दुर्योधन से भिड़ जाने को...

स्त्रियां गढ़ रही है इतिहास
वे नहीं बंधना चाहती मर्यादाओं
की जंग लगी जंजीरों में...

अब नहीं आना चाहती
पुरूषों द्वारा रचायी
रूढ़िवादी बातों के पेंचो में....

वो समझ चुकी है
पुरूषों का उनके प्रति स्वार्थ
अब वे चाहती है पंख फैलाकर
खुले आसमां में आजादी की उड़ान....

होना चाहती है अब खुद के पैरों पर खड़ी
बनना चाहती है वे अब आत्मनिर्भर ,
नहीं चाहतीं अपनी जरूरतों के लिऐ
हाथ फैलाना औरों के सामने...

कितनी खूबसूरत दिखायी देती है न
सुबह घरों से निकली
मुस्कुराती हुई आत्मविश्वास से भरी
इतिहास रचने को आतुर औरतें...

दृढ़ता से भरी अपनी सेवाएं देती
अस्पतालों , राजनीति व देश फौज को
वे निकल रही है अब घरों से अपने
सभी सपनों को साकार करने ,
व हर किरदार को बखूबी से निभाने को....

पुलिस में नियुक्त होकर भी
चूड़ा सजे हाथों से ही
भिड़ जाती है बीच रास्तों में ही
छेड़खानी करते मनचलों से
अब वे सीख चुकी है सबक सिखाना
अपने ऊपर उठती उंगलियों को...

स्त्रियां अब किसी लक्ष्मण सीमा
पर निर्भर नहीं होना चाहती है ,
नहीं बुलाना चाहती अब किसी कृष्ण को
अपनी लाज बचाने को ,
निकल रही है अब वे स्वयं ही
रावानों को सबक सिखाने व
दुर्योधन से भिड़ जाने को...!!

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