अगर मैं कहूँ---- मोनिका कुमार


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अगर मैं कहूँ
मुझे इस दुनिया में कुछ भी ख़ास पसंद नहीं आया
तो दुनिया का आशावादी बहुमत मुझ पर टूट पड़ेगा
अगर मैं कहूँ कि इस दुनिया में मुझे आलू अच्छे लगे
मोगरे की खुशबु अच्छी लगी
और सिर्फ प्रेमियों की अंतरंगता पसंद आयी
तो पाखंडियों का बहुमत मेरी जान के पीछे पड़ जाएगा

जब मैं आलू पर मक्खन रख कर नहीं खा रही होती
या जब मोगरे का मौसम नहीं होता
या प्रेमी छुट्टी पर होते हैं
तो मुझे एकांत अच्छा लगता है
अगर मैं कहूँ कि मैनें इस दुनिया की सुन्दरता को कम नहीं किया
लगभग मुफ्त चीज़ों से जीवन जिया
और अपनी पसंद के प्रेमी चुने
तो मेरी अहिंसा और शांति को भंग करने
हिंसक भीड़ का शोर भागा आएगा

अगर मैं कह दूँ
यह दुनिया गुलाम मनुष्यों का झुंड है
तो मैं अंतर्राष्ट्रीय अपराधी बन जाऊँगी
मैं यह कहना इसलिए छुपा कर रखती हूँ
क्योंकि
ये तीन चीज़ें भी कोई कम नहीं होती
कि इन्हें बचाने के लिए मैं भी झूठ बोलती रहूँ
और दुनिया के शुभ की कामना करती रहूँ.

मोनिका कुमार के लिए

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प्रकृति निरपेक्ष है
मृत्यु सिर्फ़ मनुष्यों के लिए घटना है
मैं नहीं जानता मोनिका
अगर तुम्हारी मृत्यु से प्रकृति के वैभव में कोई अभाव आया हो
पर मनुष्य बहुत कातर हैं
मनुष्य इतने कातर हैं
मेरी प्रिय कवि, प्रिय कवि मेरी
वे दिन रात भटकते रहते हैं
कोई उन्हें सामने से मिले और कह दे
कि प्रेम बहुत जल्दी तुम्हारा स्पर्श करने वाला है

तुम्हारे पीछे सिर्फ़ परिवार की विरासत नही थी मोनिका
तुम्हारे जैसे मनुष्य
पूरी दुनिया की विरासत ग्रहण करते हैं
तुम जानती थी
जीवन में सब कुछ पाया नहीं जा सकता
पर जीवन में बहुत कुछ देखा और महसूस किया जा सकता है
अपनी जिज्ञासा का पीछा करती हुई तुम दुःख देखने कहीं भी पहुँच जाती थी
पर तुम्हें कोई पछतावा नहीं उन बंजर दिनों का
जब कोई मनुष्य नहीं था तुम्हारी सोहबत में
तुम पेड़ों और सूर्य को मदद के लिए पुकारती थी
कोई देश तुम्हारी चेतना को क़ैद नहीं कर सकता था
कला विद ख़ुद को तुम पर थोप नहीं सकते

मैं
तुम्हारा परवर्ती कवि
फारुक फरीद
सच को झूठ से अलग करने वाला तुम्हारा परवर्ती हिंदी कवि
यह कोई कहने की बात नहीं
हम समकालीन होते तो गहरे प्रेम में होते
आज तुम्हारी स्मृति में सराबोर होता हुआ
मैं इन क्लांत बातों का आश्रय नहीं लूँगा
कि तुम्हारे प्रिय मोगरे के फूल तुम्हारी अनुपस्थिति में मुरझा गए
या भारत में अब कोई आलू पर मक्खन लगाकर नहीं खाता

दुनिया यथावत चल रही मेरी प्रिय कवि
तुम अगर आज जीवित होती तो देखती
भारत किस किस तरह के जहन्नुम से उबर गया है
हालाँकि तुम इस पर भी यही कहती
तुम उन गलतियों का बोझ नहीं उठाओगी जो तुमने नही की
तुम्हारी ग़ैरहाज़िरी बस इस क़दर खलती है
जैसे एक देश में
बेमुरव्वत बेलिहाज़ मनुष्यों की कमी खलती है

मेरे परिवार का इतिहास
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मेरे परिवार के इतिहास में ऐसी कोई घटना नहीं
जिस पर मैं गर्व कर सकूँ
या दोस्तों के बीच उल्लेख कर सकूँ
हमारा ख़ानदान बेहद आत्मलीन ख़ानदान रहा
सिर्फ़ अपने नून तेल और खटिया में खटा हुआ
कोई देशभक्त नहीं देशद्रोही नहीं
कोई दानी नहीं दानिशमंद नहीं
सिर्फ़ एक कमरे से दो कमरे के मकान के सपने देखता हुआ
“पर आप लोग तो विस्थापित परिवार हैं न”
मैंने अपने दादा से पूछा
दादा बोले हाँ
लेकिन फिर यहाँ आ गए तो यहाँ बस गए

हमारे यहाँ से कभी कोई फ़ौज में नहीं भर्ती हुआ
न ही किसी ने नृत्य सीखा और न ही संगीत
दिवाली के दिनों में भी
हम लोग संयत ही रहते थे
इसे राहत माना जाए तो राहत बस यह थी
कि चुटकुले बनाना और चुटकुलों पर हँसना दोनों इन्हें आता था

मैं अक्सर अपने दादा को टटोलती रहती थी
कि आपके जीवन के बारे में कुछ अगर मैं न जानती होऊँ
लेकिन ऐसा कभी कुछ मैं निकाल नहीं सकी
कि जब मेरा साक्षात्कार लेने कोई पत्रकार आए
तो मैं उसे झट से बता सकूँ
कि मेरी रचनात्मकता के स्रोत इस घटना में पड़े हैं

लेकिन अपने ख़ानदान में विलक्षणता ढूँढ़ने की मेरी कोशिश बेकार नहीं गयी
मैंने धीरे धीरे जाना मेरे परिवार के लोग बहुत असुरक्षित हैं
उन्हें युद्ध, सरकार और महँगाई से बहुत डर लगता है
दिवाली की छुट्टियाँ भी उन्हें ख़ुश नहीं कर सकतीं
वे यक़ीन नहीं करते कि बाज़ार में छूट जैसी कोई चीज़ होती है
वे इस बात के सिवा किसी बात पर भरोसा नहीं करते
कि यहाँ किसी की जान सुरक्षित नहीं
और अगर बचे रहे
तो अगले साल बिना कोई नियम क़ानून तोड़े
तीन कमरों वाला मकान बना लेंगे!

--- मोनिका कुमार

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