आम आदमी
ज़ोरबा द बुद्धा
ना घर का ना घाट का
जहां था वहीं है
लेकिन लगता है कहीं और है
जैसा था वैसा ही रहा
फिर भी कुछ ध्यान करता रहा
ना नास्तिक बन पाया
ना आस्तिक भी रह पाया
विरोधाभास, संदिग्धता,
अपूर्णता और अस्पष्टता
इन की वकालत का नाम है
ज़ोरबा द बुद्धा
ना घर का ना घाट का
टिपिकल मिडियोकर
आम आदमी
ना घर का ना घाट का
जहां था वहीं है
लेकिन लगता है कहीं और है
जैसा था वैसा ही रहा
फिर भी कुछ ध्यान करता रहा
ना नास्तिक बन पाया
ना आस्तिक भी रह पाया
विरोधाभास, संदिग्धता,
अपूर्णता और अस्पष्टता
इन की वकालत का नाम है
ज़ोरबा द बुद्धा
ना घर का ना घाट का
टिपिकल मिडियोकर
आम आदमी
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