" दिखाई दिए यूँ के बेखुद किया हमे आपसे भी जुदा कर चले ..."
" दिखाई दिए यूँ के बेखुद किया
हमे आपसे भी जुदा कर चले ..."
पता है तुम्हे , मीर तकी मीर जब इस ग़ज़ल के मुखड़े में 'आप से' लिखते है तब यहां आपसे का मतलब खुद से होता है । मुहब्बत की पराकाष्ठा है की महबूब को एक नज़र देख लेने के बाद , सम्मोहन ऐसा हुआ की हम खुद से भी जुदा हो गए । मीर तकी मीर को 'गॉड ऑफ पोएट्री' कहा जाता है , वो अपनी गज़लें लिखते नही थे , पढ़ने वाले के रूह में अपनी नीब भिंगो देते हैं ।
प्रेम पूजा है , तपस्या है , प्रार्थना है तभी वो लिखते है -
" परस्तिश किया तक के ऐ बुत तुझे
नजर में सबों की खुदा कर चले "
परस्तिश कहते है - पूजा , प्रार्थना को । महबूब को बुत / मूरत बना इस कदर पूजा किया कि खुद की कौन पूछे , सारी दुनिया उसे खुदा मान बैठी ।
इश्क़ मिलन नही , इश्क़ वियोग है , विछोह है , दर्द है - और जो मिल ही गया वो खुदा कैसे ? तभी महबूबा अपने महबूब की गली की तमन्ना करती है और 'यास ए लहू' में नहा कर निकलती है । आस के विपरीत यास होता है , एक ऐसा पत्थर जहां उम्मीद पनप ही नही सकती ...और यही इश्क़ का दस्तूर है , जहां मुहब्बत ज़िंदा और इंसान हार जाता है ...
" बहोत आरजू थी गली की तेरी
सो यास-ए-लहू में नहा कर चले ..."
देर शाम इस ग़ज़ल को सुना जा सकता है ...अपने अंदाज , ख्याल और अतीत में :))
हालांकि मैने इस सिनेमा को नही देखा है लेकिन इस ग़ज़ल वीडियो में , कौन किसको देख रहा है - पता ही नही चल रहा :))
~ 23.06.2018
देखिये ...एक बार ...सागर सरहदी की बेहतरीन पोएट्री और खय्याम साहब का संगीत , फिर ऊपर से लता दी कि पोएट्री के रूह में उतरकर गायकी ... उफ्फ ...
बरसात का मौसम है ...कभी कभी शाम गमगीन भी अच्छी लगती है ...थोड़ी भींगी
भींगी सी ...:))

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