हां!! तुम बदल गए



तुम बदल गए हो। काश के तुम तब ऐसे होते तो आज हमारे संबंध कुछ और अच्छे होते।

हम चार बहने और मै सबसे बड़ी, कितनी इच्छा थी कि एक ऐसा जीवनसाथी मिले जो अपना मोल ना लगाएं और दो जोड़ी कपड़ों में सिर्फ मुझे अपनाए। मै अपने मातापिता का सुखदुख साथ बांट सकूं। पर कहा ऐसा हो पाया था, तुम्हारा वो दामाद वाला रुतबा और उस पर तुम्हारे मातापिता के उलहाने। तुम चाह कर भी मेरे और मेरे परिवार के ना हो पाए। बड़े बेटे होने के फ़र्ज़ में तुम मुझे मारते चले गए। मैं जहां अपने मातापिता और बहनों का साथ देना चाहती थी वहां उनसे दूर होती चली गई।

हर बार मायके खाली हाथ जाना और उनका रस्मों में लपेट कर कपड़े, जोड़ो, मिठाई का खर्जा कराना, हर बार मुझे अन्दर तक काट देता। मातापिता ने भी हमेशा ससुराल और पति को सर्वोपरि मानने पर जोर दिया। वह वह सब करते चले गए जो मुझे सुखी देखने के लिए जरूरी था। पर मै, मै अन्दर से धीरे-धीरे मरने लगी। यह किसी ने ना देखा। माता पिता की हसीं और दुख दोनो में शामिल ना हो पाई। मेरा बचपन, मेरा अस्तित्व एक पहेली बन गया। अपने माता पिता का घर एक मेहमान ग्रह बन गया।

आज बीस साल शादी के बाद तुम मेरे माता पिता की चिंता कर रहे हो। एक बैंक अकाउंट से ऊपर उठ कर तुम उन्हें इंसान समझ रहे हो। अब तो वो गालियां मेरे लिए अजनबी हो गई है और माता पिता के लिए मै पराई। पर तुम अच्छे लग रहे हो उनकी फ़िक्र करते हुए। आज तुम अकेले जा कर भी उनका हालचाल पूछ रहे हो। अपने जेब में भी हाथ डाल रहे हो।

आज तुमने नारंगी के पौधे को मां के आंगन में रोपने के लिए कहा तो, आंख में आंसू आ गए। काश की आदर और स्नेह का यह पौधा तुमने बीस साल पहले रोपा होता तो आज मेरे परिवार मै वह शामिल होते और उनके परिवार में मै..............

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