माला का धागा
बड़ी भौजी के मृत शरीर को स्नान करवा कर तैयार कर बाहर लाया जा चुका था।घर की ननद देवरानी ,बहू ,बेटियों ने रो रो कर बुरा हाल कर लिया था।शायद ही कोई अपनी भाभी के मरने पर इतना विलाप करता होगा।उन्हें देख मोहल्ले की औरतों के आँसू भी नहीं रुक रहे थे।
थोड़ी देर में बाजों की राम नाम सत्य है की धुन बजी और वो चल पड़ी महायात्रा पर।उनका अंतिम संस्कार हो गया।वे अपने जीवनकर्म पूरे कर स्वर्गीय हो चुकी थी। सभी श्मशान से घर आ चुके थे।घोर सन्नाटा पसरा था।थोड़ी देर में किसी न किसी की सिसकी निकल ही जाती थी।
घर में बुजुर्ग के नाम पर एक मात्र बुआजी रह गईं थी।उन्होंने सबको अपने पास बुलाया और समझाया ,बेटा ,तुम सब इतना दुःख मनाओगे तो उसकी आत्मा भी दुखी होगी।वो जो तुम लोगों के लिए कर के गई है उसे वैसा ही बनाए रखना है।
तुम तीनों भाई और दोनों बहनें बहुत छोटे थे जब वो घर में ब्याह कर आई थी।पास के ही गांव की थी।दिन भर अपनी सहेलियों के साथ लंगड़ी और पांचे खेलती या फिर रस्सी कूदती रहती थी।एक दिन बापू ने उसे पसन्द कर लिया और पन्द्रह की उम्र में तो ब्याह भी हो गया सोहन से ।घर में रुनझुन करती बहु आ गई ।सबको खूब खुश रखती। किन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था।सोहन को तपेदिक हो गया और नही बच सका ।वो मात्र दो बरस में विधवा हो गई ।
पिताजी आए थे उसके मायके ले जाने पर अम्मा ने हाथ जोड़ कर मना कर दिया।बोलीं ,हमारी बहू हमारी जिम्मेदारी और अमानत है।' औऱ तुम्हारी बड़ी भौजी अपना जीवनघसीटने लगी थी ।
अम्मा का दिल फटता था सफ़ेद कपड़े और सूनी मांग में बहू को देख कर।सहन नहीं कर पाई और वो भी भगवान को प्यारी हो गई।
उस दिन का दिन था और आज तक का दिन! वो तुम पाँचों की माँ बन गई थी। तुम लोगों के शादी -ब्याह गौने बच्चे ,उनके शादी ब्याह सब करती चली गई।तुम्हीं लोगों को उसने अपना सब कुछ माना।हालांकि इतने बड़े दुख में भरी जवानी में बूढ़ी दिखने लगी थी।तीस की उम्र में बाल सफेद हो गए थे।
बड़े देवर बोले ,बुआजी ,वो सचमुच हमारी माँ बल्कि माँ से ज्यादा थी।हमारे झगड़ों को भी आसानी से सुलझा कर सबको समझा लेती थीं
बुआजी ,एक बात बताऊँ, वो इस घर की माला का धागा थी जिन्होंने सारे मोतियों को अपने अंदर पिरो कर रखा था। सबको जोड़े रखा था।
बुआजी बोलीं ,बेटा भले ही आज वो नहीं है पर इस माला को ऐसे ही बनाये रखना।
सब बोल उठे ,हाँ बुआजी ऐसा ही होगा।इस माला के मोती कभी नहीं बिखरेंगे।
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