काशी विश्वनाथ-| प्रेम गली
| मैं कई गलियों से होकर गुजरा तुम्हें खोजते ---- ---तृष्णा गली --सूरत गली ---समाज गली ---तिरस्कार गली ---कुण्ठा गली ---धोखा गली ---दुःख गली ---झगड़ा गली ---तंज गली ---दंश गली ---खीज गली पर तुम कहीं न मिली --- ---मैं तुम्हें ढूँढते-ढूँढते तुम्हारी कूक का इन्तजार करते थक गया आखिर मैं उस गली में जा घुसा---- ---जिससे मेरा दूर-दूर का खासकर प्रेम का कोई रिश्ता नहीं था और आश्चर्य---------- ! तुम वहीँ मेरा इन्तजार करतीं --- ---मुस्कुरातीं---स्वागत में आगत खड़ी मिलीं न जाने तुम कब से यहीं रहतीं थीं यह तुम्हारा स्थाई पता था ---जो मुझे नहीं पता था इसलिए मेरा हर सन्देश ---हर चिट्ठी भटककर लौट आती थी हाय ! मैं इस प्रेम गली में पहले क्यों नहीं घुसा ! प्रिये ! तुम्हारी यह प्रेम गली तो बहुत खूबसूरत अपनत्व भरी ख़ुशी-ख़ुशी रहने लायक गली है !...