कोई साथ-साथ
जब हम
बेहद अकेले होते हैं तो
साथ
बतियाने
आ बैठता है
किसी का सुख
किसी का दुख
यादें किसी की
किसी का स्नेह
अतीत की
अपनत्व भरी
गर्म-सांसे
पर्वतीय-बादलों के
घनेरे उड़ते टुकड़े बन
हमें घेर लेते हैं !
समय
असमय समझ
अंतरंग-रत एकांत को
छेड़ता बिल्कुल नहीं
सूर्य की प्रखर-किरणें
इस समय कोण बदल लेती हैं
पृथ्वी; सांस थामे
सिर्फ हमें सुनती है
पेड़;फुनगियों से उतर
एकदम पास
खिसक आते हैं
विस्तार को समेटता आकाश
अकेलेपन की आंखों में
सिमट आता है
और
हमारे झुके कंधों पर हाथ रख हवा
हमें समझाती है कि
बिल्कुल अकेले हम
कभी नहीं हैं
सुख-दुख,आशा-निराशा भींजे
एकमात्र जीवन-धोती का
दूसरा सिरा थामे
कोई
हमारे साथ-साथ
लहरा-लहरा
अपनत्व भरी हवा में उसे
सुखा रहा होता है
पुलककर
फिर से पहनाने के लिए हमें
कोई हर समय हमारे
साथ-साथ होता ही है
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