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Showing posts from 2024

मीनाक्षी

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 मेरे एक मित्र हैं, पहले केवल परिचित थे.. धीरे-धीरे मित्रता हुई.. अब उन्हें मित्र इसलिए भी कह पाती हूँ क्यों कि हज़ारों असहमतियों के बाद भी उन्होंने मेरे साथ बने रहना चुना है.. मैं तो खैर पहले भी ऐसी ही थी.. सहमत होने पर साथ देती हूँ, असहमत होती हूँ तो कह देती हूँ.. मुझमें उनकी असहमतियों को सुनने का धैर्य भी है.. अपने मित्रों को किसी स्केल पर नहीं नापती.. पर कभी यह उम्मीद नहीं करती कि वे भी मेरे जैसे ही हो जाएं.. सबकी अपनी पर्सनैलिटी और निजी चयन हैं.. शायद इसलिए हमारे बीच चीज़ें लंबे समय तक बनी भी रहती हैं..  डेढ़ वर्ष पहले की बात है, मेरा स्थानांतरण जिस स्कूल में हुए वहाँ स्टाफ बड़ा था.. शुरुआत में मुझे एडजस्ट होने में कुछेक महीने लगे.. स्कूल के बिल्कुल सड़क के किनारे होने के कारण यहाँ की धूल-धक्कड़ से मैं परेशान रह रही थी.. मुझे लगातार फ्लू की शिकायत रहने लगी.. कई बार दिक्कत ज्यादा बढ़ जाने पर मुझे दो-चार दिन की छुट्टियाँ भी करनी पड़ती.. मैं जब छुट्टी से वापस आई तो मेरे इन मित्र ने मुझे कहा "क्या बात है? क्यों नहीं आ रहे थे, मरने वाले थे क्या?" अब यह एक बीमारी से उठ कर आए व...

Violin

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 Washington DC एक मेट्रो स्टेशन पर........2007 में जनवरी की एक ठंडी सुबह ......... एक व्यक्ति ने Violin पे लगभग 45 मिनट तक Bach की 6 रचनाएं बजाईं।  उस दौरान, लगभग 2000 लोग उस स्टेशन से गुज़रे, जिनमें से अधिकांश काम पर जा रहे थे। लगभग चार मिनट के बाद, एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने देखा कि वहाँ एक संगीतकार Violin बजा रहा है । उसने अपनी गति धीमी कर दी और कुछ सेकंड के लिए रुक गया, और फिर वह अपने काम को पूरा करने के लिए जल्दी से आगे बढ़ गया। लगभग चार मिनट बाद, वायलिन वादक को अपना पहला डॉलर प्राप्त हुआ। एक महिला ने टोपी में पैसे फेंके और बिना रुके चलती रही। छह मिनट बाद एक युवक वो संगीत सुनने के लिए रुका, दीवार के सहारे झुक के कुछ देर सुना , फिर अपनी घड़ी की ओर देखा और फिर चला गया । दस मिनट पर, एक तीन साल का लड़का रुका, लेकिन उसकी माँ ने उसे जल्दी से खींच लिया। बच्चा फिर से वायलिन वादक को देखने के लिए रुका, लेकिन माँ ने जोर से धक्का दिया और बच्चा पूरे समय अपना सिर घुमाता हुआ चलता रहा।  यह क्रिया कई अन्य बच्चों द्वारा दोहराई गई, लेकिन प्रत्येक माता-पिता ने - बिना किसी अपवाद के - ...

भिखारी

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 अमेरिका में एक बहुत बड़ा अरबपति था, रथचाइल्ड। एक दिन एक भिखारी भीतर घुस गया उसके मकान में और जोर-शोर से शोरगुल करने लगा कि मुझे कुछ मिलना ही चाहिए। बिना लिए मैं जाऊंगा नहीं। जितना दरबानों ने अलग करने की कोशिश की, उतनी उछलकूद मचा दी। आवाज उसकी इतनी थी कि रथचाइल्ड के कमरे तक पहुंच गई। वह निकलकर बाहर आया। उसने उसे पांच डालर भेंट किए और कहा कि सुन, अगर तूने शोरगुल न मचाया होता, तो मैं तुझे बीस डालर देने वाला था। मालूम है उस भिखमंगे ने क्या कहा?  उसने कहा, महानुभाव, अपनी सलाह अपने पास रखिए। आप बैंकर हो, मैं आपको बैंकिंग की सलाह नहीं देता। मैं जन्मजात भिखारी हूं, कृपा करके भिक्षा के संबंध में मुझे कोई सलाह मत दीजिए। रथचाइल्ड ने अपनी आत्मकथा में लिखवाया है कि उस दिन मैंने पहली दफा देखा कि भिखारी का भी अपना चेहरा है। वह कहता है, जन्मजात भिखारी हूं! मैं कोई छोटा साधारण भिखारी नहीं हूं ऐसा ऐरा-गैरा, कि अभी-अभी सीख गया हूं। जन्मजात हूं। और तुम बड़े बैंकर हो, मैं तुम्हें सलाह नहीं देता बैंकिंग के बाबत। कृपा करके तुम भी मुझे भीख मांगने के बाबत सलाह मत दो। मैं अपनी कला अच्छी तरह जानता हूं। ...

अमृता_इमरोज

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 #अमृता_के_इमरोज 97 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गये, अमृता जी की मृत्यु के लगभग 18 साल बाद। इमरोज के नाम के आगे लिखी तमाम उपमाएं उनके किरदार के आगे छोटी पड़ जाती हैं। इमरोज एक निःस्वार्थ प्रेमी थे वह जानते थे कि जिस लड़की पर वह दुनिया लुटा रहे हैं उसकी जिंदगी में कोई और (साहिर) है । फिर भी इमरोज जिंदगी भर एक ऐसे प्रेमी बने रहे जो इस बात से वाकिफ थे कि उनकी प्रेमिका तो किसी और से प्रेम करती है कितना मुश्किल होता होगा यह जानते हुये भी किसी को प्रेम करते रहना शायद इसी का नाम इश्क़ है। ऐसा ही इश्क़ इमरोज ने अमृता से किया था। एक इंटरव्यू में इमरोज बताते हैं कि अमृता की उंगलियां हमेशा कुछ न कुछ लिखा ही करती हैं फिर चाहे उनके हाथों में कलम हो या न हो, बहुत बार मैं स्कूटर चलता और अमृता पीछे बैठ कर मेरी पीठ पर कुछ लिखा करती हैं जो मुझे पता होता हैं कि साहिर का नाम लिखती, लेकिन क्या फर्क पड़ता है अमृता साहिर को चाहती हैं और मैं अमृता को। 2005 में अमृता ने जब इमरोज की बाहों में दम तोडा़ तो इमरोज ने लिखा- हम जीते हैं, ताकि हमें प्यार करना आ जाये, हम प्यार करते हैं ताकि हमें जीना आ...

इकलौती पुत्री

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 चार सौ बीघा जमीन के मालिक ने अपनी इकलौती पुत्री का विवाह बड़े शानो शौकत से किया... बहुत कुछ देकर ससुराल भेज दिया... साल बीतते ही पुत्री को समझ आ गया की पति गाँव में ही किसी लड़की के साथ अनैतिक संबंध में है... बस पुत्री ने ठान लिया जहाँ मान नहीँ प्रेम नहीँ वहां नहीँ रहना... पिता का घर बड़ा है  ढेरों पशु ढेरों नौकर चाकर  चार सौ बीघे के मालिक  उस घर की राजकुमारी है वो... शान से जीवन बिता लेगी  और वह सदा के लिये छोड़ आई ऐसी ससुराल जहाँ वह केवल नाम को पत्नी थी... पर ये क्या मायके में तो सभी के सुर ही बदल गए... भाभी सीधे मुँह बात न करती... माँ अलग रूठी रहती... कहती... स्त्री का जन्म ही समझौते के लिये होता है  तुझे समझौता करके मेल जोल बनाकर रहना चाहिए... एक दिन भाई उसे शहर ले गए... और कुछ कागजों पर हस्ताक्षर ले लिए...  कुछ समय बाद उसे पता चला कि वह जमीन पर से हक छोड़ने के हस्ताक्षर थे... पिता ने समझाया  अभी भी समय है वापिस लौट जा घर अपने सम्मान से  अन्यथा समाज तुझे  ताने दे देकर मार डालेगा... बेटी ने कहा... पिताजी... मुझे समाज ने नहीँ पैदा किया ह...

We all need stories to survive!!

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 यह किस्सा मैंने महान वैज्ञानिक और मेरे प्रेरणा-स्त्रोत कार्ल सगन की पुस्तक में पढ़ा था। किस्सा कुछ यूं था कि एक बार कार्ल अपने किसी साथी के साथ किसी रेस्टोरेंट में डिनर कर रहे थे। अचानक बाहर लोगों का शोर गूंजने लगा। कार्ल सगन ने बाहर निकल कर देखा तो पाया कि आसमान में एक अजीब तरीके की रोशनी टिमटिमा रही है, जिसे "एलियंस का स्पेसशिप" समझ कर लोग उत्साह में शोर मचा रहे थे।  . इतने में कार्ल अपनी गाड़ी के पास गए और डिक्की में रखी एक दूरबीन को लेकर उस रोशनी का मुआयना करने लगे। कुछ ही क्षण बाद कार्ल ने मुस्कुराते हुए लोगों को सूचित किया कि आंदोलित होने की जरूरत नहीं। ये वास्तव में एक नये तरह का मिलिट्री एयरक्राफ्ट है, कोई एलियन शिप नहीं।  . इतना सुनना था कि वहां मौजूद लोगों की खुशी काफूर हो गयी, चेहरे मायूस हो गए, मानों यह खबर सुनकर उन्हें बहुत दुःख हुआ हो। कार्ल ने एक व्यक्ति से इसका कारण पूछा तो पहले तो उसने कार्ल को घूरा, फिर बोला - आपको लगता है कि डिनर टेबल पर बैठ कर बच्चों को "नए तरीके का मिलिट्री जेट" देखने की कहानी सुनाना भी कोई रोचक बात है?  . देखा जाए तो लोग मायूस इ...

अपने आप से मिलने का खूबसूरत समय

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 सुबह को एक घण्टा अपने लिए ज़रूर निकालें घर की छत पर बैठें, लोगों के मकान देखें, आसमान में उड़ते परिंदे देखें, कॉफी या चाय का कप दोनों हाथ से पकड़ कर हरारत (गर्मी) महसूस करें अपने लिए वक़्त निकालें, अपने आपको अना (Ego) से हटा कर अहमियत दें, ज़िन्दगी की कड़वाहटों को चाय की चुस्कियों के साथ खत्म करें, और अगर फिर भी सुकून ना मिले तो उस खाली कप को देखें, जिस तरह उस कप में दोबारा चाय भरने की गुनजाइश (जगह) है | इसी तरह आपके अंदर भी ज़िन्दगी और ख़ुशी भरने की गुनजाइश बाकी है, कोई क्या करता है, क्या कहता है इन सब बातों से दूर हो कर सिर्फ़ अपने आपको देखें, अपने अंदर की खाली जगहों को भरना सीखें | खुद को भी कभी महसूस कर लिया करें, कुछ रौनकें खुद से भी हुआ करती हैं..!

Focus on your Family

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  Focus on your little family. Nothing else matters. In a world full of noise, distractions, and obligations, it's easy to lose sight of what's truly important. But amidst all the chaos, your little family is your constant, your rock, your safe haven. They are the ones who bring joy, love, and meaning to your life. So, take a step back, breathe deeply, and let the noise fade away. Remember, your family is your top priority. Their smiles, hugs, and laughter are what make every day brighter. Their love and support are what give you strength and courage. Don't let work, social media, or other obligations steal your attention away from what really matters. Your family needs you, and you need them. Be present in the moments that count - bedtime stories, family dinners, silly jokes, and cozy movie nights. Cherish every second, every laugh, and every tear. Your little family is growing and changing every day, and theseg moments won't last forever. Soak up the love, the snuggle...

जीवन

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 जीना भूल गए हैं हम.. कई हिस्सों में बंट गए हैं खुद को क्या क्या सिखा रहे हैं। ये रिश्तों की ज़िम्मेदारी साहब हम किश्तों में निभा रहे हैं।। आठों पहर है दौड़ भाग झूले सा झूल गए हैं हम। न जाने क्या पाने में जीना भूल गए हैं हम।। इक गुब्बारे की खातिर हम जब दिन भर रोते थे। ये बात है उस दौर की जब हम बच्चे थे छोटे थे।। अब सब कहते हैं हम बड़े हो गए। अपने पैरों पर खड़े हो गए।। लेकर बस्ता खुद से बड़ा जब से स्कूल गए हैं हम। न जाने क्या पाने में जीना भूल गए हैं हम।। इस भागते हुए जीवन में रफ्तार की राहें ठानी है। मंज़िल का कुछ भी पता नही बस सफर से खींचातानी है।। ये सेल्फी वाली मुस्कान भला कब तक ठहरेगी चेहरों पर। तूफ़ान उठा है मन के भीतर हम तैर रहे हैं लहरों पर।। खाली अंतर्मन की शाम लिए थक कर फूल गए हैं हम। न जाने क्या पाने में जीना भूल गए हैं हम।। वक्त की रफ्तार से हम मनुष्य कदम मिलाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। ऐसे में जीवन तो चल रहा है किंतु जीवन को जीने की जो अनुभूति है वह कोने में खड़ी बेबस झांक रही है।   अंकित

So what are the odds that you are not sleeping while reading this post?

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 विचार बेहद शक्तिशाली होते हैं। एक बार अवचेतन में कोई विचार उत्पन्न हो जाये, तो भले ही कितना भी सही हो अथवा गलत, व्यक्ति की नियति बदलने की पूरी क्षमता रखता है। क्रिस्टोफर नोलान द्वारा निर्देशित और प्राइम तथा नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध फ़िल्म "Inception" कहानी है - व्यक्ति के स्वप्न के माध्यम से उसके अवचेतन में पहुंच कर उसके विचारों से खेलने की।  . किसी मिलिट्री प्रोग्राम के तहत विकसित की गई सपनों में उतरने की इस तकनीक का कॉब डॉम (लियोनार्दो दिकोप्रियो) बड़ा खिलाड़ी है। उसे साइटो नामक एक बिज़नेस टायकून से एक प्रपोजल आता है, जिसके तहत उसे साइटो के व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी के बेटे (किलियन मर्फी) के अवचेतन में एक विचार इम्प्लांट करना है - जिससे मर्फी अपने पिता की व्यापारिक विरासत को बिखेर दे और साइटो ऊर्जा क्षेत्र का एकलौता बादशाह बन जाये। डॉम को अपने घर जाना है, अपने बच्चों से मिलना है पर उस पर कुछ चार्जेज होने के कारण वह अमेरिका में प्रवेश नहीं कर सकता। पर इस काम के एवज में साइटो डॉम की सभी परेशानियां हल कर सकता है इसलिए डॉम अपनी टीम के साथ इस असाध्य कार्य के लिए राजी हो जाता है।  . ऐ...

झकझक

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 कल रात यूँ ही प्राइम स्क्रॉल करते हुए एक फ़िल्म सामने आ गयी - 3000 Years of Longing - निर्देशक के नाम पर नजर पड़ी तो देखा - जार्ज मिलर साहब हैं, जिन्होंने Mad Max - Fury Road जैसी धाकड़ फ़िल्म बनाई थी। बिना सोचे-समझे फ़िल्म को मैंने चला दिया। फ़िल्म एक बार देखने लायक है और बच्चों के लिए नहीं है।  . कहानी में एक स्टोरीटेलर अधेड़ स्त्री "अलिथिया" है, जो किसी कार्यक्रम हेतु इस्तांबुल जाती है। वहाँ से सुवेनियर के तौर पर एक प्राचीन आर्टिफैक्ट खरीदती है, जो वास्तव में जिन्न वाला चिराग होता है। होटल रूम में उस चिराग के टूट जाने पर जिन्न (इदरीस अल्बा) प्रकट होता है, जो अलिथिया की तीन ख्वाहिशें पूरी करना चाहता है।  . अलिथिया उसके हिसाब से बेहद सन्तोषी जीव है। उसे कुछ चाहिए ही नहीं। जिन्न जिद पर है कि इच्छा बताओ क्योंकि पूर्व में चिराग के मालिकों की इच्छा न बता पाने के कारण उसे बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। अलिथिया और जिन्न आपस में सहमत तो नहीं हैं, पर एक चीज दोनों को बेहद पसंद है - किस्से कहानियां सुनना और सुनाना। तो अलिथिया सोच-विचार करने को समय मांगती है। इस बीच जिन्न उसे अपनी कह...

अजीनोमोटो

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अजीनोमोटो को हम इसके रासायनिक  नाम मोनो सोडियम ग्लूटामेट के नाम से भी जानते है !  इसको संक्षिप्त में हम एमएसजी नाम से भी जानते है. .. अजीनोमोटो की कंपनी का मुख्य कार्यालय चोओ,  टोक्यो में स्थित है !  • यह 26 देशों में काम करता है.  इसका इस्तेमाल ज्यादातर चीन की खाद्य पदार्थो में  खाने के स्वाद को बढ़ाने के लिए किया जाता है. ..  👉 पहले हम अधिकांशतः घर पर बने खाने को खाते थे, लेकिन अब लोग चिप्स, पिज्ज़ा और मैगी जैसे खाने को ज्यादा पसंद करने लगे हैं ! जिनमे अजीनोमोटो का इस्तेमाल होता है। इसका इस्तेमाल कई डिब्बाबंद फ़ास्ट फ़ूड सोया सॉस, टोमेटो सॉस, संरक्षित मछली जैसे सभी संरक्षित खाद्य उत्पादों में किया जाता है.    👉अजीनोमोटो को पहली बार 1909 में जापानी जैव रसायनज्ञ किकुनाए इकेडा के द्वारा खोजा गया था। उन्होने इसके स्वाद को मामी के रूप में पहचाना जिसका अर्थ होता है   👉 सुखद स्वाद.  कई जापानी सूप में इसका इस्तेमाल होता है। इसका स्वाद थोडा नमक के जैसा होता है. देखने में यह चमकीले छोटे क्रिस्टल के जैसा होता है। इसमें प्राकृतिक रूप से एमिनो...

आत्मनिर्भर

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 सुरेश और सीमा एक निजी कंपनी में काम करते थे। दोनों को ईश्वर की कृपा से दो प्यारे बच्चे मिले थे—बेटी आरू, जो 12 साल की थी, और बेटा चिंटू, जो 9 साल का था। उनका जीवन सामान्य चल रहा था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, परिवार में थोड़ी दरारें आने लगीं। सुरेश के माता-पिता उनके साथ ही रहते थे। पहले सबकुछ ठीक था, लेकिन धीरे-धीरे, सीमा को सास-ससुर की छोटी-छोटी बातों पर टोका-टोकी परेशान करने लगी। सीमा की सोच थी कि वह खुद पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर महिला है और उसे किसी की दखलअंदाजी पसंद नहीं। शुरू में उसने ये बातें सुरेश को बताईं, पर सुरेश के माता-पिता उसे हमेशा सही सलाह देने की कोशिश करते। एक दिन सास-ससुर से बहस इतनी बढ़ गई कि सीमा ने अलग घर में रहने का निर्णय लिया। सुरेश के माता-पिता ने भी अपने बेटे को मुश्किल में न डालते हुए कहा, "तुम्हारी खुशी में हमारी खुशी है। अगर तुम अलग रहना चाहते हो तो हम पीछे नहीं हटेंगे।" और इस तरह सुरेश और सीमा अपने नए मकान में शिफ्ट हो गए। अब जब वे अलग रहने लगे, सीमा को शुरू में बहुत अच्छा लगा। उसे लगा कि अब कोई भी उसकी निजी जिंदगी में हस्तक्षेप नहीं करेगा। लेक...
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 मेहमान क्यों नहीं आते ,,, ? एक वक्त था,जब मेहमान दो दो ,तीन तीन महीने घर में रह कर जाते थे, अब वो मेहमान क्यों नहीं आते ,,,! सोच सिकुड़ गई , रिश्ते बिगड़ गए ,लोग खुदगर्ज हो गए,, भाई भाई का नहीं , बहन बहन की नहीं ,,,  क्या इसे तरक्की कहते हैं , मेरी समझ में तो ऐसी तरक्की नहीं आती ।। कहते हैं ___ " मेहमान भगवान होता ,, यह हकीकत है कि मेहमान के साथ घर में बरकत आती है , और मेहमान अपने पैरों के साथ घर की परेशानियां ले जाता है ।" इतना अच्छा होने पर भी लोग मेहमान के आने से परेशान होते हैं । सोच बदलिए और रिश्तों की कद्र कीजिए ,,,,किसी को नहीं पता कौन कब आख़िरी सांस ले ले । किसी के जाने के बाद आंसू बहाने से अच्छा है उससे मिला करिए ,, कुछ खट्टे मीठे ख्याल आपस में बांटा कीजिए ,, हँसा कीजिए ,,, स्वागत कीजिए मेहमान का ,,,,, नही आते तो उन्हें दावत देकर बुलाइए ,,, फिर देखिए ,,,खुशियां ही खुशियां आपके आस पास रहेंगी

पद में क्या रखा है

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 बड़े पद पर जो पहुंच जाते हैं, वे अक्सर विनम्रता दिखाने लगते हैं। तुमने अक्सर देखा होगा--छोटे पद पर लोग ज्यादा उपद्रवी होते हैं। बड़े पद पर लोग कम उपद्रवी हो जाते हैं। क्योंकि अब प्रतिष्ठा हो ही गयी; अब यह मजा भी ले लो साथ में कि हम प्रतिष्ठा से भी मुक्त हैं। हमें यश का कोई लेना-देना नहीं है। तुमने देखा, पुलिस वाला ज्यादा झंझट खड़ी करता है। इंस्पेक्टर थोड़ी कम। पुलिस कमिश्नर और थोड़ी कम। जितने बड़े पद पर होता है आदमी, उतनी कम झंझट करता है। मैंने सुना है : एक अंधा भिखारी राह पर बैठा है। रात है। और राजा और उसके कुछ साथी राह भूल गए है। वे शिकार करने गए थे। उस गांव से गुजर रहे हैं। कोई और तो नहीं है, वह अंधा बैठा है झाड़ के नीचे; अपना एकतारा बजा रहा है। और अंधे के पास उसका एक शिष्य बैठा है। वह उससे एकतारा सीखता है, वह भी संन्यास की मंगल-वेला भिखारी है। दोनों भिखारी हैं। राजा आया और उसने कहा : सूरदास जी! फलां-फलां गांव का रास्ता कहा से जाएगा? फिर वजीर आया और उसने कहा : अंधे! फलां-फलां गांव का रास्ता कहां से जाता है? अंधे ने दोनों को रास्ता बता दिया। पीछे से सिपाही आया; उसने एक रपट लगायी अंधे...

मुसाफ़िर

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 ऊपर वाले ने मुसाफ़िर भेजे। मुसाफ़िरों ने सराय को ठौर मान लिया । ऊपर वाले ने मंच पर कठपुतलियाँ उतारी। कठपुतलियों ने गति को अपनी ताकत माना । भूल गई कि डोर खींचते ही कभी भी खेल खत्म किया जा सकता है ।  ऊपर वाले ने मल्लाहों को दरिया में उतारा । मल्लाह भूल गए कश्ती का लंगर किसी और के हाथ है ।  गजब ये है कि हर रोज कठपुतलियाँ डोर टूटती देख रही है , मल्लाह कश्ती डूबती देख रहे है , मुसाफ़िर सरायखाने से लोगों को जाते देख रहे मगर वे भूल जाते है कि किसी भी समय उनके खेल समाप्ति की घण्टी बज सकती है । हम सब एक दूसरे से हँसकर मिलते है ,बातें करते है ,पिक्स खिंचवाते है। मगर ये बात कोई नही जान पाता है कि भीड़ में किसी के भीतर कितना अकेलापन है । किस बेमनी से कोई कितना झूठा मुस्कुरा रहा है । ईश्वर की दी जिंदगी में दर्द, बिछोह , सपनों और रिश्तों के टूटने का दर्द जीवन के आखरी दिनों तक हमें मिलता रहेगा ।  सबके जीवन में बुरा समय आता है ...बीत भी जाता है.। नई खुशियों पर लोग फिर से धीरे धीरे मुस्काना सीखते है । जिंदगी है.. आगे बढ़ेगी ही । लंबे चले उस बुरे समय की मोबाइल की गैलरी में अपनी ही कि...

क्यों कुबूल है ?

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  सातारा के जंगलों के एक वीरान खंडहर की अंधेरी , तूफानी ,तेज़ बारिश और कड़कड़ाती बिजली से थर्राती रात, जिसमें मस्तानी की जिंदगी कुछ ऐसे ठहर गई है कि भोर की कोई सूरत दूर तक नज़र नहीं आ रही है. ऐसे में निराश दासी मस्तानी से निवेदन करती हुई कहती है कि "लगता नहीं कि तूफान थमेगा .चलिए वापिस चलते हैं बुंदेलखंड और वैसे भी यहां आकर हमें क्या मिला है? पूना गए तो नाचने वालियों के बीच रखा| सातारा में महल के बदले नदी पार यहां रखा है, इस खंडहर में डर लगता है बाई सा , आपने जिनकी कटार से ब्याह किया है वो तो इस रिवाज़ से अंजान हैं और अगर उन्होंने ये रिश्ता कुबूल करने से इंकार कर दिया तो?" मस्तानी इस सवाल पर ज़रा भी विचलित नहीं होती क्योंकि उसे अपने प्रेम की ताकत पर विश्वास है. उसी विश्वास के चलते वे स्वयं ही से शर्त लगा कर कहती हैं कि "हम भी तो देखें अपने इश्क का असर !" और मस्तानी की खुशनसीबी तो देखिए कि तभी अचानक वे शर्त जीत भी जाती हैं जब उन्हें अपने इसी इश्क का असर सामने से आते पेशवा बाजीराव के रूप में दिखाई देता है जब वे इस अंधेरी ,तूफानी रात में उफनती नदी को अपने हौसलों से म...

बिजनेस हो या नौकरी

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  सफल वही हो सकता है,जो प्रोफेशनल हो, इमोशनल व्यक्ति अमूमन असफल हो जाता है अथवा उसे धोखा खाकर पछताना पड़ता है। धंधे अथवा नौकरी में रिश्ते/दोस्ती और व्यवहार/लेन-देन का परस्पर घालमेल कदापि नहीं करना चाहिए अर्थात् रिश्ता/दोस्ती अपनी जगह है, और व्यवहार/लेन-देन अपनी जगह।  मैं इस मामले में अपने एक वरिष्ठ मित्र को अपना आदर्श मानता हूॅं, जो हमेशा कहता है कि चाहे कोई कितना भी घनिष्ठ हो,उसके साथ काम शुरू करने से पहले वेतन तय करो और महीना पूरा होते ही अधिकतम पाॅंच दिन के अंदर मजदूरी ले लो,वरना छठे दिन यह कह दो कि रिचार्ज ख़त्म हो गया है और बिना रिचार्ज मशीन काम नहीं करती। हालाॅंकि विश्वास पर दुनिया टिकी है और अपणायत में एक- दूसरे का विश्वास भी करना पड़ता है,मगर यह भी एक निश्चित सीमा तक ही उचित है, वरना कई बार वक्त के साथ हालात कुछ इस कदर बदलते हैं कि नीयत और रिश्तों के मायने दोनों ही बदल जाते हैं,तब अहसास होता है कि काश! इतना विश्वास न किया होता। समझदारी तो इसी में है कि दोस्ती/ रिश्ते को बरकरार रखते हुए भी लेन-देन/व्यवहार के मामले में स्टैंड क्लीयर रखना चाहिए और यही दोनों पक्षों के हित...

चाचा चौधरी

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 ‘शतरंज चैंपियन गैरी कास्पारोव एक कंप्यूटर से हार गए’ नब्बे के दशक की यह एक बड़ी खबर थी। इसका एक अर्थ यह था कि कंप्यूटर इतने शक्तिशाली हो गए कि मनुष्य के दिमाग पर विजय पाने लगे। आइबीएम कंपनी के कंप्यूटर ‘डीप ब्लू’ ने जब पहली बार 1996 में यह मैच खेला, तो पहले ही खेल में उन्हें मात दी। लेकिन उसके बाद हुए पाँच खेलों में चार कास्पारोव जीत गए।  अगले वर्ष ‘डीप ब्लू’ पूरी तैयारी के साथ आयी। न्यूयार्क के इस आयोजन पर पूरी दुनिया की नज़र थी। यह क़यास लग रहे थे कि कास्पारोव को हराना कंप्यूटर के बस नहीं। पहला मैच कास्पारोव आसानी से जीत गए, तो यह क़यास पक्का होने लगा। लेकिन अगले ही मैच में कास्पारोव को हार मिली। उसके बाद के तीन मैच ड्रॉ रहे। खेल अभी 2.5-2.5 की बराबरी पर था। छठा मैच निर्णायक था। कास्पारोव अब थक चुके थे। उन्हें यह लगने लगा था कि मशीन वाकई ठीक-ठीक ताक़तवर बन चुकी है। आखिर इस तनाव भरे खेल में कास्पारोव हार गए।  हालाँकि यह कंप्यूटर आम कंप्यूटरों से कई कदम आगे था। वरना साधारण कंप्यूटर को तो मेरे जैसे लोग भी अक्सर मात कर दिया करते थे। कास्पारोव को हराने के लिए दर्जनों कंप्यू...

सनातन कथा

 गैलीलियो ने कहा था कि न कोई सूर्यास्त होता है, न कोई सूर्योदय। धारणा यह थी कि सूरज चक्कर लगाता है पृथ्वी के। और गैलीलियो ने कहा कि पृथ्वी चक्कर लगाती है सूरज के। बात ही बदल दी। सारी दुनिया मानती थी एक बात और गैलीलियो ने लिखी दूसरी ही बात। महा निंदा हुई। कैथलिक पोप ने उसे रोम बुलाया और कहा, तुम माफी मांग लो। वह बूढ़ा हो चुका था--पचहत्तर साल का हो चुका था। बीमार था, बिस्तर से उसे घसीट कर लाया गया और कहा कि तुम क्षमा मांग लो, अन्यथा मरने के लिए तैयार हो जाओ। गैलीलियो बड़ा समझदार आदमी रहा होगा। बहुत कम लोगों ने उसकी समझदारी की प्रशंसा की है। लोग समझते हैं वह कायर था, क्योंकि उसने क्षमा मांग ली। मैं ऐसा नहीं समझता, क्योंकि क्षमा उसने इस ढंग से मांगी कि वह कायरता नहीं बताती। वह उस आदमी की समझदारी बताती है। और वह उस आदमी की इतनी गहरी समझदारी बताती है कि पोप और उनका पूरा का पूरा मंडल जो निर्णायक बना बैठा था, उसकी मूर्खता सिद्ध होती है। गैलीलियो ने कहा कि आप कहें तो अभी क्षमा मांग लूं। मुझे क्या अड़चन है! अरे, मुझे लेना-देना क्या! मैं लिख दूंगा अपनी किताब में कि पृथ्वी चक्कर नहीं लगाती, सूरज ...

कमाल

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 फ्रांस में एक तैराक हुए, जेवियर! फ्रांस के लिए उन्होंने ओलंपिक तक खेला। उन्हें फ्रांस के अच्छे तैराकों में गिना जाता रहा है। पर जेवियर दुर्भाग्यशाली थे, उन्हें ओलंपिक में स्वर्ण पदक नहीं मिला।       जेवियर की पत्नी भी तैराक हैं, उन्होंने भी फ्रांस के लिए ओलंपिक में भाग लिया है। पर मैडल उनके भाग्य में भी नहीं। सम्भव है कि वे दुर्भाग्यशाली हों, या उनमें गोल्ड जीतने लायक प्रतिभा न हो।        एक ओलंपिक में जेवियर उस माइकल फेलेप्स के साथ भी तैरे थे, जो ओलंपिक का बादशाह है। जिसके पास सबसे अधिक पदक हैं। फेलेप्स के आगे तो उन्हें हारना ही था, वे हार गए।       जेवियर के मन मे वह हार बैठ गयी। वह हार उसे हमेशा दर्द देती रही, तड़पाती रही। पर करते क्या? उन्हें यह बात तो समझ आ गयी थी कि उनमें उतनी प्रतिभा नहीं जो ओलंपिक में अपना राष्ट्रगान बजवा सकें। जेवियर ने अपनी उम्मीदों को अपने बेटे में ढूंढना शुरू किया।       उनके लड़के में भी प्रतिभा थी। आखिर उसके माता-पिता ओलंपियन थे। जेवियर पति पत्नी अपने बच्चे के पीछे कड़ी मेहनत करने लगे। लड़क...

पापा की औकात

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 पाँच दिन की छूट्टियाँ बिता कर जब ससुराल पहुँची तो पति घर के सामने स्वागत में खड़े थे। अंदर प्रवेश किया तो छोटे से गैराज में चमचमाती गाड़ी खड़ी थी स्विफ्ट डिजायर! मैंने आँखों ही आँखों से पति से प्रश्न किया तो उन्होंने गाड़ी की चाबियाँ थमाकर कहा:-"कल से तुम इस गाड़ी में कॉलेज जाओगी प्रोफेसर साहिबा!" "ओह माय गॉड!!'' ख़ुशी इतनी थी कि मुँह से और कुछ निकला ही नही। बस जोश और भावावेश में मैंने तहसीलदार साहब को एक जोरदार झप्पी देदी और अमरबेल की तरह उनसे लिपट गई। उनका गिफ्ट देने का तरीका भी अजीब हुआ करता है। सब कुछ चुपचाप और अचानक!! खुद के पास पुरानी इंडिगो है और मेरे लिए और भी महंगी खरीद लाए। 6 साल की शादीशुदा जिंदगी में इस आदमी ने न जाने कितने गिफ्ट दिए। गिनती करती हूँ तो थक जाती हूँ। ईमानदार है रिश्वत नही लेते । मग़र खर्चीले इतने कि उधार के पैसे लाकर गिफ्ट खरीद लाते है। लम्बी सी झप्पी के बाद मैं अलग हुई तो गाडी का निरक्षण करने लगी। मेरा फसन्दीदा कलर था। बहुत सुंदर थी।  फिर नजर उस जगह गई जहाँ मेरी स्कूटी खड़ी रहती थी। हठात! वो जगह तो खाली थी।  "स्कूटी कहाँ है?" मैंने ...

Pity Life

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 In December 1937, during a football match at Stamford Bridge in London between Chelsea FC and Charlton FC, the game was abandoned in the 60th minute due to heavy fog.  Unfortunately, Charlton FC goalkeeper Sam Bartram was unaware that the match had been stopped and continued to guard his goal for another fifteen minutes. He did not hear the referee's whistle because of the noise from the crowd behind him. Believing that his teammates were attacking the opposing goal, he stood with outstretched arms, fully focused on protecting his goal amidst the dense fog. It was only fifteen minutes later when the field police approached him and informed him that the match had been abandoned fifteen minutes earlier. Sam Bartram, deeply saddened by this, famously said: " HOW SAD THAT MY FRIENDS FORGOT ME WHEN I WAS GUARDING THEIR GATE." Life's game is much like this. We diligently and supportively guard the goals of many around us, but when the situation becomes foggy, some may aba ...

दोगले रिश्ते

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  बेटी से बहु बनना आसान था पर अब बहु से बेटी नहीं बना जाता जिस ससुर से पर्दा किया उम्र भर बीमारी में उसका बदन नही छुआ जाता जिस सास के ताने सुन सुन उमर गुजरी  उसका गिरगिट रूप ना देखा जाता  खुद के बनाए कानून ही बिसरा दिए  लक्ष्मण रेखा भी स्वार्थों ने मिटा दी   बेटी ही थी, बहु तुमने ही बनाया था बहु बेटी का फर्क भी समझाया था जेठ, ससुर से पर्दा करवाया था मायके ससुराल का फ़र्क सिखाया था पर आज जब लाचार हो कहानी क्यों बदल गई बहु फिर बेटी कैसे बन गई सारी पर्दादारी ही हट गई उफ़ कैसे ये दोगले रिश्ते है जो स्वार्थ से टूटते,बनते हैं हम जैसे तो समझ कर भी   नहीं समझ सकते है

रेणु जी

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रेणु जी एक डिग्री कालेज की प्रिन्सिपल हैं। आज डिग्री कालेज में प्रतियोगिता है। हर साल रेणु जी प्रतियोगिता रखती है जो कि हर बार ही कुछ अलग होती है। इस साल भी किसी को नहीं पता कि प्रतियोगिता में क्या होने वाला है। मैदान बच्चों और अध्यापकों से खचाखच भरा हुआ है।  रेणु जी ने माइक पर आकर प्रतियोगिता के प्रारम्भ की घोषणा की। मैदान के एक छोर पर दस स्कूटी खड़ी कर दी गयी।  ’’आज होने वाली प्रतियोगिता में बच्चों के साथ साथ अध्यापक भी भाग ले सकते हैं। आपको ये स्कूटी चलाकर फिनिश लाइन तक ले जानी है, न तो खुद को चोट लगानी है और न ही किसी और को।’’ रेणु जी मुस्कुराते हुये माइक पर बोली।  कुछ लड़कियों ने तो मना कर दिया क्योंकि उन्हे स्कूटी चलानी ही नहीं आती थी। कुछ लड़कियों ने किसी प्रशिक्षित चालक की तरह स्कूटी फिनिश लाइन तक चुटकियों में पहुंचा दी। एक दो लड़कियाॅं नौसिखिया थी तो रास्ते में ही गिर गयी फिर भी उन्होने कोशिश की। कुछ लड़कियाॅं बड़ी सावधानी से पैर लटका कर ब्रेक मार मार कर फिनिश लाइन तक पहुंची जिसमें एक लड़की फिनिश लाइन में ब्रेक नहीं लगा पायी और सामने लगे पेड़ से जाकर टकरा गयी। अब लड़कों ...

चुप-चुप

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 आई .सी. यू.के दरवाज़े के बाहर खड़े लोगों का दुनिया से रिश्ता टूट जाता है । हॉस्पिटल के दरों दीवार, कम्पाउडर , नर्स , गार्ड ,डॉक्टर , कमरों के ऊपर लिखे विशेषज्ञ विभागों के नाम उनकी नई दुनिया है । दवाइयों की पर्ची, टेस्ट रिपोर्ट उनके नए अलंकार है ।  चारों तरफ व्हील चेयर , स्ट्रेचर के साथ-साथ चलते अपने जैसे ढेरों लोग। सूनी आँखों से डॉक्टर का इंतज़ार करते व्हीलचेयर पर बैठे है अपने ही पेशाब की थैली पकड़े लोग । नाक से निकले लम्बे पाइप से बेखबर  मुँह खोले शून्य में निहारतें दूसरी दुनिया के लोग । इस दुनिया में आने के बाद उनके नए नाम "पेशेंट" है । फिनाइल से गमकते गलियारों में रोबोट से आते जाते लोग । स्कूल के बाद यहाँ की दुनिया में फिर एक बार यूनिफार्म पहने लोग दिख रहे । दवाओं से गंधाती हवा में टहलते बेचैन लोग । किसी डॉक्टर ने चेक नही किया कि आक्सीजन मास्क लगे मरीज से ज्यादा तेज चल रही है बाहर खड़े लोगों की धड़कनें । लाखों का बिल जमा कर चाय के पैसे बचाने हॉस्पिटल के सामने की टपरी में 10 रुपये की चाय पीते लोग । डॉक्टरों के नाम  दो के पहाड़े की तरह याद है। महामृत्युंजय मंत्र उच्चारत...

कभी-कभी कुछ रिश्तों में

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 "कभी-कभी कुछ रिश्तों में " उन्हें ख़फ़ा हो फासलें बनाना और , मेरी गरज उन्हें कसकर थामना है .... .उन्हें मेरी खामियाँ सरेआम करना है , मुझे अपनी खताओं पर विचारना है मेरे हिस्से  सफाई देना , पछताना , मनाना , उदासी, अकेलापन, माफ़ीनामा, अपेक्षाओं का ऊँचा कटघरा है ..... उनके हिस्से नाराज़गी सवालों की फ़ेहरिश्त , फैसला , और हक़बाजी का एक-एक ककहरा है ...... मेरी झोली में  हुक्मरानी , दरख़्वास्त , सिफारिशें , जी हजूरी , इल्ज़ाम और उनकी दराज़ में खारिज़नामा है..... उनकी फितरत जज्बातों को  चूर चूर बिखेरना , तो मेरी आदत टुकड़ों को  चुन चुन समेटना है...... उनके पलड़े में तमगे ,  गुरुर , शिकायत है ।  मेरे दामन में  फिक्र ,  तन्हाई और  उनसे मिलने वाली  जमानत है .......

सार्वजनिक जीवन मे मर्यादा

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 सार्वजनिक जीवन में मर्यादा से रहें जिस प्रकार किसी को मनचाही स्पीड में गाड़ी चलाने का अधिकार नहीं है, क्योंकि रोड सार्वजनिक है। ठीक उसी प्रकार किसी भी लड़की को मनचाही अर्धनग्नता युक्त वस्त्र पहनने का अधिकार नहीं है क्योंकि जीवन सार्वजनिक है। एकांत रोड में स्पीड चलाओ, एकांत जगह में अर्द्धनग्न रहो। मगर सार्वजनिक जीवन में नियम मानने पड़ते हैं। भोजन जब स्वयं के पेट मे जा रहा हो तो केवल स्वयं की रुचि अनुसार बनेगा, लेकिन जब वह भोजन परिवार खायेगा तो सबकी रुचि व मान्यता देखनी पड़ेगी। लड़कियों का अर्धनग्न वस्त्र पहनने का मुद्दा उठाना उतना ही जरूरी है, जितना लड़को का शराब पीकर गाड़ी चलाने का मुद्दा उठाना जरूरी है। दोनों में एक्सीडेंट होगा ही।  अपनी इच्छा केवल घर की चहारदीवारी में उचित है। घर से बाहर सार्वजनिक जीवन मे कदम रखते ही सामाजिक मर्यादा लड़का हो या लड़की उसे रखनी ही होगी।  घूंघट और बुर्का जितना गलत है, उतना ही गलत अर्धनग्नता युक्त वस्त्र गलत है। बड़ी उम्र की लड़कियों का बच्चों की सी फ़टी निक्कर पहनकर छोटी टॉप पहनकर फैशन के नाम पर घूमना भारतीय संस्कृति का अंग नहीं है। जीवन भी गिटार या ...

यादें_बचपन_की

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 स्कूल के इंटरवेल में टिफिन खुलते ही आम के अचार की महक से क्लास भर जाती थी, जो बच्चा टिफिन में सब्जी लाया होता था वह भी अचार के लिए मचल उठता था…☺️ हमारे समय में स्कूल के टिफिन का मेन्यू आम या मिर्च के अचार के साथ परांठे हुआ करते थे, आम के अचार को तृप्ति के अंतिम छोर तक चूस-चूस कर खाने वाले बच्चे हमारे जमाने में ही मिलते थे। एक ही मेन्यू लगभग रोज रिपीट होता… लेकिन जो संतुष्टि और आनंद उन परांठों और अचार में मिलता, यकीन मानिए दस पकवानों में भी वह आनंद नहीं था, इस अचार और परांठे को खाकर भी हम स्वस्थ और तंदुरुस्त रहते, डॉक्टर्स के यहाँ तो कभी साल दो साल में गए हो तो गए हो वरना हम सब मस्त कलंदर और थोड़े बंदर… अब तो स्कूल के टिफिन में अचार ले जाना ही मना हैं, स्कूल की तरफ से डाइट चार्ट जैसे सेट है और मम्मियों की हर रात यही सोचने में सेट है कि सुबह टिफिन के लिए क्या स्पेशल बनाएं…🥹

Raise girls rich, Raise boys poor"

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 मर्द केवल negativity के माध्यम से ही अच्छे इंसान बनते हैं, महिलाएं वास्तव में इसके विपरीत हैं। जो पुरुष बहुत अधिक दर्द से गुज़रे हैं वो बहुत दयालु होते हैं। सबसे बड़े गुंडे, हत्यारे और दुष्ट लोग कभी-कभी सबसे दयालु हो सकते हैं। जब महिलाएं बहुत अधिक दर्द से गुजरती हैं तो वो कड़वी, बुरी और मतलबी हो जाती हैं और दयालु नहीं बनतीं, मर्द बहुत अधिक दर्द दुःख तकलीफ़ से दयालु बन जाते हैं। एक पुरानी chinese कहावत है "Raise girls rich, Raise boys poor" अपनी बेटी को अपनी क्षमतानुसार बिगाड़ो उसे princess की तरह रखो हमेशा,फिर जब वो एक साथी की तलाश में होती है तो वो उसे चुन सकती है जो उसकी तुम्हारी तरह देखभाल कर सके। दूसरी ओर अपने बेटों को कुछ मत दो, उन्हें जीवन में हर चीज़ के लिए काम करने दो, That's how they can become a r eal man.
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 सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है  अपने जीवन में जो सपना देखा था  वो सिर्फ सपना ही बनकर रह गई है  ऐसा दर्द मिली जिसे मैं साझा न कर सका  सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है। छोटे से बड़े और फिर बूढ़े होने के सफर में  कितने ही रिश्ते नाते तोड़ जाते है हम मन में उठी तर्क वितर्क ने मुझे घायल कर दिया  सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है । कभी हुआ करती थी वास्तविक मुस्कुराना वो दिन न जाने अब कहां खो गया  जीतने की अंधी दौड़ में हार रही है इंसानियत सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है। ये जिंदगी तू मुझे बस इतना ही बता दें  और कितने रंग दिखायेगी जीवन में  वर्तमान का दौड़ बड़ा विचित्र है  सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है। मत करना ऐसी कोई भी आस सज्जनों जिसे तुम कभी पा न सकों  मेहनत छोड़ लोग चापलूसी में लगे हुए है  सावन आने से पहले ही मेरी आंखें सावन बन गई है। स्वयंभू भगवान बनने की कोशिश में  आज कितना बदल रहा है इंसान सभी के दिल में पल रहें है नफरत के बीज सावन आने से पहले ही मेर...