आज घर याद आ रहा है बहुत।

धरती को जिसकी ग़रज़ नहीं 
हम उस बादल के जैसे हैं ।
हम इस बेढब-सी दुनिया में
बस कोलाहल के जैसे हैं ।

हम ऐसे एक वृक्ष हैं जो
ख़ुद ही रस्तों पर उग आए ।
हमको अभिशापित कहता जग
रोली - अक्षत कब छू पाए ?
हम बिना उर्वरक बढ़ते हैं अपने बल से हरियाली में
हमको न बुद्ध के चरण छुए गर्हित पीपल के जैसे हैं

हम लू के गरम थपेड़ों में 
उड़ते जाते अंबर - अंबर
जब थकते हैं , सुस्ताते हैं 
फिर धूल भरी इस धरती पर 
हमको न मिली है प्यार भरे हाथों की कभी छुअन कोई
हम महज मिले हैं मिट्टी में हम इक सेमल के जैसे हैं

हम वो जिसके जन्म मरण के
मध्य प्रेम की कथा न कोई 
हम वो जिससे कभी जगत ने
पूछी मन की व्यथा न कोई ।
ऋतुएँ रोज़ छलेंगी हमको ये कह सूरज दाँत निपोरे -
पतझर में उगने वाले हम कोमल कोंपल के जैसे हैं !

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