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Showing posts from July, 2020

काशी विश्वनाथ-| प्रेम गली

| मैं कई गलियों से होकर गुजरा  तुम्हें खोजते ---- ---तृष्णा गली  --सूरत गली ---समाज गली ---तिरस्कार गली  ---कुण्ठा गली    ---धोखा गली  ---दुःख गली  ---झगड़ा गली  ---तंज गली  ---दंश गली  ---खीज गली   पर तुम कहीं न मिली --- ---मैं तुम्हें ढूँढते-ढूँढते      तुम्हारी कूक का इन्तजार करते                 थक गया  आखिर मैं उस गली में जा घुसा---- ---जिससे मेरा दूर-दूर का     खासकर प्रेम का कोई रिश्ता       नहीं था और आश्चर्य---------- ! तुम वहीँ मेरा इन्तजार करतीं --- ---मुस्कुरातीं---स्वागत में आगत खड़ी मिलीं न जाने तुम  कब से यहीं रहतीं थीं   यह तुम्हारा स्थाई पता था ---जो मुझे नहीं पता था  इसलिए मेरा हर सन्देश ---हर चिट्ठी  भटककर लौट आती थी  हाय ! मैं इस प्रेम गली में पहले क्यों नहीं घुसा ! प्रिये ! तुम्हारी यह प्रेम गली तो  बहुत खूबसूरत  अपनत्व भरी   ख़ुशी-ख़ुशी रहने लायक  गली है !...

मदारी-जब तक ये संसार नचाए, झूम झूम के नाचे जा ।

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मदारी की भी तो कुछ मजबूरियां रही होंगी ... वर्ना कौन अपना वक्त जाया कर के मुझे इस कदर नचाता ... ~ अब जब मदारी जिस रोज घर से बाहर नहीं निकलता है , उस रोज मै भयभीत हो जाता हूं । आज ना वो मुझे नचाएगा और ना ही मेरे नाचने पर चंद सिक्के आएंगे ...फिर भोजन कहां से आएगा ?  देर सुबह मै उसके पैर झकझोरता हूं - उठो , जागो अब देर हो रही । तुम्हे कमाने जाना है और मुझे नाचने । अब यही बंधन अच्छा लगता है । बंधन तो है लेकिन दो वक़्त की रोटी भी तो मिलती है । हां , मदारी जब अपने बड़े एल्युमिनियम के कटोरे से कुछ कुछ निकाल खाता है । मै भी वहीं बैठा रहता हूं - अब मुझे भी कुछ मिल जाएगा । देह हाथ कि थकान खत्म हो जाती है जब अंत में वो अपने झोले से केला निकालता है ।  कभी कभी मन करता है - भाग जाऊं , वापस लौट जाऊं अपने झुंड में । फिर अपने झुंड में अपनों को किस्से सुनाऊं - शहर के मदारी का खेल और उस खेल से निकले दो वक़्त की रोटी का ।  कौन सुनेगा उस झुंड में मेरे किस्से ... वो तो अपनी दुनिया में मस्त होंगे ...एक टहनी से दूसरी टहनी ...अपनी प्रकृति के संग ...अपनी दुनिया में मस्त ... या फिर मै ही फंस गया या...

आसान नहीं होता प्रतिभाशाली स्त्री से प्रेम करना

आसान नहीं होता प्रतिभाशाली स्त्री से प्रेम करना, क्योंकि उसे पसंद नहीं होती जी हुजूरी, झुकती नहीं वो कभी जबतक न हो रिश्तों में प्रेम की भावना।  तुम्हारी हर हाँ में हाँ और न में न कहना वो नहीं जानती, क्योंकि उसने सीखा ही नहीं झूठ की डोर में रिश्तों को बाँधना। वो नहीं जानती स्वांग की चाशनी में डुबोकर अपनी बात मनवाना, वो तो जानती है बेबाक़ी से सच बोल जाना।  फ़िज़ूल की बहस में पड़ना उसकी आदतों में शुमार नहीं,  लेकिन वो जानती है तर्क के साथ अपनी बात रखना। वो क्षण-क्षण गहने- कपड़ों की माँग नहीं किया करती, वो तो सँवारती है स्वयं को अपने आत्मविश्वास से, निखारती है अपना व्यक्तित्व मासूमियत भरी मुस्कान से। तुम्हारी गलतियों पर तुम्हें टोकती है, तो तकलीफ़ में तुम्हें सँभालती भी है। उसे घर सँभालना बख़ूबी आता है, तो अपने सपनों को पूरा करना भी।  अगर नहीं आता तो किसी की अनर्गल बातों को मान लेना।  पौरुष के आगे वो नतमस्तक नहीं होती, झुकती है तो तुम्हारे निःस्वार्थ प्रेम के आगे। और इस प्रेम की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है। हौसला हो निभाने का तभी ऐसी स्त्र...

गमले के पौधे और जमीन के पौधे में बहुत फ़र्क होता है,

#बाज़🦅🦅 आज ये तस्वीर देखते ही साझा करने की इच्छा कर गई। बाज पक्षी जिसे हम ईगल या शाहीन भी कहते है। जिस उम्र में बाकी परिंदों के बच्चे चिचियाना सीखते है उस उम्र में एक मादा बाज अपने चूजे को पंजे में दबोच कर सबसे ऊंचा उड़ जाती है। पक्षियों की दुनिया में ऐसी Tough and tight training किसी और की नही होती। मादा बाज अपने चूजे को लेकर लगभग 12 Km ऊपर ले जाती है। जितने ऊपर अमूमन हवाई जहाज उड़ा करते हैं और वह दूरी तय करने में मादा बाज 7 से 9 मिनट का समय लेती है। यहां से शुरू होती है उस नन्हें चूजे की कठिन परीक्षा। उसे अब यहां बताया जाएगा कि तू किस लिए पैदा हुआ है ? तेरी दुनिया क्या है ? तेरी ऊंचाई क्या है ? तेरा धर्म बहुत ऊंचा है और फिर मादा बाज उसे अपने पंजों से छोड़ देती है। धरती की ओर ऊपर से नीचे आते वक्त लगभग 2 Km उस चूजे को आभास ही नहीं होता कि उसके साथ क्या हो रहा है। 7 Kmt. के अंतराल के आने के बाद उस चूजे के पंख जो कंजाइन से जकड़े होते है, वह खुलने लगते हैं। लगभग 9 Kmt. आने के बाद उनके पंख पूरे खुल जाते है। यह जीवन का पहला दौर होता है जब बाज का बच्चा पंख फड़फड़ाता है। अब धरती से ...

*ये तेरा घर, ये मेरा घर*

 "उफ़! पापा जी आपने पूरा घर ही गन्दा कर दिया| अभी अभी राधा ने पोछा मारा था और आपने चप्पलों के निशान छोड़ दिए| थोड़ी तो समझ होनी चाहिए आपको? आप बच्चे तो हैं नहीं"|  बहू रिया के मुँह से ये शब्द सुनकर अनिल जी हतप्रभ से खड़े रह गए| कैसे पुलिस की नौकरी में सिर्फ उनकी एक आवाज बड़े से बड़े मुजरिमों को हिला कर रख देती थी और आज उनकी बहू उन्ही के घर में इतना सुना रही है| तभी पत्नी  ने उन्हे सोफे पर बैठाते हुए कहा "कोई बात नहीं जी, बहू की बातों का क्या बुरा मानना? बस जुबान की तेज है, बाकी उसके मन में ऐसा कुछ नहीं है|"  अनिल जी ने पत्नी की आँखों में देखा जैसे पूछ रहे हों "सच में?" और फीकी सी हंसी उनके होठों पर तैर गई, लेकिन आँखों के कोर थोड़े से नम हो गये।  सोफ़े पर बैठे बैठे ही सोचने लगे कितने जतन से इस घर को खड़ा किया था| एक एक तिनका अपने हिसाब से रखवाया था इस घरौंदे का ताकि सेवा अवकाश के बाद पति पत्नी सुविधाओं के साथ आराम से रहेंगे| लेकिन आज सारी दुनिया उनके कमरे तक सिमट गई है| कमरे से बाहर निकलो तो कितना कुछ सुनना पड़ता था उन्हे, हॉल के अंदर फ़ायर पिट बनवाया ...

" मुझे अच्छा नही लगता "

पूरी उम्र ससुराल में गुजारी मैंने  फिर भी मायके से कफ़न मंगाना मुझे अच्छा नहीं लगता रूपाली टंडन जी की  लिखी है कविता मुझे बहुत पसंद आई इसीलिए आप सबसे शेयर कर रह हू शादीशुदा महिलाओ को कुछ बाते अचछी नहीं लगती,  पर वे किसी से कहती नहीं|उन्ही एहसासों को इकट्ठा करके एक कविता लिखी है|   "  मुझे अच्छा नही लगता " मैं रोज़ खाना पकाती हू,  तुम्हे बहुत पयार से खिलाती हूं,  पर तुम्हारे जूठे बर्तन उठाना  मुझे अच्छा नही लगता|  कई वर्षो से हम तुम साथ रहते है,  लाज़िम है कि कुछ मतभेद तो होगे,  पर तुम्हारा बच्चों के सामने चिल्लाना मुझे अच्छा नही लगता|  हम दोनों को ही जब किसी फंक्शन मे जाना हो,  तुम्हारा पहले कार मे बैठ कर यू हार्न बजाना  मुझे अच्छा नही लगता|  जब मै शाम को काम से थक कर घर वापिस आती हू,  तुम्हारा गीला तौलिया बिस्तर से उठाना  मुझे अच्छा नही लगता|  माना कि तुम्हारी महबूबा थी वह कई बरसों पहले,  पर अब उससे तुम्हारा घंटों बतियाना  मुझे अच्छा नही लगता|  माना कि अब ...

आसान नहीं है पुरुष होना भी....

आसान नहीं है पुरुष होना भी.... जो कभी पत्नी की ख्वाहिश, और! कभी बच्चों की जिद में, हर रोज खुद को खर्च करता है। कभी माँ के ताने? कभी पिता के डांट से, खामोश हो जाता है। पर दिमाग से हर रोज, जब वो खुद से लड़ता है। उसका कोई हिसाब नहीं होता! आसान नहीं है पुरूष होना भी.... कभी बेहिसाब सी ख्वाहिशें, कभी एहसासों का कत्ल करना। आने वाले कल की चिंता करना। पर मुस्कुराते हुये घर मे घुसना। मै हू ना! ये कहते हुए? पसीने की हर बूंद में बिकना। सब के हिसाब का जवाब देना। पर खुद सवालों में उलझा रहना! हाँ! आसान नहीं है पुरुष होना भी...

एक_princess_कि_कहानि

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पत्नी अपने पति से कहती है... पत्नी- पता नहीं क्या हो गया है हमारी पायल को, कल रात को खाना भी नहीं खाया, और रो भी रही थी...अभी सुबह जगाने गई तो फिर से रो रही थी...वजह पूछी तो, बस इतना कही की...#PLEASE माँ...मुझे अकेला छोड़ दो.. मुझे लगता है की शायद उसे कीसी ने प्यार में धोखा दिया है। डर लगता है कहीं वह खुद को नुकसान न पहुँचाये। पति- थोड़ी खामोशी के बाद कहता है...ठीक है मैं देखता हूँ। इतना कहकर वह अपने बेटी के कमरे में जाते हैं । पिता- #HI_PAYAL...कैसी हो बेटा? बेटी- #PLEASE_PAPA..मुझे कुछ दिनों के लिए अकेला छोड़ दीजिए। पिता- ठीक है बेटा...मगर एक शर्त है? बेटी - बोलिए । पिता- बस तुम्हें एक बकवास कहानी सुनाना चाहता हूँ तुम सुन लो. फिर हम तुम्हें #Disturb नहीं करेंगे..#ok? बेटी- ठीक है सुनाइये। पिता- आज से करीब 20 साल पहले एक राजा हुआ करते थे...बेहद अमीर । उनके दो बेटे थे...बड़ा बेटा बेहद आज्ञाकारी और इमान्दार था। उस राजा को अपने बड़े बेटे पर नाज था। उसकी शादी एक खूबसूरत लड़की से कर दी गईं। फिर वह खूबसूरत लड़की( राजा की बड़ी बहू) गर्भवती हुई। घर मे खुशीयां ही खुशियाँ छा ...

मूर्ख आदमी मकान बनवाता है, बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है, मैं मकान लेकर कहीं जाऊंगा थोड़े ही

कल अपनी पुरानी सोसाइटी में गया था। वहां मैं जब भी जाता हूं, मेरी कोशिश होती है कि अधिक से अधिक लोगों से मुलाकात हो जाए। कल अपनी पुरानी सोसाइटी में पहुंच कर गार्ड से बात कर रहा था कि और क्या हाल है आप लोगों का, तभी मोटरसाइकिल पर एक आदमी आया और उसने झुक कर प्रणाम किया। *“भैया, प्रणाम।”* मैंने पहचानने की कोशिश की। बहुत पहचाना-पहचाना लग रहा था। पर नाम याद नहीं आ रहा था। उसी ने कहा, *"भैया पहचाने नहीं? हम बाबू हैं, बाबू। उधर वाली आंटीजी के घर काम करते थे।"* मैंने पहचान लिया। अरे ये तो बाबू है। सी ब्लॉक वाली आंटीजी का नौकर। *“अरे बाबू, तुम तो बहुत तंदुरुस्त हो गए हो। आंटी कैसी हैं?”* बाबू हंसा, *“आंटी तो गईं।”* *“गईं? कहां गईं? उनका बेटा विदेश में था, वहीं चली गईं क्या? ठीक ही किया, उन्होंने। यहां अकेले रहने का क्या मतलब था?”* अब बाबू थोड़ा गंभीर हुआ। उसने हंसना रोक कर कहा, *“भैया, आंटीजी भगवान जी के पास चली गईं।”* *“भगवान जी के पास? ओह! कब?”* बाबू ने धीरे से कहा, *“दो महीने हो गए।”* *“क्या हुआ था आंटी को?”* *“कुछ नहीं। बुढ़ापा ही बीमारी थी। उनका ब...

हज़ार राहें, मुड़के देखीं

Hazaar Rahein Mud Ke Dekhi Hindi Lyrics from movie Thodisi Bewafaii, sung by Kishor Kumar, Lata Mangeshkar, music composed by Khayyam, lyrics penned by Gulzar (for this song Gulzar has won Filmfare’s Best Lyricist Award & Kishor Kumar has won Filmfare’s Best Male Playback Award for the year 1980). Movie: Thodisi Bewafaii (1980)  हज़ार राहें, मुड़के देखीं कहीं से कोई सदा न आई बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गये थे जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गये थे वो मोड़ अब भी वही खड़े हैं हम अपने पैरों में जाने कितने हम अपने पैरों में जाने कितने भंवर लपेटे हुए खड़े हैं बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई कहीं किसी रोज़ यूं भी होता कहीं किसी रोज़ यूं भी होता हमारी हालत तुम्हारी होती जो रातें हमने गुज़ारी मरके जो रातें हमने गुज़ारी मरके वो रात तुमने गुज़ारी होतीं बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई तुम्हें ये ज़िद थी के हम बुलाते हमें ये उम्मीद वो पुकारें है नाम होंठों पे अब भी लेकिन आवाज़ में पड़ गई दरारें हज़ार राहें, ...

कबाड़

सुरभि के पति का ट्रांसफर नऐ शहर में होने पर, घर व्यवस्थित करने में एक सप्ताह का समय लग गया।पड़ोसी सिन्हा जी के यहाँ से चाय नाश्ता भी आया था,पर मुलाकात नहीं हो सकी। आज सुरभि मिलने और धन्यवाद देने के लिए उनके घर गई। स्वागत पामेरियन डाग ने किया। आलीशान घर,मंहगे फर्नीचर विलासिता की सारी वस्तुएं उनके शानो शौकत को बयान कर रही थीं।सिन्हा साब इंजीनियर जो हैं। "टॉमी ने आपको परेशान तो नहीं किया।" "नहीं नहीं ,रामू के आने से चुप हो गया।" "बहुत ही शरारती है,घर में सबका प्यारा है।देखो उसका बिस्तर ,जमीन पर नहीं सोता।" "अरे वाह छोटा सा कूलर भी।" फोन आने पर मिसेज सिन्हा व्यस्त हो गई,तभी समीप के कमरे से कराहते हुए पानी, पानी की आवाज ने सुरभि के ध्यान को बरबस उस ओर खींचा। साधारण सा कमरा, पुराना सा सीलिंग फैन,पलंग पर लेटी वृद्ध महिला पानी मांग रही है।  जग से पानी निकाला ,"अरे यह तो गर्म है,ठंडा लाकर देती हूँ।" "नहीं यही दे दो,सूखी घास पर कोई ठंडा पानी क्यों सींचेगा।" "आप कौन हैं।" "मैं इनकी मां,पर काश इनका कुत्ता ह...

और उसकी नींद?

"माँ माफ कर देना आँख नही खुल पाई।"सृष्टि ने सास के पैर छूकर डरते हुए कहा। "नयी बात कौन सी है इसमें?तुम्हारी तो आदत हो गई है देर से उठने की।"सास ने मुँह बनाते हुए कहा। "आलर्म लगाया था माँ पर..।" "पर नींद आ गई यही ना!तुम्हें पता है घर में मेहमान हैं तुम्हारे यह लक्षण ठीक है क्या?घर की बहू समय पर न उठे न समय पर पूजा करे तो घर में समृद्धि आयेगी क्या?"सास ने गुस्से से सृष्टि को कहा। "वैभव कहाँ है सृष्टि?"पीछे ने किसी ने पुकार कर कहा। "वह सो रहे हैं मौसीजी।"मौसी को प्रणाम करते हुए वह बोली। "आठ बज रहे हैं कितनी देर सोता है यह लड़का?"मौसी ने दोबारा पूछा। "अरे दीदी!थक जाता है दिनभर।सोने दो।उठ जायेगा नौ बजे तक।इतने बजे ही उठता है।फिर तो दिनभर दुकान पर खपता ही रहता है बेचारा।"सृष्टि की सास ने जवाब दिया। "और सृष्टि!वह नही थकती?दिनभर घर के काम। वह कौन सा आराम करती है दिन में।"हँसते हुए मौसी ने कहा। "रातभर आराम ही तो करती है।"सास ने बुरा सा मुँह बनाकर कहा। "तुम्हारा बेटा करने देता ह...

भेड़िया

छठवीं क्लास की राधा अपने घर से लगभग तीन किलोमीटर दूर, स्कूल के पार्क में खेलने आई है, खेलते खेलते शाम के 6 बज चुके हैं, ठंडी का वक़्त है, अँधेरा गहरा रहा है। "चलो घर तुम्हारी मम्मी बुला रही हैं, इतने देर तक क्यों खेल रही हो, वो गुस्सा हो रहीं", अशोक भैया ने बोला। अशोक की उम्र 23 साल है और राधा के पडोशी हैं, घर में आना जाना है उनका।  राधा तुरंत घर जाने के लिए उनके साथ निकलती है, अशोक का दोस्त प्रशांत बाइक स्टार्ट करता है, फिर राधा बैठती है, अशोक राधा के पीछे बैठता है; बाइक चलने लगी,थोड़ी देर बाद राधा को कुछ असहज लगा, अशोक का हाँथ उसके जांघो पे है और जांघो को सहला रहा है, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा पर उसे बुरा लग रहा वो बार बार हाथ हटाती है पर वो बार बार हाथ रख लेता है; अब तो कमर भी पकड़ ली है अशोक ने । राधा को डर लग रहा, बहुत डर, वो जल्दी से घर पहुंचना चाहती है; उसे अपनी मम्मी कि याद आ रही और पसीने से उसका पूरा माथा और शरीर तरबतर है। बाइक रूकती है अशोक के घर के पास वो लोग उतर जाते हैं; "चलो अंदर तुम्हारी मम्मी यहीं हैं, मेरे घर पे" अशोक ने कहा। ...... राधा दौड़कर ...

आत्मसम्मान

मोहन लाल शर्मा बाजार जा रहे थे कि अचानक किसी ने पीछे से टोका शर्मा जी कैसे हैं। पीछे से जानी पहचानी आवाज सुनकर शर्मा जी ने मुड़कर देखा, देखते ही उन्हें झटका सा लगा कि अभी कुछ साल पहले यही लड़का जब मैं काफी संपन्न था, मुझे चाचाजी कहता था और देखते ही नमस्कार करता था, पर आज जबकि मेरी हालत थोड़ी ठीक नहीं है तब यह मुझे शर्मा जी कहकर संबोधित कर रहा है। कहीं ऐसा ना हो कि 2 दिन बाद यह मुझे भरे बाजार में अरे शर्मा कहां चले कह कर संबोधित करे। वे उस लड़के के पास गए और कहा क्षमा करना मैंने तुम्हें पहचाना नहीं। ऐसा कह कर वे वापस मुड़कर तेजी से बाजार की भीड़ में कहीं खो गए।

प्रेम_में_डूबे_हुए_मासूम_से_लड़के

हाँ_ये_सच_है सभी लड़के एक जैसे नहीं होते । कुछ होते हैं बहुत ही प्यारे हर किसी से हँस कर मिलने बाले छोटी छोटी बात पर मदद करने के लिए तैयार उन्हे भाता है रफ़ी साहब के गानें (बहारों फूल बरसाओ ) उन्हें नहीं अच्छा लगता है यो यो हनी सिंह उन्हें लुभाती हैं आशा पारेख की अदाएं पलकें झपकाना जया भादुरी के गुड्डी मूवी का वो किरदार एक अल्हर सी लड़की का उन्हें नहीं पसंद आता नंगेपन की नुमाईश उनकी अपनी ही दूनियाँ होती है सचमुच कुछ लड़के होते हैं बहुत मासूम शर्मीला सा दुनियाभर के छ्ल प्रपंच से दूर .... उन्हें पसंद आती हैं दुपट्टा के कोने को मोड़ती हुई सकुचाई हुई लड़कियाँ #और एसे में अगर उसे प्रेम हो जाय तो क्या कहने हो जाता है राजेश खन्ना की तरह अकेले में बावरा-फ़क़ीरा सा वो जीने लगता है सिक्सटीज-सैवेंटीज की मूवी को उसे मजनू नहीं कन्हैया बनना अच्छा लगता है वो रखने लगता है ख्याल अपनी प्रेमिका का अपनी जान से ज्यादा चाहने लगता है उसे बचाना चाहता है दुनियां की नजरों से उसकी सभी परेशानियां लगने लगती है अपनी #बड़ी_अभागन_होती_है_वैसी_लड़की जो छोड़ आती है उस प्रेमी को अन्तिम के कटु अनुभव ...

द पीपल ऑफ इंडिया

हम तो पा चुके जीवन का रहस्य, साथियो। धर्म से मत डरो, जिन्हें पालना है उन्हें पालने दो, डरने का स्वातंत्र्य भोग लेने दो, कोई किसी को जगा नहीं सकता। जब तक कोई खुद जागने की चाह ना रखें। हम जागृत होने चाहिए की हम कौन है। हम, भारत के लोग, वी, द पीपल ऑफ इंडिया। हम भारत के नागरिक है। हमें व्यक्ति स्वातंत्र्य का अधिकार प्राप्त है। हम मुसलमान नहीं है। हम ब्राह्मण नहीं है। हम भारत के नागरिक है और हमें यह अधिकार प्राप्त है कि हम किसी भी धर्म को मां सकते है और हम किसी भी धर्म को नहीं भी मान सकते। हमें अध्यात्म में मानने का अधिकार है। चूंकि हमें कल्पना करने करने का अधिकार है। कला भी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है। हम नास्तिक होने के लिए स्वतंत्र है भगतसिंघ ने खुद को नास्तिक घोषित करने की स्वतंत्रता को भोगा था। वह बीसवीं सदी के आरंभ का मॉडर्न इंडिया था। भगतसिंघ थे विचारों का उड़ता पंजाब। सावरकर ने खुद को नास्तिक कहा यह भी स्वतंत्र ने भारत की सोच थी। आंबेडकर ने भारत को स्वतंत्रता, समानता, बंधुता का नया विचार दिया। उस के प्रेरक नरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य थे, मानववादी मानवे...

मैं और वो

मैं और वो मैं अपने शहर होता हूँ वो अपने शहर होती है मैं आहें यहाँ भरता हूँ वो पगली वहाँ रोती है मैं फांके यहाँ करता हूँ वो भूखी वहाँ होती है मैं गिनता हूँ यहाँ तारे वो जागी वहाँ होती है मैं बन जाता हूँ बादल सा वो बूंदों सी बरसती हैं मैं जाड़े की सुबह सा हूँ वो बनकर ओस गिरती है मैं हूँ नदी... वो किनारा वो मेरे साथ चलती है मेरी हल्की छुअन से वो बड़ी जल्दी बहलती है मैं सोंधी चाय कुल्हड़ की वो बनकर भाप उड़ती है मैं प्याला खीर का कोई वो शक्कर जैसी घुलती है मैं लहसुन की कसक जैसा वो अदरक सी मचलती है मैं इक सेंके हुए ब्रेड सा वो मक्खन सी पिघलती है मैं ऐसा हूँ ! वो ऐसी है ! मैं कैसा हूँ? वो कैसी है? मैं कितना उसके जैसा हूँ? वो कितनी मेरी जैसी है? मैं पूरा उसके जैसा हूँ वो पूरी मेरी जैसी है मैं पूरा उसके जैसा हूँ वो पूरी मेरी जैसी है

पिता पुत्र का अनोखा रिश्ता

*#भारतीय पिता पुत्र की जोड़ी भी बड़ी कमाल की जोड़ी होती है।#* *दुनिया के किसी भी सम्बन्ध में,* *अगर सबसे कम बोल-चाल है,* *तो वो है पिता-पुत्र की जोड़ी में।* #एक समय तक दोनों अंजान होते हैं एक दूसरे के बढ़ते शरीरों की उम्र से फिर धीरे से अहसास होता है हमेशा के लिए बिछड़ने का । #जब लड़का, अपनी जवानी पार कर अगले पड़ाव पर चढ़ता है तो यहाँ इशारों से बाते होने लगती हैं  या फिर इनके बीच मध्यस्थ का दायित्व निभाने वाली माँ के माध्यम से । पिता अक्सर उसकी माँ से कहा करते हैं , "उससे कह देना" और पुत्र अक्सर अपनी माँ से कहा करता है "पापा से पूछ लो ना" *इसी दोनों धुरियों के बीच घूमती रहती है माँ*। जब एक कहीं होता है तो दूसरा वहाँ  नहीं होने की कोशिश करता है, शायद पिता-पुत्र नज़दीकी से डरते हैं । जबकि वो डर नज़दीकी का नहीं है, डर है उसके बाद बिछड़ने का । #भारतीय पिता ने शायद ही किसी बेटे को कहा हो कि बेटा मैं तुमसे बेइंतहा प्यार करता हूँ । पिता की अनंत गालियों का उत्तराधिकारी भी वही होता है, क्योंकि पिता हर पल ज़िन्दगी में अपने बेटे को अभिमन्यु सा पाता है । पिता ...

कुछ अपने दिल की

पहले संपन्नन नही थे । लेकिन देशभक्त थे। ताक़तवर नही थे। पर किसी से डरते नही थे। विकसित नही थे। अपनी एक पहचान रखते थे। आज सम्पन्न हैं। लेकिन डरते हैं। विकसित है। पर अपनी खुद कि सोच नही रखते। अपने लोगों की नज़रों की परवाह नही है । पर दुनिया की नज़रों की काफ़ी अहमियत है। देशभक्ति को नफ़ा नुक़सान में तौलते हैं । क्या पहले अच्चछे थे । या अब अच्चछे हैं।

आम आदमी

ज़ोरबा द बुद्धा ना घर का ना घाट का जहां था वहीं है लेकिन लगता है कहीं और है जैसा था वैसा ही रहा फिर भी कुछ ध्यान करता रहा ना नास्तिक बन पाया ना आस्तिक भी रह पाया विरोधाभास, संदिग्धता, अपूर्णता और अस्पष्टता इन की वकालत का नाम है ज़ोरबा द बुद्धा ना घर का ना घाट का टिपिकल मिडियोकर आम आदमी

स्त्री

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बचपन मे बाहर इसलिए नही खेले थे क्योंकि बच्चे पकड़ने वाली गाड़ी हमे उठा ले जाती और अब जब सारी बात मान कर बड़े हुए तो माँ खुद हमे घर से भेजना चाहती है । स्त्री

बचपन लौट आ...

बचपन लौट आ... मुझे एक बार फिर से, जीने दे...! वो बाबू जी की, उँगली पकड़कर, दूर सैर तक जाने दे। खेतों के कच्चे रस्तों पर, गिरने दे,उठ जाने दे, ठंडे बालू रेत पर, लंबी छलांग लगाने दे। चिकनी मिट्टी से खिलौने, कुछ सुंदर घर बनाने दे, गुड्डे-गुड़ियों की शादी, का उत्सव मनाने दे। ईट की गाड़ी सजाकर, घर-आंगन में घुमाने दे, रद्दी कागज को फाड़कर, बारिश में जहाज तैराने दे। चोर-सिपाही के खेल में, फिर राजा बन जाने दे, दोस्तों में एक बार मुझे, फिर अब्बल आ जाने दे। माँ से पच्चीस पैसे लेकर, एक सुंदर पतंग उड़ाने दे, कुछ पैसे की डोर खरीदू, बाकि मीठी गोली खाने दे। साइकिल का टायर दौड़ाकर, पूरी गली घूमाने दे, दोस्तों संग गप्पे लड़ाकर, सुबह से शाम हो जाने दे। बचपन लौट आ... मुझे एक बार फिर से, जीने दे....!!               

अगर मैं कहूँ---- मोनिका कुमार

--- अगर मैं कहूँ मुझे इस दुनिया में कुछ भी ख़ास पसंद नहीं आया तो दुनिया का आशावादी बहुमत मुझ पर टूट पड़ेगा अगर मैं कहूँ कि इस दुनिया में मुझे आलू अच्छे लगे मोगरे की खुशबु अच्छी लगी और सिर्फ प्रेमियों की अंतरंगता पसंद आयी तो पाखंडियों का बहुमत मेरी जान के पीछे पड़ जाएगा जब मैं आलू पर मक्खन रख कर नहीं खा रही होती या जब मोगरे का मौसम नहीं होता या प्रेमी छुट्टी पर होते हैं तो मुझे एकांत अच्छा लगता है अगर मैं कहूँ कि मैनें इस दुनिया की सुन्दरता को कम नहीं किया लगभग मुफ्त चीज़ों से जीवन जिया और अपनी पसंद के प्रेमी चुने तो मेरी अहिंसा और शांति को भंग करने हिंसक भीड़ का शोर भागा आएगा अगर मैं कह दूँ यह दुनिया गुलाम मनुष्यों का झुंड है तो मैं अंतर्राष्ट्रीय अपराधी बन जाऊँगी मैं यह कहना इसलिए छुपा कर रखती हूँ क्योंकि ये तीन चीज़ें भी कोई कम नहीं होती कि इन्हें बचाने के लिए मैं भी झूठ बोलती रहूँ और दुनिया के शुभ की कामना करती रहूँ. मोनिका कुमार के लिए --- प्रकृति निरपेक्ष है मृत्यु सिर्फ़ मनुष्यों के लिए घटना है मैं नहीं जानता मोनिका अगर तुम्हारी मृत्यु से प्रक...

उपले

"औरतें उपले हुआ करती हैं जिन्हें पहले से निर्धारित बिटौरों में समेटकर रखा जाता है..."

👨‍⚖️👰 पति पत्नी की नोक-झोक तो खूब आती है लेकिन एक खूबसूरत संवाद़.....

👨‍⚖️👰 👉कौन बड़ा, कौन महान👇                  मैंने एक दिन अपनी पत्नी से पूछा ~        क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता,     मैं बार-बार तुमको बोल देता हूँ,        डाँट देता हूँ , फिर भी तुम   ◆  पति भक्ति में लगी रहती हो, ◆        ❗ जबकि मैं कभी ❗  पत्नी भक्त बनने का प्रयास नहीं करता ?     मैं वेद का विद्यार्थी और मेरी पत्नी          विज्ञान की, परन्तु उसकी   आध्यात्मिक शक्तियाँ मुझसे कई गुना   ज्यादा हैं , क्योकि मैं केवल पढता हूँ,             ❗और वो  ❗      जीवन में उसका पालन करती है.       मेरे प्रश्न पर, जरा वो हँसी, और        गिलास में पानी देते हुए बोली ~           ये बताइए, एक पुत्र यदि      माता की भक्ति करता है, तो उसे       मातृ भक्त कहा जाता ह...

मेरे पिता

“मेरे पिता” मेरे जीवन के गुरु है उनसे ही होता मेरा जीवन शुरू है वो मेरी ख़ुशियों का आधार है उनमे ही बसता मेरा पूरा संसार है जब से मैंने होश सम्भाला है खुद को मिटाकर उन्होंने मुझे पाला है अनेको दुःख दर्द को सहते हुए दुनिया के ताने सुनते हुए उत्तरदायित्वों की चक्की में पिसते हुए जीवन में संघर्ष करते हुए मैंने देखा है फिर भी उन्हें अपने ग़मों को छुपाकर हँसते हुए दुनिया के भव सागर में जीवन के तूफ़ानो में हँसी ग़मों के तरानो में उम्मीदों के आशियाने में मैंने देखा है उन्हें परिवार की नैया किनारे लगाते हुए बच्चों की ख़ुशी के लिए कुल की मर्यादा के लिए समाज की व्यवस्था के लिए अपनो से दूर जीने को मजबूर मैंने देखा है उन्हें संसार के चक्रव्यूह में अभिमन्यु सा अकेले लड़ते हुए खुद के लिए त्याग परिवार के लिए प्यार बच्चों को दुलार जीवन की मझधार मैंने देखा है उन्हें तूफ़ानो से लड़ते हुए समाज में फैले भक्षकों के बीच वो मेरे जीवन का रक्षक है अनुभव का सागर है प्रेम के महासागर है ख़ुशियों के आगर है मेरे पिता मेरे जीवन की    “स्नेह गागर” है     ...

काना फ़ुसी

कुछ लिखकर मिटा देना कुछ कहकर मुकर जाना ज़माने की ये रिवायत बड़ी तकलीफ़ देती हैं कुछ  अपनो  का साथ कुछ   ग़ैरों   की  बात कुछ  बदलते   हालत बड़े  तकलीफ़  देते हैं कुछ   अनकही  बातें कुछ  दर्द   भरी  रातें कुछ ग़मों की मुलाक़ातें बड़ी तकलीफ़ देती हैं कुछ   स्वार्थी   रिश्ते जीवन भर जिनमे पिसते लोगों  के  सुनते  ताने बड़ी  तकलीफ़  देते  हैं दुनिया  की  काना   फ़ुसी मन  होता  जिससे   दुखी मिट जाती जीवन की ख़ुशी बड़ी   तकलीफ़   देती   हैं