मेरे बेटे
कभी इतने ऊँचे मत होना कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ . न कभी इतने बुद्धिजीवी कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग . इतने इज़्ज़तदार भी न होना कि मुँह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो . न इतने तमीज़दार ही कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी . इतने सभ्य भी मत होना कि छत पर प्रेम करते कबूतरों का जोड़ा तुम्हें अश्लील लगने लगे और कंकड़ मारकर उड़ा दो उन्हें बच्चों के सामने से . न इतने सुथरे ही होना कि मेहनत से कमाए गए कॉलर का मैल छुपाते फिरो महफ़िल में . इतने धार्मिक मत होना कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ . न कभी इतने देशभक्त कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको . कभी इतने स्थायी मत होना कि कोई लड़खड़ाए तो अनजाने ही फूट पड़े हँसी . और न कभी इतने भरे-पूरे कि किसी का प्रेम में बिलखना और भूख से मर जाना लगने लगे गल्प। .

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