लिए कर के गई है उसे वैसा ही बनाए रखना है। तुम तीनों भाई और दोनों बहनें बहुत छोटे थे जब वो घर में ब्याह कर आई थी।पास के ही गांव की थी।दिन भर अपनी सहेलियों के साथ लंगड़ी और पांचे खेलती या फिर रस्सी कूदती रहती थी।एक दिन बापू ने उसे पसन्द कर लिया और पन्द्रह की उम्र में तो ब्याह भी हो गया सोहन से ।घर में रुनझुन करती बहु आ गई...

" दिखाई दिए यूँ के बेखुद किया हमे आपसे भी जुदा कर चले ..."

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" दिखाई दिए यूँ के बेखुद किया हमे आपसे भी जुदा कर चले ..." पता है तुम्हे , मीर तकी मीर जब इस ग़ज़ल के मुखड़े में 'आप से' लिखते है तब यहां आपसे का मतलब खुद से होता है । मुहब्बत की पराकाष्ठा है की महबूब को एक नज़र देख लेने के बाद , सम्मोहन ऐसा हुआ की हम खुद से भी जुदा हो गए । मीर तकी मीर को 'गॉड ऑफ पोएट्री' कहा जाता है , वो अपनी गज़लें लिखते नही थे , पढ़ने वाले के रूह में अपनी नीब भिंगो देते हैं । प्रेम पूजा है , तपस्या है , प्रार्थना है तभी वो लिखते है - " परस्तिश किया तक के ऐ बुत तुझे नजर में सबों की खुदा कर चले " परस्तिश कहते है - पूजा , प्रार्थना को । महबूब को बुत / मूरत बना इस कदर पूजा किया कि खुद की कौन पूछे , सारी दुनिया उसे खुदा मान बैठी । इश्क़ मिलन नही , इश्क़ वियोग है , विछोह है , दर्द है - और जो मिल ही गया वो खुदा कैसे ? तभी महबूबा अपने महबूब की गली की तमन्ना करती है और 'यास ए लहू' में नहा कर निकलती है । आस के विपरीत यास होता है , एक ऐसा पत्थर जहां उम्मीद पनप ही नही सकती ...और यही इश्क़ का दस्तूर है , जहां मुहब्बत ज़िंदा और इंसा...

कोई साथ-साथ

जब हम बेहद अकेले होते हैं तो साथ बतियाने आ बैठता है किसी का सुख किसी का दुख यादें किसी की किसी का स्नेह अतीत की अपनत्व भरी गर्म-सांसे पर्वतीय-बादलों के घनेरे उड़ते टुकड़े बन हमें घेर लेते हैं ! समय असमय समझ अंतरंग-रत एकांत को छेड़ता बिल्कुल नहीं सूर्य की प्रखर-किरणें इस समय कोण बदल लेती हैं पृथ्वी; सांस थामे सिर्फ हमें सुनती है पेड़;फुनगियों से उतर एकदम पास खिसक आते हैं विस्तार को समेटता आकाश अकेलेपन की आंखों में सिमट आता है और हमारे झुके कंधों पर हाथ रख हवा हमें समझाती है कि बिल्कुल अकेले हम कभी नहीं हैं सुख-दुख,आशा-निराशा भींजे एकमात्र जीवन-धोती का दूसरा सिरा थामे कोई हमारे साथ-साथ लहरा-लहरा अपनत्व भरी हवा में उसे सुखा रहा होता है पुलककर फिर से पहनाने के लिए हमें कोई हर समय हमारे साथ-साथ होता ही है

दुर्योधन से भिड़ जाने को...

स्त्रियां गढ़ रही है इतिहास वे नहीं बंधना चाहती मर्यादाओं की जंग लगी जंजीरों में... अब नहीं आना चाहती पुरूषों द्वारा रचायी रूढ़िवादी बातों के पेंचो में.... वो समझ चुकी है पुरूषों का उनके प्रति स्वार्थ अब वे चाहती है पंख फैलाकर खुले आसमां में आजादी की उड़ान.... होना चाहती है अब खुद के पैरों पर खड़ी बनना चाहती है वे अब आत्मनिर्भर , नहीं चाहतीं अपनी जरूरतों के लिऐ हाथ फैलाना औरों के सामने... कितनी खूबसूरत दिखायी देती है न सुबह घरों से निकली मुस्कुराती हुई आत्मविश्वास से भरी इतिहास रचने को आतुर औरतें... दृढ़ता से भरी अपनी सेवाएं देती अस्पतालों , राजनीति व देश फौज को वे निकल रही है अब घरों से अपने सभी सपनों को साकार करने , व हर किरदार को बखूबी से निभाने को.... पुलिस में नियुक्त होकर भी चूड़ा सजे हाथों से ही भिड़ जाती है बीच रास्तों में ही छेड़खानी करते मनचलों से अब वे सीख चुकी है सबक सिखाना अपने ऊपर उठती उंगलियों को... स्त्रियां अब किसी लक्ष्मण सीमा पर निर्भर नहीं होना चाहती है , नहीं बुलाना चाहती अब किसी कृष्ण को अपनी लाज बचाने को , निकल रही है अब व...

स्त्रियां घर से बाहर होकर भी घर में रहती है

स्त्रियां घर से बाहर होकर भी घर में रहती  , दो कदम चलते ही सोच में पड़ जाती हैं खुले मोटर के नल के बारे में , बेडरूम का जला छोड़ आयी बल्ब के बारे में सिनेमा में बैठी हुई भी याद नहीं रखती कहानियों के किरदारों को बल्कि सोचने लग जाती है ठीक से दरवाजे को लॉक किया या नहीं, रेस्टोरेंट में बैठी पिज्जा खाती हुई भी ऊहापोह में डूबी रहती है, फ्रिज के बाहर रखी हुई हरी सब्जियों के बारे में दुकान पर बिल का भुगतान करती एकाएक याद आता है उसे , अलमारी को ठीक से लॉक किया या नहीं। मौसम खुशनुमा होने पर भी  आनंद नहीं ले पाती बाहर घूमने का उनको यही चिंता रहती हैं कहीं भीग न जाएं बारिश में छत पर सुखाएं कपड़े । दो घंटे के लिए घर से बाहर गयी स्त्रियां सैकड़ों बार घड़ी की सुइयों को टटोलती है , कईयों दफा फोन की वाॅल को निरीक्षित करती है कहीं कोई कॉल है या संदेश न आया हो घर से, कुछ दिनों के लिए बाहर गयी स्त्रियां भी सोच में डूबी रहती घर के आंगन में रखे तुलसी के पौधे के बारे में कहीं वह सूख गया न हो पानी के अभाव में बरनी में रखा आम का अचार कहीं खराब न हो जाएं धूप के अभाव...

जब औरतें बगावत पर उतर आएंगी

"जब औरतें बगावत पर उतर आएंगी" जब औरतें बगावत पर उतर आएंगी वे नहीं चाहेंगी उठकर सुबह से शाम तक रोजमर्रा के कामों में जुटना , नहीं चाहेंगी तुम्हारे चाय और नाश्ते की फरमाइशें पूरी करना, बच्चों को स्कूल भेजना तुम्हारा लंच तैयार करना व समय से तुम्हारे कपड़ों को इश्तरी करना तुम चिल्लाओगे फिर भी वे अनसुना कर सोयी रहेंगी ठाठ से बिस्तर पर । तुम अब बढ़ जाओगे आगे ,जड़ने उनको तमाचा पर वे खींच लेंगी अपनी ओर उठते हाथों को छटाक से और गुस्से से मरोड़ देंगी ,तुम भयभीत होकर पीछे हट जाओगे। रोते हुए बच्चों को तुम्हे सौंप कर चल देंगी खुद को संवारने कमरे में , देखेंगी पूरी फ़ुरसत से टीवी पर अपना मनपसंदीदा धारावाहिक । धूल खा रही किताबों की अलमारियों से चुनेंगी अपनी मनपसंदीदा किताब और फूंक मार साफ करेंगी वर्षों से उस पर जमी धूल को। चढ़ाएंगी चूल्हे पर एक कप चाय और बैठ जाएंगी फ़ुरसत से बालकनी में किताब पढ़ने सालों बाद बिना किसी विघ्न के पढ़ेंगी पूरी एक किताब , इसी तरह संगीत प्रेमी औरतें बैठ जाएंगी अपना मनपसंदीदा संगीत सुनने । नृत्य प्रेमी औरतें जी भर कर करेंगी मार्गी न...

सुनो पुरुषों

एक स्त्री सिर्फ तब तक ही तुम्हारी बनी रहेगी , जब तक वो बुरी छोटी बड़ी बातों के लिए तुमसे रूठ जाया करेगी , इसके बाद जब तुम उसे गले लगाओगे सब भूल कर तुम्हारी हो जाएगी । हज़ारों शिकायतें रोज़ करेगी तुमसे लेकिन जब तुम बस एक कप चाय बनाके पिलाओगे न सबसे तुम्हारी तारीफ़ कर फूली नही समाएगी । बात बात पर तुम्हे उलाहने देगी लेकिन एक बार तुम्हारे  प्यार से देखने भर से उसे तुमसे और प्यार हो जाएगा, न जाने उस लड़की को तुमसे कितनी लड़ाई करनी होती है लेकिन देखो न जब तुम ये कह देते हो बहुत प्यार है तुमसे आंखों में आंसू भर तुम्हारी बाहों में सिमट जाएगी तुम्हारे प्रति जो भी उसके मन मे आएगा कह देगी बेधड़क बिना सोचे क्योंकि वो जानती है तुम सिर्फ उसके हो लेकिनजब वो देखेगी उसके आंसुओ से उसके रूठने सेउसकी शिकयतों से तमाम दी गयी उलहनाओं से तुम्हे कोई फर्क नही पढ़ता वो धीरे धीरे रूठना छोड़ देती है अपने आंसुओं को घोट लेती है भीतर ही मुस्कुरा कर देने लगती है तुम्हारी हर बात का जवाब समेट लेती है खुद को स्वयं तक ओढ़ लेती है खामोशी की एक चादर और तुम समझते हो सब ठीक हो गया क्यू...

एनी फ्रैंक

यह कविता एनी फ्रैंक ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लिखी थी, इतने मुश्किल भरे दौर में भी वह खुशमिजाज होकर लेखन कार्य किया करती थी, इस कविता में बहुत ही आसानी से एनी ने एक किशोरावस्था लड़की के जीवन की जटिलताओं के बारे में बताया है। हम सब में सबसे कम उम्र पर नहीं रही अब छोटी जिंदगी हो सकती दूभर हमारे पास है काम तुम्हे सिखाने पढ़ाने का नहीं है आराम हमारे पास तजुर्बा है सीखो हमसे हम ये सब पहले कर चुके है तुमसे ..... हमे है जानकारियां तमाम सदियों से चल रहा ऐसा ही काम, अपनी कमिया नहीं दिखती किसी को दूसरों की कमियां लगती बड़ी सबको ऐसी हालत में कमियां निकालना है आसान मां बाप के लिए है काफी मुश्किल काम निष्पक्षता, दयालुता से पेश आना तुम्हारे साथ मीन मेख निकालने की आदत छोड़ना है मुश्किल जब तुम बूढ़े लोगों के साथ हो तब करना बस इतना चुप चाप बस उनकी बड़बड़ाहट को झेलना कड़वी कितनी भी हो ये गोली बस इसको गटकना इससे अमन, चैन रहता है सदा बना यहां गुजरे ये महीने नहीं गए बेकार वक़्त बर्बाद करना नहीं तुम्हारा स्वभाव, तुम दिन भर करती पढ़ाई ढेर सारी ताकि दिमाग में न रहे उब भरी ...

आज घर याद आ रहा है बहुत।

धरती को जिसकी ग़रज़ नहीं  हम उस बादल के जैसे हैं । हम इस बेढब-सी दुनिया में बस कोलाहल के जैसे हैं । हम ऐसे एक वृक्ष हैं जो ख़ुद ही रस्तों पर उग आए । हमको अभिशापित कहता जग रोली - अक्षत कब छू पाए ? हम बिना उर्वरक बढ़ते हैं अपने बल से हरियाली में हमको न बुद्ध के चरण छुए गर्हित पीपल के जैसे हैं हम लू के गरम थपेड़ों में  उड़ते जाते अंबर - अंबर जब थकते हैं , सुस्ताते हैं  फिर धूल भरी इस धरती पर  हमको न मिली है प्यार भरे हाथों की कभी छुअन कोई हम महज मिले हैं मिट्टी में हम इक सेमल के जैसे हैं हम वो जिसके जन्म मरण के मध्य प्रेम की कथा न कोई  हम वो जिससे कभी जगत ने पूछी मन की व्यथा न कोई । ऋतुएँ रोज़ छलेंगी हमको ये कह सूरज दाँत निपोरे - पतझर में उगने वाले हम कोमल कोंपल के जैसे हैं !

गिरगिट का सपना( बाल साहित्य)

_________________________________________ एक गिरगिट था। अच्‍छा, मोटा-ताजा। काफी हरे जंगल में रहता था। रहने के लिए एक घने पेड़ के नीचे अच्‍छी-सी जगह बना रखी थी उसने। खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं थी। आसपास जीव-जन्‍तु बहुत मिल जाते थे। फिर भी वह उदास रहता था। उसका ख्‍याल था कि उसे कुछ और होना चाहिए था। और हर चीज, हर जीव का अपना एक रंग था। पर उसका अपना कोई एक रंग था ही नहीं। थोड़ी देर पहले नीले थे, अब हरे हो गए। हरे से बैंगनी। बैंगनी से कत्‍थई। कत्‍थई से स्‍याह। यह भी कोई जिन्‍दगी थी! यह ठीक था कि इससे बचाव बहुत होता था। हर देखनेवाले को धोखा दिया जा सकता था। खतरे के वक्‍त जान बचाई जा सकती थी। शिकार की सुविधा भी इसी से थी। पर यह भी क्‍या कि अपनी कोई एक पहचान ही नहीं! सुबह उठे, तो कच्‍चे भुट्टे की तरह पीले और रात को सोए तो भुने शकरकन्‍द की तरह काले! हर दो घण्‍टे में खुद अपने ही लिए अजनबी! उसे अपने सिवा हर एक से ईर्ष्‍या होती थी। पास के बिल में एक साँप था। ऐसा बढ़िया लहरिया था उसकी खाल पर कि देखकर मजा आ जाता था! आसपास के सब चूहे-चमगादड़ उससे खौफ खाते थे। वह खुद भी उसे देखते ही दुम दबाकर ...

अज्ञेय

खोज़ में जब निकल ही आया सत्य तो बहुत मिले । कुछ नये कुछ पुराने मिले कुछ अपने कुछ बिराने मिले कुछ दिखावे कुछ बहाने मिले कुछ अकड़ू कुछ मुँह-चुराने मिले कुछ घुटे-मँजे सफेदपोश मिले कुछ ईमानदार ख़ानाबदोश मिले । कुछ ने लुभाया कुछ ने डराया कुछ ने परचाया- कुछ ने भरमाया- सत्य तो बहुत मिले खोज़ में जब निकल ही आया । कुछ पड़े मिले कुछ खड़े मिले कुछ झड़े मिले कुछ सड़े मिले कुछ निखरे कुछ बिखरे कुछ धुँधले कुछ सुथरे सब सत्य रहे कहे, अनकहे । खोज़ में जब निकल ही आया सत्य तो बहुत मिले पर तुम नभ के तुम कि गुहा-गह्वर के तुम मोम के तुम, पत्थर के तुम तुम किसी देवता से नहीं निकले: तुम मेरे साथ मेरे ही आँसू में गले मेरे ही रक्त पर पले अनुभव के दाह पर क्षण-क्षण उकसती मेरी अशमित चिता पर तुम मेरे ही साथ जले । तुम- तुम्हें तो भस्म हो मैंने फिर अपनी भभूत में पाया अंग रमाया तभी तो पाया । खोज़ में जब निकल ही आया, सत्य तो बहुत मिले- एक ही पाया । - अज्ञेय

कलाकार की मुक्ति---अज्ञेय

मैं कोई कहानी नहीं कहता। कहानी कहने का मन भी नहीं होता, और सच पूछो, तो मुझे कहानी कहना आता भी नहीं है। लेकिन जितना ही अधिक कहानी पढ़ता हूँ या सुनता हूँ, उतना ही कौतूहल हुआ करता है कि कहानियाँ आख़िर बनती कैसे हैं! फिर यह भी सोचने लगता हूँ कि अगर ऐसे न बनकर ऐसे बनतीं, तो कैसा रहता? और यह प्रश्न हमेशा मुझे पुरानी या पौराणिक गाथाओं की ओर ले जाता है। कहते हैं कि पुराण-गाथाएँ सब सर्वदा सच होती हैं, क्योंकि उनका सत्य काव्य-सत्य होता है, वस्तु-सत्य नहीं। उस प्रतीक सत्य को युग के परिवर्तन नहीं छू सकते। लेकिन क्या प्रतीक सत्य भी बदलते नहीं? क्या सामूहिक अनुभव में कभी परिवर्तन नहीं आता? वृद्धि भी तो परिवर्तन है, और अगर कवि ने अनुभव में कोई वृद्धि नहीं की, तो उसकी संवेदना किस काम की? यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते मानो एक नई खिड़की खुल जाती है, और पौराणिक गाथाओं के चरित-नायक नये वेश में दिखने लगते हैं। वह खिड़की मानो जीवन की रंगस्थली में खुलने वाली एक खिड़की है, अभिनेता रंगमंच पर जिस रूप में आएँगे, उससे कुछ पूर्व के सहज रूप में उन्हें इस खिड़की से देखा जा सकता है। या यह समझ लीजिए कि सूत्रधार उन्हें ...

वापसी

गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई – दो बक्स¸ डोलची¸ बालटी; “यह डिब्बा कैसा है¸ गनेशी” उन्होंने पूछा। गनेशी बिस्तर बाँधता हुआ¸ कुछ गर्व¸ कुछ दु:ख¸ कुछ लज्जा से बोला¸ "घरवाली ने साथ को कुछ बेसन के लड्‌डू रख दिये हैं। कहा¸ बाबूजी को पसन्द थे¸ अब कहाँ हम गरीब लोग आपकी कुछ ख़ातिर कर पाएँगे।” घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया, जैसे एक परिचित¸ स्नेह¸ आदरमय¸ सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था। “कभी–कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा।” गनेशी बिस्तर में रस्सी बाँधते हुए बोला। “कभी कुछ जरूरत हो तो लिखना गनेशी! इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।” गनेशी ने अंगोछे के छोर से आँखें पोंछी¸ “अब आप लोग सहारा न देंगे, तो कौन देगा! आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।” गजाधर बाबू चलने को तैयार बैठे थे। रेल्वे क्वार्टर का वह कमरा¸ जिसमें उन्होंने कितने वर्ष बिताए थे¸ उनका सामान हट जाने से कुरूप और नग्न लग रहा था। आँगन में रोपे पौधे भी जान पहचान के लोग ले गए थे, और जगह–जगह मिट्टी बिखरी हुई थी। पर पत्नी¸ बाल–बच्चों के साथ रहने की कल्पना में यह बिछोह एक दु...

जय श्री कृष्णा !

जितनी चीज़ें कृष्ण जी से छूटी हैं, उतनी तो किसी से नहीं छूटी! कृष्ण जी से उनकी माँ छूटी, पिता छूटे। फिर जो नंद-यशोदा मिले, वो भी छूटे। संगी-साथी छूटे राधा छूटी गोकुल छूटा फिर मथुरा छूटा। कृष्ण जी से जीवन भर कुछ न कुछ छूटता ही रहा है। वो आजीवन त्याग ही करते रहे। हमारी आज की पीढ़ी, जो कुछ भी छूटने पर टूटने लगती है, उसे *कृष्ण* को गुरु बना लेना चाहिए। जो कृष्ण को समझ लेगा, वो कभी अवसाद में नहीं जाएगा। कृष्ण *आनन्द* के देवता हैं। कुछ छूटने पर भी कैसे खुश रहा जा सकता है, यह कृष्ण से अच्छा कोई नहीं सिखा सकता ! जय श्री कृष्णा !