स्त्रियां घर से बाहर होकर भी घर में रहती है

स्त्रियां घर से बाहर होकर भी घर में रहती  ,
दो कदम चलते ही
सोच में पड़ जाती हैं
खुले मोटर के नल के बारे में ,
बेडरूम का जला छोड़ आयी बल्ब के बारे में

सिनेमा में बैठी हुई भी
याद नहीं रखती कहानियों के किरदारों को
बल्कि सोचने लग जाती है
ठीक से दरवाजे को लॉक किया या नहीं,

रेस्टोरेंट में बैठी पिज्जा खाती हुई भी
ऊहापोह में डूबी रहती है,
फ्रिज के बाहर रखी हुई हरी सब्जियों के बारे में

दुकान पर बिल का भुगतान करती
एकाएक याद आता है उसे ,
अलमारी को ठीक से लॉक किया या नहीं।

मौसम खुशनुमा होने पर भी 
आनंद नहीं ले पाती बाहर घूमने का
उनको यही चिंता रहती हैं कहीं
भीग न जाएं बारिश में छत पर सुखाएं कपड़े ।

दो घंटे के लिए घर से बाहर गयी स्त्रियां
सैकड़ों बार घड़ी की सुइयों को टटोलती है ,
कईयों दफा फोन की वाॅल को निरीक्षित करती है
कहीं कोई कॉल है या संदेश न आया हो घर से,

कुछ दिनों के लिए बाहर गयी स्त्रियां भी
सोच में डूबी रहती घर के आंगन में
रखे तुलसी के पौधे के बारे में
कहीं वह सूख गया न हो पानी के अभाव में

बरनी में रखा आम का अचार कहीं
खराब न हो जाएं धूप के अभाव में,
पति समय से खाना खाते होंगे या नहीं
कहीं उनका स्वास्थ्य तो नहीं बिगड़
गया होगा बाहर का खाना खाकर के

घर से बाहर गयी स्त्रियों के जेहन में
हजारों सवाल उमड़ने लगते है
घर के रख- रखाव को लेकर
सच है घर के बाहर होकर भी
घर में ही होती है स्त्रियां।


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